स्पेन: जहां लेफ़्ट और राइट के साथ आए बिना नहीं बन सकती सरकार

पेद्रो सांचेज़

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इमेज कैप्शन, कार्यकारी प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ की सोशलिस्ट पार्टी ने सबसे अधिक 120 सीटें आम चुनावों में जीती हैं.
    • Author, मोहम्मद शाहिद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

भूमध्यसागर और अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच बसा देश स्पेन 16वीं सदी से 19वीं सदी तक विश्व शक्ति हुआ करता था. 1936 से 1939 तक यह देश गृह युद्ध में फंसा रहा जिसके बाद इस पर सैन्य तानाशाह फ़्रांसिस्को फ़्रेंको का राज था.

1975 में फ़्रांसिस्को फ़्रेंको की मौत के बाद इस देश में लोकतंत्र आया और एक आधुनिक अर्थव्यवस्था बनते हुए यह देश यूरोपियन यूनियन में भी शामिल हुआ. हालांकि इस देश का सर्वोच्च व्यक्ति यहां का राजा होता है जो इस समय किंग फ़िलिप हैं लेकिन यह केवल एक पद मात्र है.

मेडिटेरेनियन देशों की एक ख़ासियत रहती है कि वो थोड़े रूढ़िवादी, परंपरागत होते हैं, जहां उनका एक समाजिक ढांचा होता है. अगर इनकी उत्तरी यूरोपीय देशों से तुलना की जाए तो इनकी जीवनशैली भी अलग होती है. स्पेन भी एक ऐसा ही देश है.

70 के दशक से लेकर अब तक इस देश में रूढ़िवादी या वामपंथी पार्टी की सरकारें रही हैं. स्पेन में 16 से अधिक पार्टियां हैं जिनमें अधिकतर क्षेत्रीय पार्टियां भी शामिल हैं. हालांकि, इस देश में रूढ़िवादी पॉप्युलर पार्टी और समाजवादी पार्टी यानी पीएसओई का ही राज रहा है. पीएसओई को सोशलिस्ट्स पार्टी कहा जाता है और इस समय वो स्पेन में सत्तारुढ़ है.

रविवार को आए चुनाव परिणामों में संसद की 350 सीटों में से सोशलिस्ट्स पार्टी को 120 सीटें, पॉप्युलर पार्टी यानी पीपी को 88, वॉक्स को 52, वामपंथी पोडेमॉस को 35 और थ्योडाडानोस यानी दक्षिणपंथी सिटिज़न पार्टी को 10 सीटें मिली हैं.

पोडेमॉस के नेता

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इमेज कैप्शन, पोडेमॉस भी एक वामपंथी पार्टी है जिसको इन चुनावों में 35 सीटें मिली हैं.

क्यों नहीं मिल पा रहा बहुमत?

बहुमत के लिए 176 सीटों की ज़रूरत है जो इस बार भी किसी को नहीं मिल पा रहा है. इसी साल अप्रैल में भी चुनाव हुआ था लेकिन तब भी किसी को बहुमत नहीं मिल पाया था.

ऐसी क्या वजहें हैं जो इस बार भी किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है? इस सवाल पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में यूरोपीयन स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर शीतल शर्मा कहती हैं कि इसकी वजह स्पेन की क्षेत्रीय विविधता का होना है.

वो कहती हैं, "स्पेन की राजनीति हाल में इतनी उथल-पुथल भरी हो गई है कि वहां पिछले चार सालों में चार बार चुनाव हो चुके हैं और किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है. इस बार के आए परिणामों में सत्तारुढ़ सोशलिस्ट पार्टी को 120 सीटें मिली हैं जो अप्रैल में हुए चुनावों से तीन सीटें कम हैं. इन तीन सीटों के कारण सोशलिस्ट पार्टी की मोल-भाव की जो शक्ति है वो कम हो गई है क्योंकि इससे पता चलता है कि जनता के बीच में उनका प्रभाव कम हुआ है."

"स्पेन की राजनीति में क्षेत्रीय विविधताएं भी हैं क्योंकि स्पेन के दो प्रांतों में अलगाववादी आंदोलन चल रहा है जिनमें कैटेलोनिया के आंदोलन की चर्चा होती रहती है. इस सूरत में कंज़रवेटिव पार्टी चाहती हैं कि अलगाव न हो जबकि उदारवादी और वामपंथी कैटेलोनिया का पक्ष रखते हैं."

