वो मां जिसने अपने ऑटिस्टिक बेटे पर कॉमिक बुक बनाई

मुग्धा कालरा का बेटा माधव ऑटिस्टिक है.
इमेज कैप्शन, मुग्धा कालरा का बेटा माधव ऑटिस्टिक है.
    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

ये सब तब शुरू हुआ जब मुग्धा कालरा को एहसास हुआ कि वो 'एक ऑटिज़्म के गांव' में नहीं रहना चाहतीं, जहां वो सिर्फ खास ज़रूरतों वाले बच्चों, उनके मां-बाप, डॉक्टर और थेरेपिस्ट्स से मिलें.

जब से उन्हें पता चला था कि उनका बेटा माधव ऑटिस्टिक है, तबसे यही उनकी ज़िंदगी बन गई थी. ऑटिज़्म एक 'डेवलेपमेंटल डिसएबिलिटी' है जिसमें और लोगों से मिलने-जुलने और अपनी बात कहने में दिक्कत आती है.

माधव तीन साल का था जब उसकी दादी ने देखा कि वो किसी से भी बात करते वक्त नज़र से नज़र नहीं मिलाता.

धीरे-धीरे उसने बात करना लगभग बंद ही कर दिया और हाव-भाव से ही अपनी बात ज़ाहिर करता.

मुग्धा के मुताबिक वो शुरुआती साल बहुत मुश्किल थे. माधव कई बार बिगड़ जाता, हाथ-पैर पटकने लगता. मुग्धा ने एक डायरी में लिखना शुरू किया ताकि उसे परेशान करने वाली बातों की सूची बना सके.

इस समय में ऑटिज़्म से जुड़े परिवार और डॉक्टरों ने ही मुग्धा की मदद की और रास्ता दिखाया.

पर एक वक्त आया जब मुग्धा को लगा कि वो सिर्फ 'ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम वाली ज़िंदगी' नहीं जीना चाहती. वो अपने बेटे के लिए और बहुत चाहती हैं.

मुग्धा ने कहा, "हर मां-बाप के लिए सबसे ज़रूरी बात होती है कि हमारे बाद क्या होगा? मैं चाहती हूं कि ये दुनिया उतनी ही मेरी और मेरे बेटे की हो, जितनी औरों की है. इसीलिए मैंने उसे बाहर ले जाना शुरू किया, लोगों से मिलवाना शुरू किया, तभी वो अपनी ज़िंदगी जी सकेगा."

माधव को गुब्बारे फुलाने का शौक है.

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इमेज कैप्शन, माधव को गुब्बारे फुलाने का शौक है.

माधव ऐसा क्यों है?

पर लोगों, ख़ासतौर पर बच्चों, के पास कई सवाल थे, क्योंकि माधव अलग दिखता था जिससे वो असहज हो जाते थे. जैसे जब वो 'स्टिम' करता है यानी एक ही तरीके से हाथ या सिर हिलाता है ताकि खुद को शांत कर सके.

वो 11 साल का है पर दिमाग अब भी छह साल के बच्चे जैसा है. अपनी उम्र से कहीं छोटे बच्चे सा व्यवहार करता है. ज़्यादा बोलता नहीं, और अपने में ही गुम रहता है.

भारत में ऑटिज़्म के बारे में कई भ्रांतिया हैं और सही जानकारी का अभाव है ऐसे में आम लोगों के साथ संपर्क बढ़ाने में दिक्कतें आती हैं.

मुग्धा के भांजे-भतीजे अक्सर पूछते कि माधव उनके साथ खेलता क्यों नहीं है? अपने कानों पर हाथ क्यों रख लेता है? नाराज़ रहता है क्योंकि उनकी तरफ देखता नहीं है या उनकी सुनता नहीं है.

इन सवालों का जवाब मुग्धा ने एक कॉमिक बुक बनाकर निकाला.

