पाकिस्तान: दियामर-भाशा बांध से डूब सकते हैं प्राचीन बौद्ध धरोहर?

दियामर बाशा डैम

इमेज स्रोत, Wilfrid Laurier University

    • Author, मोहम्मद ज़ुबैर ख़ान
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से
  • प्रकाशित

पाकिस्तान का दियामर-भाशा डैम पूरा होने के बाद पाकिस्तान में पानी जमा करने के लिए अब तक की सबसे बड़ी परियोजना होगी जिससे 4800 मेगावाट बिजली बनाने की उम्मीद की जा रही है. इस बांध के निर्माण से न सिर्फ़ पाकिस्तान के पानी जमा करने की क्षमता में बढ़ोत्तरी होगी बल्कि तरबेला डैम की ज़िंदगी में भी इज़ाफ़ा होगा.

15 जुलाई को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस बांध के निर्माण परियोजना का उद्घाटन किया. चीन की मदद से ये बांध पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के गिलगित-बल्तिस्तान में बनाया जा रहा है.

भारत ने इस पर अपनी आपत्ति जताई है. दरअसल भारत पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर पर भी अपनी दावेदारी करता रहा है.

लेकिन इस बांध को लेकर एक चिंता और जताई जा रही है और वह है इस बांध के कारण इस जगह के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के नष्ट हो जाने का ख़तरा.

इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों का कहना है कि ईसा पूर्व सात हज़ार साल से लेकर 16वीं सदी तक के विभिन्न दौर से संबंधित रखने वाले पाँच हज़ार अत्यधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शिलालेख और कलाकृतियां इस बांध के पूरा होने पर पानी में डूब सकते हैं.

कई बरसों तक पाकिस्तान के प्राचीन इतिहास का अध्ययन करने वाले डॉक्टर जेसन नील्स कहते हैं कि जबसे काराकोरम और हिमालय के पहाड़ों की तरफ़ जाने का रास्ता कारोकोरम पास खुला है उस वक़्त से अब तक पाकिस्तान और यूरोप के विशेषज्ञों ने इन इलाक़ों में 30 हज़ार से लकेर 50 हज़ार तक शिलालेख और पाँच हज़ार के क़रीब विभिन्न तरह के अभिलेख को खोजा है.

ये भी पढ़िएः

दियामर बाशा डैम

इमेज स्रोत, WILFRED LAURIER UNIVERSITY

डॉक्टर जेसन कनाडा की विलफ़्रेड़ लॉरियर यूनिवर्सिटी के धर्म और संस्कृति विभाग के प्रमुख हैं.

वो कहते हैं कि शिलालेख और अभिलेख पर आधारित प्राचीन काल के सांस्कृतिक धरोहर सिंधु नदी के आस-पास गिलगित बल्तिस्तान और ख़ैबर पख़्तूख्व़ान प्रांत में मौजूद हैं.

बीसवीं सदी में बनने वाला काराकोरम पास पाकिस्तान को चीन के शिनजियांग इलाक़े से मिलाता है जिसके ज़रिए पाकिस्तान का ज़मीनी संपर्क मध्य-पूर्व तक से हो सकता है.

डॉक्टर जेसन कहते हैं, "ये शिलालेख और अभिलेख हमें बताते हैं कि इस दर्रे के बनने से पहले प्राचीन काल में लोग किस तरह हिंदुकुश, हिमालय और काराकोरम के पहाड़ों में विभिन्न रास्तों पर सफ़र किया करते थे."

उनके अनुसार इन शिलालेखों और अभिलेखों से उत्तरी पाकिस्तान के उन इलाक़ों में बसने वाले प्राचीन लोगों के धार्मिक विश्वास और उनकी सभ्यता और संस्कृति देखने और समझने के अलावा यहां दुनिया के दूसरे हिस्सों से आने वाले लोगों के बारे में भी पता चलता है.