स्पेन

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इन राजनीतिक परिणामों में बदलाव का एक कारण प्रवासियों को भी बताया जा रहा है क्योंकि बीते 10 साल में यूरोप में प्रवासियों की एक आंधी चली है. इन प्रवासियों में शरणार्थी भी आए हैं जिन्होंने स्थानीय राजनीति के अलावा सामाजिक प्रणाली और सामाजिक विविधता को भी काफ़ी प्रभावित किया है.

यूरोपीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर गुलशन सचदेवा कहते हैं कि पूरे यूरोप में एक ट्रेंड चला है जिसमें दक्षिणपंथी पार्टियों को भारी समर्थन मिला है और यह ट्रेंड अब स्पेन भी पहुंच चुका है. उनका कहना है कि इन परिणामों में कैटेलोनिया के मुद्दे की भी बड़ी भूमिका रही.

प्रोफ़ेसर सचदेवा कहते हैं, "हाल ही में बनी वॉक्स पार्टी एक धुर-दक्षिणपंथी पार्टी है जिसे अच्छा बहुमत मिला है. पूरे चुनाव में कैटेलोनिया का मुद्दा हावी रहा. इसके चलते वॉक्स जैसी नई पार्टी को भारी लाभ मिला. जिस राजनीतिक अस्थिरता को ख़त्म करने के लिए दोबारा चुनाव हुए थे वो अब भी कायम है."

बुलफ़ाइट का एक दृश्य

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स्पेन कितना मज़बूत है?

यूरोप में स्पेन चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन वो उतनी मज़बूत नहीं है जितनी जर्मनी और फ़्रांस जैसे देशों की है. यहां 2012 से 2014 तक तकरीबन 26 फ़ीसदी बेरोज़गारी दर थी जो अब कम होकर 15 से 16 फ़ीसदी के बीच है.

भ्रष्टाचार के कारण पिछले साल पीपी के प्रधानमंत्री मारियानो रखॉय को इस्तीफ़ा देना पड़ा था जिसके बाद सोशलिस्ट नेता पेद्रो सांचेज़ ने प्रधानमंत्री पद संभाला था. देश की अर्थव्यवस्था पर शीतल शर्मा कहती हैं कि स्पेन में सिस्टम आउट ऑफ़ कंट्रोल है.

वो कहती हैं, "बेरोज़गारी के अलावा बाकी यूरोपीय देशों की तुलना में यहां के लोगों की तनख़्वाहें कम हैं. कम कुशलता वाले रोज़गार प्रवासियों के पास जा रहे हैं. यहां की नौकरशाही में बहुत सारे ख़र्चों के साथ-साथ भ्रष्टाचार फैला हुआ है. इसी भ्रष्टाचार के कारण पिछले साल कंज़रवेटिव पार्टी पीपी के प्रधानमंत्री मारियानो रखॉय को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. कुल मिलाकर पूरा सिस्टम आउट ऑफ़ कंट्रोल है."

वॉक्स पार्टी के नेता सेंटियागो एबास्कल

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इमेज कैप्शन, नई धुर-दक्षिणपंथी पार्टी वॉक्स ने कम समय में कई सीटें जीती हैं, उसके नेता सेंटियागो एबास्कल

गठबंधन सरकार बन पाएगी?

अप्रैल में हुए चुनावों में नई धुर-दक्षिणपंथी पार्टी वॉक्स को 23 सीटें मिली थीं जो अब बढ़कर 52 सीटें हो गई हैं. उस दौरान गठबंधन को लेकर कोई आम सहमति नहीं बन पाई थी और लेफ़्ट और राइट के साथ आए बिना सरकार बना पाना नामुमकिन सा है, तो क्या इस बार गठबंधन हो पाएगा?

इस पर प्रोफ़ेसर सचदेवा कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि धुर-दक्षिपंथी पार्टियां और वामपंथी पार्टियां साथ आ पाएंगी, क्योंकि उनके विचार एकदम अलग हैं. हालांकि, जनता बार-बार चुनाव होने से परेशान है. पोडेमॉस पार्टी, सोशलिस्ट के साथ आ जाएगी लेकिन छोटी मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी पार्टियों को इस बार कम सीटें मिली हैं जिसके कारण इनको फिर भी बहुमत मिलते नहीं दिख रहा है."

