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गुजरात में दलित आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या, जनवरी में मिली थी सुरक्षा
- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
- प्रकाशित
गुजरात में जब सबकी नज़रें स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों पर टिकी थीं तभी बुधवार की शाम भावनगर के सानोदर गाँव में एक दलित आरटीआई एक्टिविस्ट अमरभाई बोरिचा को मौत की नींद सुला दिया गया.
आरोप है कि अमरभाई पर एक समूह ने हमला किया था. कहा जा रहा है कि हमलावर, गाँव में एक कांग्रेस उम्मीदवार की जीत का जश्न मना रही भीड़ का हिस्सा थे.
जब मैं यह रिपोर्ट लिख रहा हूँ तब सीनियर पुलिस अधिकारी और दलित एक्टिविस्ट और अमरभाई बोरिचा के परिजन भावनगर के सर टी हॉस्पिटल में शव को लेकर आपस में बहस कर रहे हैं.
पुलिस शव को अपने नियंत्रण में लेकर अंत्येष्टि करना चाहती है जबकि परिवार वालों की माँग है कि इस हत्या में जिन लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई, उन्हें पहले गिरफ़्तार किया जाए. परिवार वालों की एक मांग यह भी है स्थानीय पुलिस सब-इंस्पेक्टर के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाए जो बोरिचा को सुरक्षा देने में नाकाम रहे. बोरिचा ने पहले ही पुलिस से सुरक्षा देने की मांग एक पत्र लिखकर की थी.
बीबीसी से भावनगर रेंज के आईजी अशोक यादव ने कहा कि पुलिस की टीम सभी अभियुक्तों को गिरफ़्तार करने में लगी हुई है. अशोक यादव ने कहा, ''राज्य में अब भी आचार संहिता लागू है ऐसे में सब इंस्पेक्टर पीआर सोलंकी का तबादला करना मुश्किल है. लेकिन हमने सोलंकी के ख़िलाफ़ जाँच शुरू कर दी है. हम जल्द ही उचित कार्रवाई करेंगे.''
पुलिस सुरक्षा के बावजूद हमलावरों ने किया हमला
एफ़आईआर में लिखा हुआ है कि बोरिचा की सुरक्षा में इसी साल दो जनवरी को निहत्थे पुलिसकर्मी की ड्यूटी लगाई गई थी. हालाँकि उनकी जान का ख़तरा ज़्यादा था और बोरिचा चाहते थे कि उनकी सुरक्षा में बंदूकधारी पुलिसकर्मी की ड्यूटी लगे.
स्थानीय पुलिस सब इंस्पेक्टर पीआर सोलंकी ने बोरिचा की इस मांग को ख़ारिज कर दिया था. आरोप है कि सोलंकी ने इस मांग को लेकर बोरिचा को अपमानित भी किया था. बोरिचा की बेटी निर्मला ने अपनी शिकायत में कहा है कि जब उनके पिता पर हमला हुआ तो निहत्था पुलिसकर्मी मौजूद था लेकिन वो कुछ कर नहीं पाया और हमलावरों ने जान ले ली.
पूरा मामला क्या है?
सानोदर गाँव में बोरिचा का परिवार एक मात्र दलित परिवार है. बोरिचा ने गाँव के विकास और मनरेगा स्कीम के फंड की जानकारी हासिल करने के लिए कई आरटीआई दाख़िल किए थे. इससे पहले कथित ऊंची जाति के कुछ लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर भी दर्ज कराई गई थी. इन पर आरोप है कि बोरिचा कथित रूप से वैसी ज़मीन की जुताई कर रहे थे जिसका स्वामित्व किसी के पास नहीं था, तभी हमला किया.
निर्मला का कहना है कि इस मामले में अदालत आठ मार्च को फ़ैसला सुनाएगी. निर्मला का यह भी कहना है कि उनके पिता पर इस मुक़दमे को लेकर दबाव बनाया जा रहा था कि अदालत से बाहर इसे सुलझा लिया जाए.
एक स्थानीय दलित एक्टिविस्ट अरविंद मकवाना ने बीबीसी से कहा कि बोरिचा इस मामले में झुके नहीं इसलिए उनकी हत्या कर दी गई.
गुजरात में आरटीआई एक्टिविस्ट और उनकी सुरक्षा
कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव वेबसाइट के अनुसार गुजरात में पिछले 11 सालों में अब तक 12 आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या हो चुकी है. मार दिए गए आरटीआई एक्टिविस्ट की सूची में बोरिचा 13वें नंबर पर हैं.
इस वेबसाइट के अनुसार देश भर में 89 आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या हुई है. गुजरात में 17 आरटीआई एक्टिविस्टों पर जानलेवा हमले हुए हैं और देश भर में यह तादाद 173 है. इसके अलावा गुजरात में 17 वैसे आरटीआई एक्टिविस्ट हैं जिन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ा या धमकियाँ मिलीं. राष्ट्रीय स्तर पर यह तादाद 185 है.
गुजरात में जिन आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या हुई, उनके नाम इस तरह हैं- चिराग पटेल (मार्च 2019), नांजी सोंदार्वा (मार्च 2018), राजेश सवालिया (जुलाई 2018), कार्सन अला (जनवरी 2016), रतनसिंह चौधरी (अक्टूबर 2015), शैलेश कांतिलाल (जून 2015), अमित कपासिया (दिसंबर 2011), जयेश बरोट (नवंबर 2011), योगेश शेखर (नवंबर 2011), नदीम सईद (नवंबर 2011), अमित जेतवा (जुलाई 2010), विश्राम दोदिया (फ़रवरी 2010).
गुजरात में क्या आरटीआई को कमज़ोर बना दिया गया है?
आरटीआई एक्टिविस्ट पंक्ति जोग मानती हैं कि यहाँ आरटीआई एक्ट के कई सेक्शन को कमज़ोर कर दिया गया है. आधिकारिक रूप से यहाँ आरटीआई में एक संशोधन किया गया है लेकिन सरकारी अधिकारियों के नकारात्मक रवैए के कारण इस एक्ट की धार पहले ही मोटी कर दी गई है.
पंक्ति कहती हैं कि सरकारी विभागों से जुड़ी जानकारी ख़ुद से ही सार्वजनिक कर देनी चाहिए लेकिन ये ना तो ख़ुद से करते हैं और न ही मांगने पर देते हैं. पंक्ति कहती हैं कई कारण बताकर सरकारी अधिकारी सूचना देने से इनकार कर देते हैं.
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