छत्तीसगढ़: उज्ज्वला गृह देह व्यापार मामले में तीन महिला गिरफ्तार

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक शेल्टर होम उज्ज्वला गृह में यौन प्रताड़ना और देह व्यापार के मामले में तीन महिलाओं को गिरफ़्तार किया गया है.
तीनों महिलाएं राज्य सरकार की महिला बाल विकास विभाग के संरक्षण में चल रहे इस उज्ज्वला गृह की कर्मचारी बताई जा रही हैं.
इससे पहले गुरुवार की रात इस शेल्टर होम के संचालक और शिव मंगल शिक्षण समिति के अध्यक्ष जितेंद्र कुमार मौर्य को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था.
बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल ने बीबीसी से कहा,"पीड़ित महिलाओं के बयान के आधार पर अब तक चार लोगों की गिरफ़्तारी की गई है. इसके अलावा दो अन्य महिला कर्मचारियों की भी गिरफ़्तारी की प्रक्रिया चल रही है."
इस बीच उज्ज्वला गृह की एक पूर्व कर्मचारी ने पुलिस अधीक्षक को पत्र लिख कर संचालक के ख़िलाफ़ कई गंभीर आरोप लगाए हैं.
महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी सुरेश कुमार सिंह का कहना है कि गंभीर शिकायतों के बाद उज्ज्वला गृह को बंद कर दिया गया है और उनमें रहने वाली लड़कियों को दूसरे सेंटर में भेजा गया है या उनके परिजनों को सौंप दिया गया है.
सुरेश कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया कि महिला और बाल विकास विभाग के उच्च अधिकारियों की ओर से पूरे मामले की जांच की गई है. इस उज्ज्वला गृह का संचालन करने वाली संस्था शिव मंगल शिक्षण समिति का पंजीयन और एफसीआरए यानी विदेशी मुद्रा नियमन अधिनियम की अनुमति को रद्द करने की भी अनुशंसा की गई है.
आरोप

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गौरतलब है कि रविवार को बिलासपुर के सरकंडा थाना इलाके में संचालित उज्ज्वला गृह से भाग कर आईं लड़कियों ने अपने साथ यौन शोषण का आरोप लगाया था.
लड़कियों का कहना था कि वहां रहने वाली लड़कियों को नशे की गोलियां दी जाती थीं और उन्हें कथित रूप से देह व्यापार के लिए बाहर भेजा जाता था.
लड़कियों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने जो रिपोर्ट दर्ज़ की थी, उसमें यौन प्रताड़ना या देह व्यापार का उल्लेख नहीं था.
अगले दिन लड़कियों ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपने आरोपों को दुहराया तो पुलिस ने पीड़िताओं का मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज़ कराया.
इसके बाद पुलिस ने लड़कियों के चिकित्सकीय जांच की कार्रवाई शुरु की और मजिस्ट्रेट के सामने दिए गये बयान के आधार पर संचालक जीतेंद्र कुमार मौर्य को गिरफ़्तार किया गया.
परिजनों को सौंपे जाने पर सवाल

