शाहनवाज़ हुसैन: केंद्र की राजनीति से बिहार के मंत्रिमंडल तक, क्या है मक़सद

    • Author, नीरज सहाय
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

अटल-आडवाणी युग के एक युवा राजनेता सैयद शाहनवाज़ हुसैन को 26-27 साल बाद मोदी युग की भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र से बिहार की राजनीति की ओर धकेल दिया है.

मुस्लिम समुदाय से आने वाले सैयद शाहनवाज़ हुसैन का निर्विरोध चयन बिहार विधान परिषद सदस्य के रूप में 21 जनवरी को हुआ और मंगलवार नौ फरवरी को वो बिहार कैबिनेट में उद्योग मंत्री बने.

पहली बार बिहार की राजनीति में आने वाले सैयद शाहनवाज़ हुसैन बिहार बीजेपी के पहले मुसलमान नेता हैं जिन्हें पार्टी ने पहले उच्च सदन का सदस्य बनाया और फिर मंत्री.

राजनीतिक प्रेक्षकों को चौंकाने वाला यह निर्णय बीजेपी के तेवर का नया संकेत माना जा रहा है.

उच्च सदन में पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की खाली हुई सीट पर उनका चयन हुआ. चूँकि वे राष्ट्रीय स्तर के नेता थे इसलिए यह चर्चा है कि उनको सुशील कुमार मोदी के बराबर ही दर्जा दिया गया है.

सैयद शाहनवाज़ हुसैन संजय पासवान के बाद दूसरे केंद्रीय मंत्री हैं जिन्हें बीजेपी ने उच्च सदन का सदस्य बनाया है. दिवंगत रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के जनाधार को साधने के लिए संजय पासवान को बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया गया था.

'पूरे हिंदुस्तान की राजनीति बिहार में रहकर करूँगा'

माना जा रहा है कि सुपौल में जन्मे और किशनगंज-भागलपुर के सांसद रहे सैयद शाहनवाज़ हुसैन के माध्यम से बिहार में ओवैसी फैक्टर को काटने की तैयारी हो सकती है. साथ ही जम्मू-कश्मीर के ज़िला चुनावों में बीजेपी को मिली सफलता और उसमें शाहनवाज़ की भूमिका के लिए एक पुरस्कार माना जा रहा है.

साल 1986 से पार्टी से जुड़े सैयद शाहनवाज़ हुसैन इन तमाम बातों पर अपना पक्ष रखते हैं और कहते हैं कि "परिषद का सदस्य और मंत्री पूरे बिहार के लिए बना हूँ इसलिए पूरे राज्य के लिए ज़िम्मेवार हूँ. दरकिनार कहाँ, बिहार से ही थे और उससे अलग हम कहाँ थे. साल 2014 तक यहीं से सांसद रहा. जब देश में अब तक का सबसे कम उम्र का कैबिनेट मंत्री बना तब भी बिहार से ही सांसद रहा."

"हाँ सात साल से संसदीय राजनीति से अलग था. पार्टी के केंद्रीय सांगठनिक कार्यों में लगा था इसलिए दिल्ली रहा. और अब पार्टी की सोच के अनुरूप पूरे बिहार का प्रतिनिधित्व करूँगा. बीजेपी में किसी भी मुद्दे को अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के नज़रिये से नहीं देखा जाता है. बिहार की 14 करोड़ जनता को कैसे रोज़गार मिले, कैसे उद्योग का जाल राज्य में बिछे इन्हीं बिंदुओं पर मैं काम करूँगा. "

"लोकसभा में एक पार्टी के नेता हैदराबाद से हैं और जिस इलाके का वो दंभ भरते हैं मैं वहां का सांसद रहा हूँ. मेरा मतलब किशनगंज से है जहाँ से मैं पहली बार 1999 में जीता था. पूरे हिंदुस्तान की राजनीति बिहार में रहकर करूँगा. फिर चाहे वह प. बंगाल का चुनाव हो या केरल-तमिलनाडु का, सब जगह जाऊँगा."

उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती

बिहार में नई ज़िम्मेदारी मिलने और उस पर खरा उतरने की चुनौतियों के बीच सैयद शाहनवाज़ हुसैन को बिहार की राजनीति में लाने को लेकर लोगों की अलग-अलग राय भी है.

पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतकर राज्य में दस्तक दे चुकी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान का सीधे-सीधे मानना है कि पार्टी ने सैयद शाहनवाज़ हुसैन को पश्चिम बंगाल के चुनाव की वजह से विधान परिषद का सदस्य और मंत्री बनाया है.

