उज़्बेकिस्तान में बच्चों की मौत के मामले में भारत सरकार हरकत में लेकिन कई सवाल मौजूद

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
उज़्बेकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय दवा कंपनी मेरियन बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड का सिरप पीने के बाद कम से कम 18 बच्चों की मौत हो गई है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक मंत्रालय ने कहा कि घातक सांस की बीमारी से जूझ रहे 21 में से 18 बच्चों ने डॉक 1 मैक्स सिरप का इस्तेमाल किया जिसके बाद उनकी मौत हो गई.
रॉयटर्स के मुताबिक मंत्रालय ने कहा कि सिरप के एक बैच में इथिलीन ग्लायकोल शामिल था जो कि एक हानिकारक पदार्थ है, और इस सिरप को कुरामैक्स मेडिकल कंपनी ने उज़बेकिस्तान में आयात किया था.
मंत्रालय ने अपने वक्तव्य में कहा कि बच्चों को ये सिरप को बिना किसी डॉक्टर की हिदायत के, या तो उनके माता-पिता के द्वारा या फ़ार्मेसिस्ट की सलाह पर दिया गया, और बच्चों की दी गई डोज़ स्टैंडर्ड डोज़ से ज़्यादा थी.
रिपोर्टों के मुताबिक मृत बच्चों के परिवारों का ताल्लुक जिज़्ज़ाक, काशकादर्या, नवोई और समरकंद इलाकों से था और सभी बीमार बच्चों की उम्र छह साल से कम थी और 15 बच्चों की उम्र तीन साल से कम थी.
इससे पहले अफ़्रीकी देश गांबिया में भी कम से कम 70 बच्चों की मौत के लिए दिल्ली की एक कंपनी की बनाई सर्दी और खांसी की सिरप को ज़िम्मेदार बताया गया था. भारत और कंपनी ने किसी ग़लती से इनकार किया था.
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गांबिया की एक संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था उसे इस बात का यकीन है कि मैदान फ़ार्मासूटिकल्स लिमिटेड गुनाहगार है और उसे गांबिया में कम से कम 70 बच्चों की मौत से जुड़ी दूषित दवाओं को निर्यात करने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.
कमेटी के प्रमुख अमादो कमारा ने ये भी कहा कि बच्चों की मौत की असली वजह की वैज्ञानिक जांच जारी है.
गांबिया के बाद अब एक और देश में भारतीय सिरप का नाम आने पर कांग्रेस के जयराम रमेश ने ट्वीट किया और कहा, "भारत में बनी खांसी की सिरप खतरनाक लगती है. पहले गांबिया में 70 बच्चों की मौत और अब उज़बेकिस्तान में 18 बच्चे. मोदी सरकार को भारत को दुनिया की फार्मेसी बुलाने के बारे में डींगे हांकनी बंद करनी चाहए और कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए."
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कफ़ सिरप को लेकर भारत में जांच शुरू
उज़्बेकिस्तान के समरकंद में 18 बच्चों की मौत को नोएडा स्थित मेरियन बायोटेक में बनाए गए कफ़ सिरप से जोड़ने के दावे के बाद भारत सरकार ने इस मामले में जांच शुरू कर दी है.
भारत सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इसकी विस्तृत जानकारी दी है.
इसमें बताया गया है कि मेरियन बायोटेक के नोएडा उत्पादन केंद्र पर मामले की जांच सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) और यूपी ड्रग्स लाइसेंसिंग अथॉरिटी कर रही है.
नोएडा स्थित इसके प्लांट से कफ़ सिरप का सैंपल लेकर चंडीगढ़ के रिजनल ड्रग्स टेस्टिंग लैबोरेटरी (आरडीटीएल) में भेजा गया है.
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मांडविया के निर्देश पर सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) इस मामले को लेकर 27 दिसंबर 2022 से उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रीय ड्रग्स नियामक संस्थान के साथ संपर्क में है.
इसमें बताया गया है कि मेरियन बायोटेक एक लाइसेंस प्राप्त उत्पादक है और उसके पास डॉक 1 मैक्स (Dok 1 Max) के उत्पादन का लाइसेंस मौजूद है.

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विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?
भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी उज़्बेकिस्तान के मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, "उज़्बेक अधिकारियों के मुताबिक ये मौतें बीते दो महीनों के दौरान हुई हैं."
"उज़्बेकिस्तान के अधिकारियों ने हमसे औपचारिक तौर पर इस मामले को नहीं उठाया, फिर भी हमने हमारे दूतावास ने उज़्बेकिस्तान में संबंधित पक्ष से संपर्क किया और इस मामले में उनकी जांच से जुड़े विवरण मांग रहे हैं.
"हम जानते हैं कि उज़्बेकिस्तान की ओर से इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई शुरू की गई है और उस संबंध में हम इससे जुड़े व्यक्ति या व्यक्तियों को ज़रूरी कॉन्सुलर सहायता दे रहे हैं."

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फ़ार्मा बाज़ार
भारतीय फ़ार्मा इंडस्ट्री की वैल्यू 50 बिलियन डॉलर के आसपास है. फ़ार्मा निर्यात में पिछले सालों तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है और भारत को दुनिया का फ़ार्मेसी कहा जाता है.
साल 2013-14 में जहां भारत का फ़ार्मा निर्यात 415 करोड़ था, साल 2021-22 में ये बढ़कर 1,83,422 करोड़ तक पहुंच गया. दुनिया की 60 प्रतिशत वैक्सीन और 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाइयां भारत से आती हैं.