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हालांकि इस उज्ज्वला केंद्र में रहने वाली महिलाओं को बिना पूरी जांच के उनके परिजनों को सौंपे जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
छत्तीसगढ़ महिला अधिकार मंच की अध्यक्ष दुर्गा झा का आरोप है कि मामले की सच्चाई सामने नहीं आ पाए, इसलिए बिना पूरी जांच के आनन-फानन में महिलाओं को दूसरी जगह भेज दिया गया.
दुर्गा झा ने कहा,"सखी सेंटर या आश्रय गृह में पीड़ित महिलाओं को रखा जा सकता था और उनके बयान ले कर मामले की जांच की जा सकती थी. लेकिन पीड़िताओं को रातों-रात वहां से हटा दिया गया. इन पीड़ित और प्रताड़ित महिलाओं को उनके परिजनों को सौंपे जाने की प्रक्रिया को भी उपलब्धि की तरह प्रचारित किया जा रहा है."
उत्तर प्रदेश के अमेठी की एक महिला को गुरुवार को ज़िला प्रोबेशन कार्यालय के सहयोग से उनके परिजनों को सौंपा गया.
अमेठी के ज़िला प्रोबेशन अधिकारी अजय पाल सिंह ने बीबीसी को बताया कि अमेठी की रहने वाली एक महिला लॉकडाउन के दौरान बिलासपुर में फंस गई थी. बिलासपुर की सखी वन स्टॉप सेंटर ने महिला के परिजनों का नाम-पता ढूंढ़ निकाला. बिलासपुर की सखी वन स्टॉप सेंटर ने इसी सप्ताह अमेठी के वन स्टॉप सेंटर में संपर्क किया और बिलासपुर से महिला कार्मिक गायत्री वस्त्रकार व हेड कांस्टेबल पूनम तिवारी महिला को लेकर अमेठी पहुंची.
अजय पाल सिंह ने बीबीसी से कहा,"दस महीने तक लॉकडाउन के कारण वहां फंसे रहने के बाद महिला, सखी वन स्टॉप सेंटर के कारण अपने परिजनों से मिल पाई. हमने महिला के पति को बुलाया था. दोनों बहुत ख़ुश हुए."
उज्ज्वला कांड से अनभिज्ञ

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अजय पाल सिंह ने बिलासपुर के उज्ज्वला केंद्र में यौन प्रताड़ना या देह व्यापार के बाद उसे बंद किए जाने और उसके बाद ही महिलाओं को वहां से हटाए जाने की घटना पर अनभिज्ञता जताई.
उन्होंने कहा,"हमें तो यह सब बताया ही नहीं गया. अगर यह बताया गया होता तो हम पहले पूरी जांच करवाते. महिला ने भी इस बारे में हमें कोई जानकारी नहीं दी."
वहीं बिलासपुर सखी वन स्टॉप सेंटर की प्रभारी मीनाक्षी पांडेय का कहना है कि हमें महिला को उसके परिजनों को सौंपने का निर्देश दिया गया था. हमने न तो महिला से कोई बयान लिया और ना ही हमने कोई जांच की है.
दस महीने तक महिला को उसके परिजनों तक पहुंचाने की कोई कोशिश क्यों नहीं की गई, इस सवाल के जवाब में बिलासपुर में महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी सुरेश कुमार सिंह लॉक डाउन का हवाला देते हैं.
उन्होंने कहा,"लॉक डाउन के कारण गाड़ियां नहीं चल पा रही थीं, इसलिए महिला को अमेठी नहीं भेज पाए थे. अब परिस्थिति ऐसी बनी तो हमने उन्हें भेजा."
अमेठी भेजी गई महिला की मेडिकल जांच नहीं हुई और ना ही पुलिस में बयान लिया गया है. सुरेश कुमार सिंह का दावा है कि महिला बाल विकास विभाग की शीर्ष अधिकारियों की एक टीम ने जरूर सभी महिलाओं से बातचीत की थी.
मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज़ कराने वाली पीड़िताओं की अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रियंका शुक्ला का कहना है कि इस मामले में सरकारी अधिकारियों की जिम्मेवारी भी तय होनी चाहिए और उनके ख़िलाफ़ भी कार्रवाई होनी चाहिए.
प्रियंका कहती हैं,"यहां रहने वाली सभी महिलाओं की जांच तो जरूरी है ही, इसके अलावा पिछले 10 सालों में इस सेंटर में आने वाली महिलाओं के रिकॉर्ड की भी जांच होनी चाहिए. ताज़ा घटनाक्रम के बाद इस मामले की एसआईटी गठित करके जांच की जानी चाहिए, जिसके दायरे में राज्य भर में चलने वाले इस तरह के केंद्र शामिल किए जाएं. इसके बाद ही सच सामने आ पाएगा."
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