2040 तक 1.3 अरब टन प्लास्टिक के बोझ से दब जाएगी दुनिया

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- Author, विक्टोरिया गिल
- पदनाम, बीबीसी विज्ञान संवाददाता
- प्रकाशित
एक ग्लोबल मॉडल के हिसाब से अगले 20 सालों में हम दुनिया में प्लास्टिक की गंभीर समस्या से जूझ रहे होंगे.
इस रिपोर्ट के अनुसार अगर वक्त पर कदम नहीं उठाए गए तो 2040 तक करीब 1.3 अरब टन प्लास्टिक हमारी धरती पर मौजूद होगा. यह रिपोर्ट जर्नल साइंस में छपी है.
यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के डॉ. कोस्टास वेलिस कहते हैं कि यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, लेकिन इस चुनौती से निबटने के लिए हमारे पास टेक्नोलॉजी भी है और मौका भी है.
डॉ. वेलिस बताते हैं, "अगले 20 साल में किस तरह की तस्वीर हो सकती है उसके बारे में यह पहला व्यापक आकलन है. इतना बड़ा आकलन करना मुश्किल काम है, लेकिन अगर आप पूरी प्लास्टिक को एक समतल सतह पर बिछाना शुरू कर दें तो यह ब्रिटेन का पूरा क्षेत्रफल 1.5 गुना तक के हिस्से को ढंक लेगा."
वे कहते हैं, "इसका अनुमान लगाना जटिल है क्योंकि प्लास्टिक हर जगह और दुनिया के हर हिस्से में मौजूद है. इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए और इससे कैसे निबटा जाए यह एक आसान काम नहीं है."
प्लास्टिक के इस्तेमाल और निस्तारण के आंकड़ों का इस्तेमाल

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इस मुश्किल समस्या को आंकड़ों में बदलने के लिए शोधार्थियों ने पूरी दुनिया में प्लास्टिक के उत्पादन, इस्तेमाल और इसे ठिकाने लगाने का पता लगाया है. इसके बाद टीम ने एक मॉडल तैयार किया ताकि भविष्य की प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या का अनुमान लगाया जा सके.
वे इसे एक सामान्य प्रक्रिया बताते हैं. प्लास्टिक उत्पादन में बढ़ोतरी के मौजूदा ट्रेंड और इसके दोबारा इस्तेमाल और रीसाइक्लिंग की मात्रा में कोई खास बदलाव न होने के आधार पर शोधार्थी बताते हैं कि 2040 में दुनियाभर में 1.3 अरब टन प्लास्टिक हो जाएगा.
'अलग-अलग परिदृश्य में क्या होंगे हालात'
अपने मॉडल में एडजस्ट करते हुए शोधार्थियों के पास इस बात की आजादी है कि वे ये बता सकें कि अलग-अलग बदलाव के कारण इस आंकड़े पर कितना तक असर पड़ सकता है. उन्होंने रीसाइक्लिंग में इज़ाफा होने, उत्पादन में कमी आने और प्लास्टिक की जगह पर दूसरे मैटेरियल्स के इस्तेमाल करने के आधार पर अपने मॉडल्स में बदलाव भी किए हैं.
इस रिसर्च के लिए फंडिंग करने वाली अमरीकी प्यू चैरिटेबल ट्रस्ट्स की विनी लाउ ने बताया कि हर संभावित समाधान को काम में लाना बेहद जरूरी है.
वे कहती हैं, "अगर हम ऐसा करते हैं तो हम 2040 तक समुद्र में जाने वाले प्लास्टिक की मात्रा को 80 फीसदी तक घटा सकते हैं."

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शोधार्थियों ने सुझाए कुछ उपाय
- प्लास्टिक के उत्पादन और खपत में आ रही बढ़ोतरी को कम किया जाए
- प्लास्टिक की जगह पर कागज, जूट और दूसरे गलकर ख़त्म हो जाने वाले मैटेरियल्स के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए
- री-साइक्लिंग के लिए उत्पादों और पैकेजिंग मैटिरीयल्स डिज़ाइन किया जाए
- मध्य और कम आय वाले देशों में कचरा एकत्र करने की दर बढ़ाई जाए और असंगठित सेक्टर को सपोर्ट दिया जाए
- बिल्डिंग फै़सिलिटीज़ अपने यहां रीसाइकल न हो पाने वाली 23 फीसदी प्लास्टिक का निबटान खुद करें
- प्लास्टिक कचरे के निर्यात में कमी लाई जाए
डॉ. वेलिस बताते हैं कि अगर सभी संभव कदम उठाए भी जाएं तब भी मॉडल से पता चलता है कि अगले दो दशकों में 71 करोड़ टन अतिरिक्त प्लास्टिक कचरा पर्यावरण में दाखिल हो जाएगा.
प्लास्टिक की समस्या का कोई पुख्ता इलाज नहीं
प्लास्टिक की समस्या को सुलझाने का कोई पुख्ता उपाय नहीं है. इस स्टडी में एक ऐसे तथ्य पर रोशनी डाली गई है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है.
इसमें बताया गया है कि ग्लोबल साउथ (मोटे तौर पर इसमें अफ्रीकी, लैटिन अमरीकी और एशिया के विकासशील देश आते हैं) के करीब 2 अरब लोगों के पास कचरा निस्तारण की सुविधा मौजूद नहीं है.
डॉ. वेलिस कहते हैं, "उन्हें या तो अपना कचरा जलाना होता है या फिर इसे कहीं फेंकना पड़ता है."
दुनिया के सामने गंभीर चुनौती
डॉ. वेलिस कहते हैं, "कचरा इकट्ठा करने वाले और बीनने वाले रीसाइक्लिंग के मोर्चे के ऐसे सिपाही हैं जिनकी कोई तारीफ नहीं होती है." वे कहते हैं कि इन लोगों की मदद और सपोर्ट के लिए नीतियां बननी चाहिए.
यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के डॉ. इआन केन इस स्टडी के आंकड़े से उभरी तस्वीर को भयावह बताते हैं. केन हाल तक एक ऐसी टीम का हिस्सा थे जिसने समुद्र तल में मौजूद माइक्रो प्लास्टिक की मात्रा का आकलन किया था.
वे कहते हैं, "दुनियाभर में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए जिस दर से प्लास्टिक का उत्पादन बढ़ रहा है उसके पर्यावरण के लिए दुष्परिणाम काफी भयानक होने वाले हैं."
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