'नॉट दैट डिफरेंट' कॉमिक
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'नॉट दैट डिफरेंट'

'नॉट दैट डिफरेंट' नाम की इस कॉमिक के प्रमुख किरदार का नाम माधव है और कहानी उसके एक आम स्कूल जाने के अनुभव के इर्द-गिर्द बुनी गई है.

मुग्धा के लिए माधव को कॉमिक का 'न्यूरोडाइवर्स' किरदार बनाना एक सहज फैसला था.

उन्होंने बताया, "मैं उसे छुपाती क्यों? मैं तो उसके अनुभव को एक आवाज़ देना चाहती हूं. और अगर आप चाहते हैं कि लोग आपकी बारीक चुनौतियां समझें तो आपको उनसे अपने निजी अनुभव बांटने ही होंगे."

'न्यूरोडाइवर्सिटी' दुनिया भर में बनती एक नई समझ है जिसके तहत ऑटिज़्म, एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपरऐक्टिविटी डिसऑर्डर), डिसलेक्सिया, डिसप्रैक्सिया इत्यादि 'डेवलपमेंटल डिसऑर्डर्स' वाले लोगों के दिमाग को औरों से कुछ अलग भर ही देखते हुए उनकी अन्य खूबियों को तवज्जो दी जाती है.

ब्रितानी सरकार का अनुमान है कि वहां हर सात में से एक व्यक्ति न्यूरोडाइवर्स है. भारत अभी तक न्यूरोडाइवर्सिटी पर कोई जानकारी इकट्ठा नहीं करता.

माधव के ऑटिज़म के बारे में तीन साल की उम्र में पता चला.

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इमेज कैप्शन, माधव के ऑटिज़्म के बारे में तीन साल की उम्र में पता चला.

कॉमिक के किरदार

कॉमिक बुक के लिए मुग्धा ने तीन महिलाओं के साथ काम किया. ये सभी न्यूरोडाइवर्स बच्चों के बाकि बच्चों के साथ घुलने-मिलने के लिए पहल करना चाहती थीं.

निधि मिश्रा बच्चों के लेखन को प्रकाशित करने वाले डिजिटल प्लैटफॉर्म 'बुकॉस्मिया' की संस्थापक हैं, आयुषी यादव बच्चों की कहानियों की इलस्ट्रेटर, और अर्चना मोहन बच्चों की कहानियों की लेखक हैं.

आयुषी ने इस प्रोजेक्ट से पहले माधव जैसे बच्चे के साथ कभी वक्त नहीं बिताया था.

वो अपनी इलस्ट्रेशन्स में बच्चों और उनके हाव भाव को बहुत उभार देती थीं. उदाहरण के लिए, हंसता चेहरा हो तो सारे दांत दिखाई देते और पीछे का हलक भी.

माधव का चित्र बनाना इससे एकदम उलट अनुभव था.

आयुषी ने बताया, "मैं बच्चों के प्यारे से गोल-गोल चेहरे बनाती थी. और एक माधव था, लंबा, पतला और भाव-हीन. इस फर्क को देख मैंने सोचा कि आम सोच में जिसे हम आकर्षक मानते हैं, हम वैसे ही एक जैसे चेहरे बनाते चले जाते हैं."

उन्हें डर था कि उनके चित्र में माधव मंदबुद्धि या बदतमीज़ ना लगे.

मुग्धा माधव की तस्वीरें टीम को भेजतीं, ज़ूम कॉल पर उसका कमरा दिखातीं और अपनी ज़िंदगी के वो सारे अनुभव बांटतीं जो कॉमिक बुक की कहानी का आधार बने.

कॉमिक का वो हिस्सा जिसमें माधव अपने हाथ कानों पर रख लेता है क्योंकि उसे शोर पसंद नहीं है.

जैसे कॉमिक का वो हिस्सा जिसमें माधव अपने हाथ कानों पर रख लेता है क्योंकि उसे शोर पसंद नहीं है.

ये बात मुग्धा ने माधव के ऑटिज़्म का पता लगने के कुछ साल बाद सीखी. माधव का छठा जन्मदिन था और उसके मां-बाप ने कई दोस्तों और रिश्तेदारों को बुलाया था. पर ये पार्टी माधव के लिए बर्दाश्त करनी तक मुश्किल हो गई.