दियामर बाशा डैम

इमेज स्रोत, WILFRED LAURIER UNIVERSITY

डॉक्टर जेसन के अनुसार ये जो चीज़ें मिली हैं उनके बारे में कहा जा सकता है कि ये एक हज़ार से लेकर 2500 साल तक पुरानी सभ्यता और संस्कृति के बारे में जानकारी देती हैं.

ये शिलालेख और अभिलेख प्राचीन सभ्यता के बारे में क्या बताते हैं?

गिलगित बल्तिस्तान के ज़िला चिलास में मौजूद एक गांव थलपन के बारे में बताया जाता है कि वो इस बांध का शिकार हो सकता है. इस गांव में इतिहासकार अब तक कई शिलालेख और अभिलेख की खोज कर चुके हैं.

डॉक्टर जेसन ने इस गांव में मौजूद एक ऐसी ही शिलालेख के हवाले से बताया कि इस इलाक़े में मौजूद पत्थरों पर जानवरों, इंसानों और कुछ निशानियों के ख़ाके प्रागैतिहासिक दौर के हैं.

इनमें ज़्यादातर शिलालेख पहाड़ी बकरों और दूसरे जानवरों के हैं. इसके अलावा शिकारियों, घुड़सवारों और दूसरे तरह के कई शिलालेख हैं जिनका संबंध इतिहास के हर दौर से है.

दियामर बाशा डैम

इमेज स्रोत, WILFRED LAURIER UNIVERSITY

इसी तरह चिलास में ही मौजूद कुछ पहाड़ों पर पाए जाने वाले कुछ अभिलेखों के बारे में वो बताते हैं कि इनका संबंध प्राचीन काल के ही कई अहम व्यक्तियों से है.

उनका कहना था कि चिलास में शिलालेख, अभिलेख, तस्वीरें और दूसरे चिन्हों के अलावा दक्षिण एशिया, ईरान और मध्य-एशिया की पुरानी ज़ुबानों में लिखे अभिलेख मौजूद हैं. शुरू की लिखावट गंधार भाषा में हैं जो कि ख़रोस्ती लिपी में हैं जो उस इलाक़े में दो हज़ार से 1700 साल पहले की हैं.

दियामर बाशा डैम

इमेज स्रोत, WILFRED LAURIER UNIVERSITY

इस पर मौजूद चित्र बालदेव, वासुदेव और राहुल के नाम के साथ ख़रोस्ती लिपी के साथ खुदे हुए हैं.

एक और शिलालेख के हवाले से डॉक्टर जेसन नील्स का कहना था कि बौद्ध धर्म से जुड़ी इस रेखाचित्र में गंधार ज़ुबान में लिखाई हुई है जो कि बताती है कि बौद्ध भिक्षु स्तूप में पूजा कर रहे हैं.

ये शिलालेख तक्षीला, स्वात और गंधार में मौजूद प्राचीन शिलालेखों से मिलते-जुलते हैं.

डॉक्टर जेसन नील्स के अनुसार सिंधु नदी के आस-पास स्तूप के और भी शिलालेख मौजूद हैं जिनमें ब्राह्मी लिपी में लिखावट हुई है जिस लिपी को संस्कृत भाषा के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

ये कोई 1500 साल पुरानी और संभवत: गंधार ज़ुबान के बाद के काल की हैं. उन पर मौजूद शिलालेखों में गौतम बु्द्ध और उनके पाँच शिष्यों की अक्कासी की गई है.

दियामर बाशा डैम

इमेज स्रोत, WILFRED LAURIER UNIVERSITY

माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने अपना पहला संदेश बनारस के क़रीब स्थित शहर सारनाथ में हिरणों के एक पार्क में दिया था. इसीलिए इन शिलालेखों में हिरण भी देखे जा सकते हैं.

डॉक्टर जेसन के अनुसार एक और शिलालेख में शिकारियों, विभिन्न प्रकार के आला(उपकरण), चिन्ह और पहाड़ी बकरे की तस्वीरें हैं, उनसे अंदाज़ा होता है कि ये बौद्ध धर्म के आने के बाद की तस्वीरें हैं जिनमें धार्मिक विश्वास, सभ्यता और संस्कृति बदलते हुए दिख रहे हैं.