"कुछ दिनों तक सोशलिस्ट, पोडेमॉस सरकार बनाने की कोशिश करेंगी लेकिन पीपी और वॉक्स जैसी दक्षिणपंथी पार्टियां भी बहुमत लाती नहीं दिख रही हैं."

वहीं, शीतल शर्मा कहती हैं कि अगर सोशिलस्ट पार्टी, पीपी और वॉक्स जैसी धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ गठबंधन कर लेती है तो यह एक अशांत गठबंधन होगा.

वह कहती हैं, "राजनीतिक दलों को यह समझ में आने लगा है कि मतदाता बार-बार आकर मतदान नहीं करेगा. गठबंधन अगर बनता है तो इनको अपने राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर क्षेत्रीय चिंताओं पर सोचना होगा. अर्थव्यवस्था और समाज से जुड़ी चिंताओं के बारे में इन्हें सोचना होगा."

"रखॉय के जाने के बाद जब संचेज़ की सरकार बनी तो उसमें दक्षिणपंथियों का भी एक धड़ा था. इस सरकार के दौरान बेरोज़गारी दर कम हुई थी. स्पेन की अर्थव्यवस्था काफ़ी ख़राब थी जिसमें स्थिरता आई. अर्थव्यवस्था जब बढ़ती है तो जनता में संतोष आता है."

"अब देखना है कि नई सरकार किन मुद्दों पर आगे काम करेगी क्या वो कैटेलोनिया, शिक्षा, अर्थव्यवस्था को बदलने और पर्यावरण पर काम करेगी या नहीं. हालांकि, इनको इन सब मुद्दों पर काम करना पड़ेगा क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो परिस्थितियां और ख़राब हो जाएंगी. अगर एक और चुनाव होता है तो जनता का आत्मविश्वास और ख़त्म होगा. इस सूरत में दक्षिणपंथी पार्टियों को और बढ़त मिलेगी."

कैटेलोनिया के लिए प्रदर्शन करते लोग

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इमेज कैप्शन, स्पेन से अलग एक स्वतंत्र कैटेलोनिया राष्ट्र की मांग कर रहा प्रदर्शन अभी थमा नहीं है

स्पेन में एक बार और चुनाव होगा?

2017 में कैटेलोनिया में स्वतंत्रता के लिए जनमत संग्रह कराया गया था जिसके बाद देश में 40 सालों में सबसे बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया था. इसके बाद स्पेन सरकार ने अलगाववादी नेताओं को जेल भेज दिया. इन चुनावों में कैटेलोनिया समर्थित पार्टियों को 23 सीटें मिली हैं.

चुनाव परिणामों के बाद कैटेलोनिया का आंदोलन अब किस दिशा में जाता दिख रहा है? इस पर शीतल शर्मा कहती हैं, "दक्षिणपंथी पार्टियां अगर और बढ़त बनाती हैं तो इस सूरत में कैटेलोनिया की स्वायत्तता के लिए मुश्किलें पैदा होंगी. हाल ही में कुछ रिपोर्ट्स आई हैं कि पुलिस ने आंदोलनकारियों का दमन किया है और उन्हें जेल भेजा है. अगर दक्षिणपंथी पार्टियां साथ आती हैं तो कैटेलोनिया के आंदोलन पर ख़ासा असर पड़ेगा."

एक साल में दोबारा चुनाव होने पर दक्षिणपंथी पार्टियों का तेज़ी से उभार हुआ है और वामपंथी पार्टियों को झटका लगा है. क्या एक बार फिर चुनाव होने से दक्षिणपंथी पार्टियों को बढ़त मिलेगी.

प्रोफ़ेसर सचदेवा कहते हैं, "चुनाव अगले ही हफ़्ते नहीं शुरू हो जाएगा. पहले कई हफ़्तों तक गठबंधन की कोशिशें होंगी. अगर सरकार नहीं बन पाती है तो दोबारा चुनाव होने पर मुझे लगता है कि धुर-दक्षिणपंथियों को और लाभ मिलेगा. अभी धुर-दक्षिणपंथियों के पास भी इतनी संख्या नहीं है कि वो अपनी सरकार बना पाएं."

देश के कार्यकारी प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ ने गठबंधन की कोशिशें तेज़ कर दी हैं लेकिन अब आगे देखना यह है कि ख़ूबसूरत तटों, बुलफ़ाइट और ला टोमेटीना जैसे अनूठे त्योहार के लिए प्रसिद्ध इस देश में राजनीतिक संकट कब ख़त्म होता है.

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