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UK ELECTION RESULTS: बोरिस जॉनसन की जीत का भारत के साथ रिश्तों पर क्या पड़ेगा असर?- नज़रिया
ब्रिटेन के आम चुनाव में सत्ताधारी कंज़र्वेटिव पार्टी ने बड़ी जीत हासिल की है. पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है.
650 सीटों वाली संसद में पार्टी ने बहुमत के लिए ज़रूरी 326 सीटों का आँकड़ा पार कर लिया है. उसके खाते में 364 सीटें आई हैं. उसे पिछली बार की तुलना में 47 सीटों का फ़ायदा हुआ है.
विपक्षी लेबर पार्टी की सीटों की संख्या घटकर 203 रह गई है. पार्टी अपनी कई पारंपरिक सीटें गँवा बैठी. उसे पिछले चुनाव से 59 सीटें कम मिली हैं.
बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने लंदन स्थित वरिष्ठ पत्रकार शिवकांत शर्मा से ब्रिटेन के चुनाव नतीजों पर बात की और यह जानने की कोशिश की कि आखिर लेबर पार्टी की करारी हार क्यों हुई. साथ ही यह भी कि इस जीत के बाद भारत के ब्रिटेन के साथ संबंधों पर क्या असर पड़ेगा.
पढ़ें, शिवकांत शर्मा का नज़रिया
लेबर पार्टी क्यों हारी. इसकी मुख्य तीन वजहें हैं.
पहली, लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन बहुत लोकप्रिय नहीं थे. उनकी नीतियां बिल्कुल सही हैं, जैसे- स्वास्थ्य, शिक्षा या विदेश नीति को लेकर वो जो बातें करते थे उसकी वजह से चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें कुछ बढ़त भी मिली, लेकिन ब्रेक्सिट पर ढुलमुल नीतियों की वजह से उनको सबसे अधिक नुकसान पहुंचा
उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वो यहूदी विरोधी हैं. यहूदियों के ख़िलाफ़ उनकी पार्टी में जो छींटाकशी हो रही थी उसके ख़िलाफ़ उन्होंने सख्त क़दम नहीं उठाये. उनको इसका भी नुकसान उठाना पड़ा.
जब-जब ब्रेक्सिट के बारे में उनसे उनका मत पूछा गया, उन्होंने कोई साफ़ जवाब नहीं दिया.
न तो खुलकर ब्रेक्सिट का समर्थन किया और न ही विरोध, उसका ख़ामियाजा उन्हें चुनावों में उठाना पड़ा.
भारतीय मूल के वोटर्स का चुनाव के नतीजों पर कितना असर?
जहाँ तक सवाल कश्मीर मुद्दे पर लेबर पार्टी के रुख से भारतीय मूल के वोटरों का उस पार्टी से दूर होने का है तो भारत में भारतीय जनता पार्टी के समर्थक यह सुनना चाहेंगे कि उनका बहुत असर पड़ा और थोड़ा बहुत असर पड़ा भी होगा. हो सकता है कि गुजराती समाज के जो लोग यहां रहते हैं और लेबर पार्टी का समर्थन किया करते थे उनका समर्थन कंजरवेटिव पार्टी को मिला होगा.
लेकिन ब्रिटेन में ज़्यादातर भारतीय अप्रवासी शहरों में रहते हैं. ब्रेडफर्ड, लिस्टर, लंदन, बर्मिंघम, इन सभी जगहों पर लेबर पार्टी को बड़ा नुकसान नहीं हुआ है.
इसका मतलब कि भारतीय मूल के वोटर्स का बहुत बड़ा असर नहीं पड़ा है.
हालांकि भारतीय मूल के कई वोटर्स नाराज़ ज़रूर थे. लेकिन उसका इस चुनाव के नतीजे पर बहुत ख़ास असर हुआ हो या भारतीय वोटर्स की वजह से फ़ैसले पर असर पड़ा हो, ऐसा नहीं लगता.
भारत और ब्रिटेन के रिश्तों के लिहाज से नतीज़ों के क्या मायने?
जहां तक विदेश नीति की बात है, उस पर कुछ ख़ास असर नहीं पड़ेगा. दोनों देशों के बीच बहुत मधुर रिश्ते रहे हैं. सारी समस्या व्यापारिक मुद्दों को लेकर है. एक दो बातों को लेकर तल्खी है.
कंजरवेटिव पार्टी की सरकार ने कुछ कदम उठाए थे, जैसे- भारतीय छात्र यहां आकर दो साल रह कर काम कर सकते हैं, उसका कुछ लाभ मिला है.
नई व्यापार नीति जो बनेगी उसमें भारत का हाथ थोड़ा मजबूत रहेगा. बोरिस जॉनसन चाहेंगे कि अच्छी से अच्छी व्यापारिक डील हो. इससे रिश्ते और घनिष्ठ होंगे.
अब यह सुनने में आ रहा है कि ऐसे अप्रवासियों को तरज़ीह दी जाएगी कि जो पढ़े लिखे हों, कुशल हों, निवेश के लिए आना चाहते हैं, बड़ी कंपनियों में काम करना चाहते हैं. इसमें भारत के लोग फिट बैठते हैं.
कुल मिलाकर लगता है कि दोनों देशों के बीच संबंध पहले से बेहतर होंगे.
मॉरीशस को लेकर भारत और ब्रिटेन के बीच कुछ मनमुटाव है. मॉरीशस के द्वीपसमूहों को देने से ब्रिटेन आनाकानी कर रहा है. इस मसले पर भी कुछ फ़ैसला हो सकता है.
इसके अलावा जालियांवाला बाग हत्याकांड के मामले में बोरिस जॉनसन अमृतसर जाकर जो माफ़ी मांगना चाहते थे. इस पर कुछ आगे बढ़ने की स्थिति में व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते में और सुधार आएगा.
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