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पेट्रोल और घरेलू गैस के बढ़ते दामों का आपकी जेब पर कितना असर होगा?
- Author, निधि राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
देश के कुछ हिस्सों में पेट्रोल के दाम 100 रुपये प्रति लीटर से भी ज़्यादा हो गए हैं. इसके अलावा पिछले दिनों घरेलू गैस की क़ीमत भी 50 रुपये प्रति सिलेंडर की दर से बढ़ी है. 14.2 किलोग्राम वाले गैस सिलेंडर की क़ीमत 796 रुपये हो चुकी है.
मुंबई में घरेलू पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) की क़ीमत 95 पैसे प्रति यूनिट बढ़ाया गया है, इस बढ़ोत्तरी से मुंबई में सात लाख परिवारों पर असर पड़ा है.
पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें पेट्रोलियम कंपनियां प्रति दिन के हिसाब से बढ़ाती हैं जबकि घरेलू एलपीजी गैसों की क़ीमतें हर महीने पहली और 16वीं तारीख को तय होती हैं.
पेट्रोल पर आम आदमी केंद्र और राज्य को टैक्स के रूप में 60 प्रतिशत राशि चुकाता है जबकि डीज़ल के लिए उसे 54 प्रतिशत रकम चुकाना पड़ रहा है. मौजूदा समय में केंद्र सरकार पेट्रोल पर प्रति लीटर 32.90 रूपये का टैक्स वसूलती है जबकि डीज़ल के लिए यह 31.80 रुपये है.
लगातार बढ़ती महंगाई
मार्च के मध्य से अब तक पेट्रोल के दामों में प्रति लीटर 19.7 रुपये की बढ़ोत्तरी हो चुकी है जबकि इसी दौरान डीज़ल के दाम 17.41 रूपये प्रति लीटर बढ़े हैं. इसकी इकलौती वजह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कम होती क़ीमतों के दौरान भी सरकार की ओर टैक्स को बढ़ाना रहा.
पिछले दिनों संसद में पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि पेट्रोलियम पदार्थों पर से एक्साइज ड्यूटी घटाने का सरकार का कोई इरादा नहीं है.
तेल की लगातार बढ़ती क़ीमतों को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों का आक्रोश भी दिखा है. एक तरफ़ कोरोना महामारी के चलते लोगों की नौकरियां चली गई हैं, उनके आय के साधनों पर असर पड़ा है और दूसरी तरफ़ महंगाई लगातार बढ़ रही है.
यूपीए शासनकाल के दौरान पेट्रोलियम ईंधन की बढ़ती क़ीमतों का विरोध करने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की पुरानी तस्वीरों पर बने मीम्स इन दिनों सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं. इतना ही नहीं ट्विटर पर #ModiFuelScam जैसे हैशटैग भी नजर आए हैं.
घरेलू गैस और पेट्रोल के बढ़ते दामों का असर आम आदमी की जेब पर सीधे तौर पर पड़ रहा है जबकि डीज़ल के बढ़ते दामों का असर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ रहा है. डीज़ल के दाम बढ़ने से सब्जी और फलों के दाम बढ़ रहे हैं क्योंकि उनको ढोने का ख़र्च बढ़ रहा है. आख़िर में इसका असर आम आदमी की जेबों पर ही पड़ रहा है.
मुंबई के उपनगरीय इलाक़े में एक सब्जी वेंडर ने बीबीसी से पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, "इसको ढोने का ख़र्च बढ़ रहा है. हमें अपने खुदरा दामों में इसे एडजस्ट करना पड़ रहा है. किसी न किसी को तो डीज़ल के बढ़ते दामों की क़ीमत चुकानी पड़ेगी."
शहरी वर्ग पर असर ज्यादा
विश्लेषकों के मुताबिक पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दामों का असर शहरी भारत पर ग्रामीण भारत की तुलना में ज़्यादा पड़ रहा है.
इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च के प्रमुख अर्थशास्त्री सुनील कुमार सिन्हा ने बताया, "यह भी स्पष्ट है कि ख़राब मानसून के चलते ग्रामीण भारत को भी कृषि कार्यों के लिए डीज़ल पर निर्भर रहना होगा."
हालांकि दिलचस्प यह है कि महंगाई दर पिछले 16 महीनों के सबसे निचले दर पर है. जनवरी, 2021 में महंगाई दर 4.1% आंकी गई है जबकि दिसंबर में यह 4.6% थी.
इसकी वजह सब्जी और फलों का सस्ता होना भी रहा है. लेकिन इससे आम आदमी को कोई राहत नहीं मिली है क्योंकि उसे पट्रोल और घरेलू गैस के लिए कहीं ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं.
वाहन में प्रयुक्त होने वाले पेट्रोल और डीज़ल इंडेक्स में जनवरी, 2020 की तुलना में 13% की बढ़ोत्तरी देखी गई है, जबकि घरेलू गैस में यह वृद्धि 11% की आंकी गई है.
मीडिया में प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक बस किराया में जनवरी, 2020 की तुलना में इस जनवरी में 12% की वृद्धि हुई है, वहीं टैक्सी और ऑटोरिक्शा के किरायों में 7% की बढ़ोत्तरी देखने को मिली है. हालांकि इसकी वजह केवल ईंधन के दामों का बढ़ना नहीं हैं.
केयर रेटिंग्स की रिसर्च एनालिस्ट उर्विशा जगाशेठ ने बताया, "होलसेल प्राइस इंडेक्स में कच्चे तेल और उसके उत्पादों की हिस्सेदारी 10.36% की है. इसलिए कच्चे तेल के दामों में किसी भी बढ़ोत्तरी और कमी से खुदरा प्राइस इंडेक्स पर बड़ा असर पड़ता है. जबकि कच्चे तेल की कीमतों का कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स पर असर परिवहन पर होने वाले ख़र्च से पड़ता है, जिसकी हिस्सेदारी महज 2.39% है. इसलिए कच्चे तेल के दामों का असर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स से ज़्यादा होलसेल प्राइस इंडेक्स पर पड़ता है."
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