वो कहते हैं कि "बीजेपी या सैयद शाहनवाज़ हुसैन साहब को मुस्लिम मुद्दों, मुस्लिम तहज़ीब, मुस्लिम पर्सनल लॉ से कोई मतलब नहीं रहा है. मुसलमानों पर जो एनआरसी-एनपीआर जैसी तलवार लटकी हैं उससे भी कोई मतलब नहीं है. इनको तो बाबरी मस्जिद टूटने का भी कोई गम नहीं है."

"इन्हें तो पार्टी ने पश्चिम बंगाल चुनाव को देखते हुए यहाँ लाया है. सीमांचल में हमारा वोट काटना इनका मंसूबा हो सकता है, लेकिन पिटे हुए मोहरे से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता."

उधर बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय मंत्री रामेश्वर चौरसिया का मानना है कि "फिलहाल पार्टी में दो वरीय अल्पसंख्यक चेहरे ही हैं. बिहार में पार्टी का कोई अल्पसंख्यक चेहरा नहीं था. ऐसे में शाहनवाज़ हुसैन को राज्य में लाने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा सबका साथ-सबका विकास को बल मिलेगा."

बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे सरयू राय के अनुसार "मैंने उन्हें कभी पार्टी के मुसलमान चेहरे के रूप में नहीं देखा. वो बीजेपी के पुराने नेता रहे हैं और अब पार्टी की प्रदेश इकाई उनका उपयोग करेगी. मेरा मानना है कि महज़ मुस्लिम चेहरा देने से मुसलमानों के बीच बीजेपी की पैठ बढ़ नहीं जाएगी."

वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष यशवंत सिन्हा के अनुसार, "बीजेपी ने एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की है. बिहार में एक मुस्लिम चेहरा मिल गया और इसी आधार पर मुसलमान समुदाय को एक संदेश देने का प्रयास किया गया है. बीजेपी चाहे कुछ भी कर ले एक नहीं कई और शाहनवाज़ हुसैन ले आए, लेकिन बीजेपी की ओर मुसलमान मुखातिब नहीं होंगे."

क्या है बीजेपी की राजनीति?

इस पूरे प्रकरण पर बिहार के वरिष्ठ पत्रकार कुमार दिनेश का मानना है कि शाहनवाज़ बीजेपी के प्यादा नहीं वज़ीर हैं.

वो कहते हैं कि "सैयद शाहनवाज़ हुसैन को बिहार लाकर बीजेपी ने फिलहाल 27 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं वाले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के लिए एक स्टार प्रचारक को ताकतवर बनाया है, लेकिन वह बिहार की राजनीति में इसका दूरगामी लाभ उठा सकती है."

"जब यहाँ राष्ट्रीय जनता दल एक अनुभवहीन को युवा मुख्यमंत्री के रूप में आगे रख कर राजनीति कर रहा है, तब बीजेपी पढ़े- लिखे और शालीन युवा शाहनवाज़ को 2025 में सीएम फेस के रूप में पेश कर एकबार फिर चौंका सकती है. शाहनवाज़ को आगे करने से तेजस्वी यादव और उनके मुसलमान वोट बैंक, दोनों पर पार्टी का वार अचूक होगा. उनको आगे कर बीजेपी अपने भीतर के सवर्ण-पिछड़ा टकराव से भी बच जाएगी."

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं कि "शाहनवाज़ हुसैन को बिहार की राजनीति में उतारने का निर्णय बीजेपी की उस दुविधा से उत्पन्न लगता है जो दुविधा इस बार के विधानसभा चुनाव के बाद पैदा हुई. दुविधा इस संदर्भ में कि बीजेपी बड़ी पार्टी के रूप में तो उभरने में सफल रही, लेकिन दूसरी तरफ जो एक उम्मीद थी कि राजद का प्रदर्शन खराब रहेगा वह चुनाव परिणाम के बाद धूमिल सा हुआ. ऐसा 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम और विधानसभा चुनाव में लालू जी की सक्रियता नहीं होने के कारण माना जा रहा था. लेकिन, परिणाम उसके विपरीत आया और राजद सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी."

"चुनाव के बाद बीजेपी के भीतर मुस्लिम-यादव गठजोड़ को लेकर मंथन चल रहा था. शाहनवाज़ को लाना दूरगामी सोच का परिणाम है. मुसलमानों के विरोध को कम करने की दिशा में उठाया हुआ यह कदम हो सकता है. राजद से जब सीधा-सीधा आमना-सामना होगा उस समय की यह लामबंदी है."

वहीं वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार के अनुसार "पूरी तरह से किसी समुदाय के बीच पार्टी का जुड़ाव कैसे दिखाया जाए यह प्रयास उसी को लेकर है. सैयद शाहनवाज़ हुसैन जैसे चेहरों को आगे लाकर बीजेपी यह बताना चाहती है उसके साथ अल्पसंख्यक भी हैं. इसीलिए उनको बिहार की राजनीति से जोड़ा गया है."

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