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'कोरोना वायरस से नहीं मरे तो भूख से मर जाएंगे'
"अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो हम कोरोना वायरस के बजाय भूख से मर जाएंगे" - थाईलैंड के सबसे बड़े झुग्गी इलाक़े क्लोंग तोएइ में रहने वाली पंतीरा सुट्ठी की हालत का अंदाज़ा उनकी इसी बात से लगाया जा सकता है.
चकाचौंध भरे बैंकॉक के बीचोंबीच पड़ने वाले क्लोंग तोएइ इलाक़े को कुछ लोग शहर के सबसे बदसूरत हिस्से के तौर पर भी देखते हैं. पुराने टिन और सड़ी हुई लकड़ियों से बने मकान, पानी से भरे गड्ढे और नहरें डेढ़ वर्ग किलोमीटर में फैले इस स्लम की पहचान हैं.
पंतीरा सुट्ठी एक सिंगल मदर हैं. वे बिना किसी की मदद के अपने बेटे और पोते की देखभाल कर रही हैं. वे पास के एक स्कूल में फ़्राइड चिकन और मटन के कोफ़्ते बेचती हैं.
लेकिन पंतीरा की आमदनी का एकमात्र ज़रिया इन दिनों बंद हो गया है क्योंकि कोरोना वायरस की महामारी के कारण स्कूल बंद है.
जब दिन ठीक थे तो वो रोज़ का 30 डॉलर तक कमा लेती थीं लेकिन अब उनके हाथ खाली हो गए हैं. कोरोना वायरस ने उनकी रोज़ी रोटी छीन ली है. ये तकलीफ़ पंतीरा की तरह उन तमाम 20 हज़ार लोगों की है जो क्लोंग तोएइ को अपना घर कहते हैं.
आजीविका का संकट
पंतीरा सुट्ठी के लिए हैंड सैनिटाइज़र या फ़ेस मास्क जमा करना प्राथमिकता नहीं है. परिवार के भोजन का इंतज़ाम करना उनके लिए ज़्यादा ज़रूरी काम है. पंतीरा किसी एक ही चीज़ का इंतज़ाम कर सकती हैं.
वो कहती हैं, "किस्मत से हमारे समाज में अभी तक कोई कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं हुआ हैं. इसलिए मैं न तो कोरोना वायरस से बीमार पड़ने वाली हूं और न ही मरने वाली. लेकिन ग़रीबी धीरे-धीरे हमारी जान ले रही है. हम केवल हालात जल्द बेहतर होने की उम्मीद कर सकते हैं. मुझे भरोसा है कि सरकार हमारी ज़रूर मदद करेगी."
ग्राहकों के अभाव में पंतीरा के लिए आजीविका का संकट खड़ा हो गया है.
वो कहती हैं, "मैं सचमुच ये चाहती हूं कि बाहर जाकर कुछ खाने-पीने का सामान बेच लूं और कुछ पैसे कमा लूं. लेकिन सच तो ये है कि मेरे पास खुद ही पर्याप्त खाने-पीने का सामान नहीं है. मैं कहां से पैसों का इंतज़ाम करूं ताकि चिकन और मटन के कोफ़्ते खरीद सकूं."
फिलहाल उनका गुज़ारा दान में मिले भोजन से चल रहा है जिसकी व्यवस्था कुछ मंदिरों और ग़ैरसरकारी संगठनों की तरफ़ की जा रही है.
कोई रास्ता नहीं...
झुग्गी में रहने वाले लोगों के पास छोटे-मोटे काम के अलावाआजीविका के बहुत ज़्यादा विकल्प नहीं होते. दूसरे लोगों की तरह 56 वर्षीया थॉन्ग्रुएंग थॉन्ग्फुएन भी मज़दूरी करती हैं और इन दिनों रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष कर रही हैं.
पति के साथ वो हर रोज़ काम पर निकल जाती हैं और पास के इलाक़े की एक मुख्य सड़क पर खड़ी हो जाती हैं, इस उम्मीद से कि कोई उन्हें मजदूरी के काम पर बुला लेगा. उन्हें मालूम है कि सरकार ने घरों से बाहर न जाने की सलाह दी है लेकिन ज़िंदा रहने के लिए पैसे कमाना उनके लिए ज़्यादा ज़रूरी है.