मुग्धा ने बताया, "उसे इतना ज़्यादा लोगों का होना, ज़ोर ज़ोर से 'हैप्पी बर्थडे' गाना, बच्चों का उसके कमरे में उसकी चीज़ों को छूना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा. उस साल ने मुझे बहुत कुछ सिखाया, कि जो मैं उसके लिए ठीक समझती हूं उसे शायद वो चाहिए ही नहीं. तो अब उसके जन्मदिन पर हम उसके कमरे की छत गुब्बारों से भर देते हैं, उसका पसंदीदा खाना (नूडल्स) बनाते हैं और एक या दो दोस्तों के साथ चिड़ियाघर चले जाते हैं."

पर कॉमिक के लिए प्रकाशक ढूंढना आसान नहीं था. पारंपरिक प्रकाशक इस विषय से घबराते थे. उन्हें लगता था कि इसमें रुचि कम होगी और लोग इससे जुड़ेंगे नहीं.

निधि मिश्रा की वेबसाइट, 'बुकॉसमिया' वो खतरा मोल लेने को तैयार थीं.

निधि ने बताया, "बच्चे अब न्यूरोडाइवर्सिटी के बारे में जानने के लिए तैयार हैं. हमारी वेबसाइट के लिए सैकड़ों बच्चों ने लिखा है और वो जिन मुद्दों के बारे में लिख रहे थे वो माहवारी से जुड़े मिथक से लेकर परिवारों के जाति और आर्थिक वर्गों में भेदभाव की संस्कृति को बढ़ावा देने से जुड़े थे. हमें लगा उनकी समझ बहुत विकसित है और वो इस कॉमिक का सार समझ सकेंगे."

माधव के माता-पिता पत्रकार हैं.

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इमेज कैप्शन, माधव के माता-पिता पत्रकार हैं.

डर की जगह उम्मीद

मुग्धा अब एक ऑटिस्टिक बच्चे को बड़ा करने के अनुभव पर अपना ब्लॉग, यूट्यूब चैनल और इंस्टाग्राम हैंडल चलाती हैं.

उनका मानना है कि बांटने की कोशिश करें तो लोग भी समझने की कोशिश करते हैं. इस विश्वास ने उन्हें अपने अंदर के डर से जीतने में भी मदद की है.

साल 2019 में माधव को पहली बार दौरा पड़ा. वो घर से बाहर निकल रहे थे कि वो अचानक मुग्धा पर गिर पड़ा. शरीर जकड़ गया और वो तेज़ तेज़ हिलने लगा. घबराए मां-बाप उसे तुरंत अस्पताल लेकर गए जहां एमआरआई और दवाओं के बाद वो संभल गया.

मुग्धा के मुताबिक उस दिन के अनुभव ने उन्हें अंदर से झकझोर दिया और वो भगवान और दुनिया से बहुत नाराज़ हुईं.

तब से अब तक माधव की तबीयत ठीक रही है. पर ऐसे दौरे की संभावना गई नहीं.

इसके बावजूद मुग्धा ने माधव को बाहर ले जाना बंद नहीं किया. वक्त लगा पर उन्होंने खुद को डर के साए की जगह खुशी की उम्मीद में जीना सिखाया है.

मुग्धा ने बताया, "मेडिटेशन से मुझे बहुत मदद मिली, ये समझने में कि माधव मुझे ही क्यों पैदा हुआ. उसके साथ रहना बहुत शांति देता है, मानो भगवान के करीब हो. वो इतना मासूम है कि लगता है बस वो आपके करीब होने भर से संतुष्ट हो जाता है."

"इसीलिए मैं ये कर रही हूं ताकि मैं उसे ऐसी दुनिया में छोड़ पाऊं जो उसे प्यार दे, समझे. और अगर प्यार ना कर पाए, तो कम से कम समझे या उसे उसकी तरह रहने दें."

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