सांस्कृतिक धरोहर का भविष्य

दियामर बाशा डैम

इमेज स्रोत, WILFRID LAURIER UNIVERSITY

इस बारे में दो मत नहीं हैं कि दियामर-भाशा डैम के निर्माण की सूरत में ये प्राचीन धरोहर अपनी मौजूदा हालत में नहीं रहेगा, जिसके बाद पूरी दुनिया के विशेषज्ञों में इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि इसे कैसे सुरक्षित रखा जाए.

डॉक्टर जेसन का कहना है कि इस सांस्कृतिक धरोहर का कुछ हिस्सा तो विभिन्न तरह से सुरक्षित है. पाकिस्तानी इतिहासकार प्रोफ़ेसर अहमद हसन दानी की किताबों के अलावा जर्मन की हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की पाकिस्तान के उत्तरी इलाक़ों पर लिखी किताबों के पाँच भाग छप चुके हैं.

ये किताबें बहुत ही अनमोल हैं, लेकिन अभी भी इन ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए बहुत कुछ करना बाक़ी है.

इसके लिए ज़रूरत इस बात की है कि आधुनिक तरीक़े अपना कर इन अनमोल शिलालेखों और अभिलेखों को सुरक्षित किया जाए ताकि इस सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट होने से बचाया जा सके.

दियामर बाशा बांध पाकिस्तान में जल संसाधन और बिजली आपूर्ति के लिए ज़िम्मेदार संस्था वाटर एंड पावर डेवेलप्मेंट ऑथोरिटी(वापडा) के नियंत्रण में होगा.

वापडा के एक प्रवक्ता ने बताया कि दियामर-भाशा बांध परियोजना के तहत बांध के निर्माण कार्य के अलावा वापडा अपनी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए परियोजना के पूरे इलाक़े में मौजूद ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा के लिए भी योजना बना रहा है.

दियामर बाशा डैम

इमेज स्रोत, WILFRID LAURIER UNIVERSITY

प्रवक्ता के अनुसार दियामर-भाशा बांध के निर्माण के कारण जलमग्न होने वाले पहाड़ों के शिलालेख और अभिलेख को सुरक्षित किया जाएगा और इसी सिलसिले में चिलास क़िले का भी पुनर्द्धार किया जाएगा.

उन्होंने बताया कि यहां एक म्यूज़ियम स्थापित किया जाएगा और गिलगित बल्तिस्तान ख़ासकर चिलास और उसके आस-पास स्थित गांवों में सांस्कृतिक पर्यटन को विकसित करने के लिए कई तरह के क़दम उठाए जा रहे हैं.

वापडा के अनुसार सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा के लिए मैनेजमेंट प्लैन वर्ल्ड बैंक, एशियाई विकास बैंक, यूनेस्को समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त विशेषज्ञों ने तैयार किया है.

इन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों में हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी में शिलालेख और अभिलेख के जानकार प्रोफ़ेसर हेराल्ड हाप्टमैन भी शामिल थे जिनका कुछ साल पहले देहान्त हो गया था.

वापडा के अनुसार लगभग पाँच हज़ार महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शिलालेखों और अभिलेखों की थ्री डी स्कैनिंग की जाएगी. उनका बाक़ायदा रिकॉर्ड रखा जाएगा. जिन पत्थरों को वहां से हटाकर सुरक्षित लेजाना संभव हुआ उन्हें सुरक्षित जगह पर ले जाया जाएगा और जिन शिलालेख को वहां से ले जाना संभव नहीं होगा उनकी नक़ल तैयार की जाएगी.

वापडा के अनुसार बांध निर्माण के दौरान ऐतिहासिक शिलालेखों की सुरक्षा के लिए उन जगहों पर बैनर्स, स्क्रीन लगाने के अलावा और दूसरे तमाम एहतियाती क़दम उठाए जाएंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)