थॉन्ग्रुएंग थॉन्ग्फुएन कहती हैं, "हमारे जैसे ग़रीब लोगों के पास कोई चारा नहीं होता. मैं जानती हूं कि सरकार लोगों से घरों में रहने के लिए कह रही है लेकिन अगर मैं पैसे कमाने के लिए बाहर नहीं जाऊंगी तो हम में से कोई ज़िंदा नहीं बचेगा. हमें कोई काम नहीं देता है. जब हम बाहर जाते हैं जो कोरोना वायरस से संक्रमित होने का ख़तरा रहता है."
वो कहती हैं, "मुमिकन है कि हम बाहर से कोरोना का संक्रमण लाकर यहां अपने समाज में दूसरे लोगों को भी संक्रमित कर दें. लेकिन हम क्या करें? मुझे अपने बच्चों का पेट भरना है. जिनसे हम ने कर्ज ले रखा है, वो महाजन अपने पैसे की वसूली के लिए हमेशा हमारे दरवाज़े पर आ जाते हैं. हम बहुत दबाव में हैं. कभी-कभी तो लगता है कि जीने की कोई वजह ही नहीं रह गई है."
जोख़िम भरी ज़िंदगी
क्लोंग तोएइ थाईलैंड का सबसे बड़ा स्लम है. कम से कम वहां 20 हज़ार लोग आधिकारिक रूप से रहते हैं. हालांकि माना जाता है कि वहां रहने वालों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा हैं. एक अनुमान तो ये भी है कि क्लोंग तोएइ में एक लाख के क़रीब लोग रहते हैं.
सघन आबादी, बेतरतीबी से चिपके हुए घर, ये वो वजहें हैं जिनसे क्लोंग तोएइ में किसी महामारी का फैलना बहुत आसान हो जाता है. स्लम में रहने वाले ज़्यादातर लोगों को कोरोना वायरस की महामारी के बारे में जानकारी है. लेकिन ग़रीबी और तंगहाली की वजह से वे ज़्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं.
क्लोंग तोएइ में ही रहने वाली सनितमुइएनवाइ कहती हैं, "यहां रहने वाले ज़्यादातर बच्चे, बूढ़े और बीमार लोग हैं जो कहीं आसानी से आ-जा नहीं सकते हैं. यहां कोरोना संक्रमण का एक भी मामला सामने आया तो पूरा का पूरा समुदाय ही ख़तरे में पड़ जाएगा."
कोरोना महामारी का पहला महीना
लड्डा मांगमीपोल की उम्र 26 साल है और वो भी स्लम में ही रहती हैं. लड्डा फ़ेस मास्कर बनाकर लोगों को फ्री में देती हैं. वो कहती हैं, "मैं उन खुशनसीब लोगों में से हूं जो अपनी नौकरी बचाकर रख पाई हूं. इससे मेरे परिवार का गुज़ारा चल रहा है. लेकिन मैंने अपने रिश्तेदारों को, पड़ोसियों को इस संकट में संघर्ष करते देखा है."
"यहां रहने वाले ज़्यादातर लोग मज़दूरी करते हैं. इस समय उनके पास कोई काम नहीं है. ये भले ही बैंकॉक में कोरोना महामारी का पहला महीना है लेकिन यहां तो लोग पहले से संघर्ष कर रहे थे. मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि अगले महीने क्या होने वाला है."
"क्लोंग तोएइ के जिस हिस्से में मैं रहती हूं, वहां बहुत डर का माहौल है. हाल में यहां कोरोना वायरस से संक्रमण के एक मामले की पुष्टि हुई है. मुझे डर है कि इस इलाक़े के बहुत सारे लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो सकते हैं और उनकी जानें जा सकती हैं."
भुला दिए गए लोग
जहां एक तरफ़ थाईलैंड में लोग कोरोना महामारी से बचाव की तैयारियां कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ क्लोंग तोएइ के हज़ारों लोगों की ज़िंदा कैसे रहे इस सवाल से जूझ रहे हैं.
भले ही सरकार ये कहे कि लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना चाहिए, घरों में रहना चाहिए लेकिन क्लोंग तोएइ के लोगों की हकीकत तो ये है कि वे इन दिशानिर्देशों का पालन करने में सक्षम ही नहीं हैं.
थाईलैंड में कोरोना संक्रमण के मामलों के साथ-साथ मरने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. लेकिन झुग्गी में रहने वाले जिन लोगों की रोज़ी-रोटी छिन गई है, उनके पास बाहर जाने का जोख़िम उठाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.
सरकार ने क्लोंग तोएइ को उस लिस्ट में रखा है जिसे आने वाले दस सालों में ढहा दिया जाएगा लेकिन ऐसा लगता है कि वो ये भूल गई है कि मौजूदा वक्त में ये झुग्गी हज़ारों परिवारों का ठिकाना है.
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