पीएम मोदी के शी जिनपिंग से 18 बार मिलने पर बोले विदेश मंत्री जयशंकर- प्रेस रिव्यू

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भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिन्दू' को एक ख़ास इंटरव्यू में संकेत दिया है कि लाइन ऑफ कंट्रोल यानी एलएसी पर चीन के साथ विवाद सुलझाने में लंबा वक़्त लग सकता है.

विदेश मंत्री ने इस विवाद की तुलना 1986 में अरुणाचल प्रदेश के 'समदोरोंग चु' में चीन के साथ सैन्य तनाव से की, जिसे सुलझाने में क़रीब नौ साल का वक़्त लगा था.

एस जयशंकर ने कहा कि भारत और चीन को सीमा विवाद को लेकर इस साल एलएसी पर हुई महज़ एक 'घटना' से आगे बढ़कर सोचना होगा. भारतीय विदेश मंत्री ने चीन को आगाह किया कि वो भारत को अमेरिका के साथ क़रीबी संबंध के आईने में किसी तीसरे पक्ष के तौर पर ना देखे.

'द हिन्दू' ने एस जयशंकर के इंटरव्यू को पहले पन्ने की लीड ख़बर बनाई है. भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि लद्दाख में विवाद सुलझाने के लिए चीन के साथ चल रही बातचीत की विस्तृत जानकारी नहीं दे सकते.

जयशंकर से अख़बार ने पूछा कि चीन के साथ लद्दाख में विवाद पर सैन्य कमांडर स्तर की आठवें चरण की बात हो चुकी है, ऐसे में अभी और कितना वक़्त लगेगा.

इस सवाल के जवाब में विदेश मंत्री ने कहा, ''1986 में समदोरोंग चु संकट को याद करना चाहिए. इस संकट को सुलझाने में दोनों देशों की सेना की बातचीत कुछ सालों तक बेनतीजा रही थी. तवांग इलाक़े में दोनों देशों के बीच यह संकट 1995 में जाकर ख़त्म हुआ था. दोनों देशों ने शांति बहाल करने के लिए 1993 में समझौते पर हस्ताक्षर किए.''

जयशंकर ने कहा, ''भारत के लिए अहम बात यह है कि चीन ने सीमा पर सेना को तैनात कर अतीत के समझौतों का उल्लंघन किया है और ऐसे में अगर शांति भंग होती है तो बाक़ी के भारत-चीन संबंध प्रभावित होंगे. जटिल मुद्दों को सुलझाने में वक़्त लगता है और हम वही करेंगे जो हमारे लिए ज़रूरी और हित में है. मेरा मतलब है कि हम जल्दीबाज़ी में नहीं हैं कि कम पर ही काम चला लें. सीमा पर चीनी तैनाती के जवाब में भारत ने भारी सैन्य जवाबदेही सुनिश्चित की है.''

जयशंकर ने कहा, ''दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय समझौता है कि एलएसी पर बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती नहीं होगी. चीन ने बिना ठोस कारण बताए इस समझौते का उल्लंघन किया. दूसरी बात यह है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध कैसे होंगे यह एलएसी के हालात से प्रभावित होते हैं. अगर एलएसी पर स्थिति बिगड़ेगी तो बाक़ी के संबंध भी पटरी से उतरेंगे.''

''भारत ने पूरे मामले में चीन से द्विपक्षीय संपर्क किया लेकिन ऐसा लगता है कि चीन तीसरे पक्षों से ज़्यादा प्रभावित हुआ है. वो वैश्विक रणनीति को ध्यान में ज़्यादा रख रहा है. मेरा मानना है कि हमारे लंबी अवधि के भविष्य के लिए यह ज़रूरी है कि हम आपस में ही चीज़ों को सुलझाएं और यह रास्ता पारस्परिक आदर और गंभीरता से निकलेगा.''

जयशंकर से द हिन्दू ने पूछा कि पिछले कुछ महीनों से कोई घटना नहीं हुई. लेकिन सैनिकों का जमावड़ा अब भी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ देपसांग और उत्तरी पैंगोंग त्सो के आसपास के इलाक़े चीनी सैनिकों के नियंत्रण में हैं या फिर इन इलाक़ों में भारतीय सेना पट्रोलिंग नहीं कर पा रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर यहां कोई और घटना नहीं होती है तो भारत क्या इसे स्वीकार कर लेगा?

इस सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा, ''मुझे नहीं लगता कि आपका सवाल ज़मीनी हक़ीक़त की पूरी तस्वीर पेश करता है. मेरा मानना है कि उन्होंने हमारे इलाक़े में ऐसा कुछ किया तो हमने जवाब दिया है. हम बिल्कुल स्पष्ट हैं कि दोनों देश एलएसी का सम्मान करें और यही हमारे लिए अहम है. ऐसे में सवाल उठता है कि लद्दाख में चीन के साथ अभी क्या हो रहा है? मैं इसका जवाब नहीं देने जा रहा क्योंकि हम बातचीत के बीच में हैं.''

आपने अपनी किताब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वुहान और ममाल्लापुरम समिट को 'विशुद्ध यथार्थवादी' कहा है. पीएम मोदी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से पिछले छह सालों में 18 बार मिल चुके हैं. क्या भारत चीनी रणनीति को समझने में नाकाम रहा?

इस सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा, ''मुझे नहीं लगता कि इसे इस रूप में देखना चाहिए. अगर आप ऐसे गिनती करेंगे तो पहले की तुलना में जापान, यूरोप, एंगेला मर्केल और अमेरिकी राष्ट्रपति से भी ज़्यादा मुलाक़ातें हुई हैं. अगर हम किसी से मिलते हैं तो इसका मतलब यह नहीं हुआ कि समस्याएं अपने-आप सुलझ जाएंगी. अगर हमने किसी से मुलाक़ात की है और उसके बाद एलएसी पर समस्या पैदा हो गई तो यह ज़रूरी नहीं कि हम अगले को समझ नहीं पाए. हम ये ज़रूर उम्मीद करते हैं कि चीन अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करेगा.''

भारत में बिकने वाले लगभग सभी शहद मिलावटी

दैनिक जागरण ने भारत में बिकने वाले शहद में चीन के शुगर सिरप मिलाए जाने की रिपोर्ट को पहले पन्ने पर प्रकाशित किया है. इस रिपोर्ट की हेडिंग है- शहद में मिलाया जा रहा चाइनीज शुगर सिरप. अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, देश के तमाम बड़े-छोटे ब्रैंड के शहद में मिलावट की चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है.

सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) ने पाया है कि ज़्यादातर कंपनियों के शहद में चाइनीज शुगर सिरप यानी चीनी का घोल मिलाया जा रहा है. सीएसई ने 13 कंपनियों के शहद के नमूनों की जांच कराई, जिनमें से 77 फ़ीसदी में मिलावट पाई गई.

सीएसई ने शहद के नमूनों की जाँच पहले गुजरात के राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के सेंटर फोर एनालिसिस एंड लर्निंग इन लाइवस्टॉक एंड फूड में कराई. वहां सभी बड़ी कंपनियों के नमूने पास हो गए जबकि कुछ छोटी कंपनियों के नमूने फेल हो गए.

जब इन्हीं सैंपल को जर्मनी स्थित प्रयोगशाला में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस परीक्षण के लिए भेजा गया तो लगभग सभी बड़े ब्रैंड्स नाकाम रहे. परीक्षण में शामिल 13 ब्रैंड में केवल तीन यहां के परीक्षण में पास हुए.

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