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आशंकाएं
ऐसे में जानकारों को डर है कि ऐसी खबरों से भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को धक्का लग सकता है. वो ऐसी घटनाओं के पीछे भारत में क़ानूनों और नियमों के कमज़ोर क्रियान्वयन की ओर ध्यान खींचते हैं.
पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट टी सुंदररमन कहते हैं, "ये भारत के लिए बड़ा धक्का है क्योंकि चीन इस बाज़ार में घुसने का इंतज़ार कर रहा है. उनके पास पहले ही थोक ड्रग बाज़ार का कंट्रोल है. ऐसे दो और मामले सामने आए तो ये बाज़ार भारत से हट सकता है."
प्राइसवाटरहाउस कूपर्स के ग्लोबल हेल्थ एडवाइज़री लीडर सुजय शेट्टी बच्चों की मौत को सबसे बुरी दुर्घटना बताते हैं और मामले की जांच कर उसके जड़ में पहुंच कर कार्रवाई करने की बात कहते हैं.
वो कहते हैं, "अगर आपने ऐसा नहीं किया तो दूसरी बड़ी भारतीय कंपनियां जिन्होंने दिन रात एक करके अमरीका और ब्रिटेन जैसी एक्सपोर्ट्स मार्केट के स्टैंडर्ड्स को बरकरार रखा है, उन पर भी सवाल उठेंगे."

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सरकार हरकत में लेकिन कई सवाल
उज़बेकिस्तान से बच्चों की मौत की ख़बर आने के बाद भारत सरकार ने एक प्रेस नोट में बताया है कि वो लगातार उज़बेकिस्तान के ड्रग रेग्युलेटर के संपर्क में हैं और जानकारी मिलने के तुरंत बाद मारियान बायोटेक की नोयडा फ़ैक्ट्री की जांच की गई है.
ये जांच यूपी ड्रग कंट्रोल और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन की टीम की ओर से की गई और उनकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.
प्रेस नोट के मुताबिक सिरप के सैंपल की टेस्टिंग के लिए चंडीगढ़ की रीजनल ड्रग्स टेस्टिंग लैब में भेज दिया गया है.
कंपनी मारियान बायोटेक की ओर से हसन हैरिस ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि उनकी तरफ़ से कोई समस्या नहीं है, और टेस्टिंग में भी कोई समस्या नहीं है.
उन्होंने कहा, हम पिछले 10 सालों से अस्तित्व में हैं. जब सरकार की रिपोर्ट आएगी तो हम उसे देखेंगे. फिलहाल, मैन्युफ़ैक्चरिंग को रोक दिया गया है.
एक ड्रग इंस्पेक्टर के मुताबिक कंपनी की शुरुआत 2010 में हुई, उसकी दवाएं भारत में नहीं बिकतीं और उसका सिर्फ़ एक एक्सपोर्ट मार्केट है, और वो उज़बेकिस्तान. साथ ही डॉक-1 मैक्स सिरप का कोई सामान भारत में नहीं बेचा गया है.
लेकिन जिस गांबिया के बाद उज़बेकिस्तान से रिपोर्टें सामने आई हैं, सवाल कई हैं.
सुजय शेट्टी के मुताबिक ये छोटी कंपनियां भारतीय फ़ार्मा इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं क्योंकि भारत में बेहतरीन सिस्टम्स वाली कंपनियां और अमरीका की फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के स्वीकृति कई प्लांट हैं.
लेकिन जब कोई दूसरा देश कहता है कि आपकी कंपनी ने ऐसा किया तब पूरी इंडस्ट्री पर प्रश्न चिह्न लग जाता है, और इसे रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई ज़रूरी है.
वे कहते हैं, "अगर आपने कोई जांच की है तो निष्कर्षों को लोगों के सामने रखिए ताकि लोगों में विश्वास आए. जांच करना और उसके निष्कर्ष तक नहीं पहुंचना, ये उतना ही नुकसानदायक है."
"ये ऐसे बाज़ार हैं जहां भारतीय कंपनियां अपना व्यापार फैलाना चाहती हैं. फ़ार्मा कोई भी इंडस्ट्री नहीं है. ये आईटी क्षेत्र की तरह दुनिया में भारत को पहचान देती है. इस पर पड़ रहे किसी आक्षेप का तुरंत निपटारा होना चाहिए, और वो भी पारदर्शी तरीके से."
हेल्थ ऐक्टिविस्ट रवि दुग्गल के मुताबिक कई बड़ी फ़ार्मा कंपनियां बहुत सारा काम आउटसोर्स कर देती हैं और फिर दवाओं पर अपना ब्रैंड चिपका देती हैं जिससे सवाल उठते हैं कि नीचे के स्तर पर कौन दवाओं की क्वालिटी की मॉनिटरिंग कर रहा है.
पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट टी सुंदररमन के मुताबिक भारत में जहां सार्वजनिक खरीद पर एजेंसियों का नाममात्र का कंट्रोल होता है, भारत की निजी बाज़ार पर उनका बहुत कम नियंत्रण होता है, लेकिन निजी कंपनियों के निर्यात पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता है.
वो कहते हैं, "भारत के घरेलू बाज़ार के लिए ये अच्छी खबर नहीं है. इसमें रोज़गारी को लेकर सवाल हैं. ज़रूरी नहीं कि छोटी कंपनी का सामान खराब क्वालिटी का है, और ये ऐसे मामले हैं जो ऐसी ही बातों को उठाते हैं. ऐसी घटनाओं से घरेलू मैन्युफ़ैक्चरिंग को नुकसान पहुंचेगा."
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