स्वामित्व योजना क्या है और मोदी सरकार की नई स्कीम का क्या होगा असर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

इमेज स्रोत, Twitter/Narendra Singh Tomar

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत, जन-धन योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी कई योजनाएँ केंद्र सरकार ने ख़ास तौर पर ग्रामीण भारत के लिए शुरू की.

अब इस फ़ेहरिस्त में एक नई योजना शामिल हो गई है - 'स्वामित्व योजना'. ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोगों के लिए इस योजना को गेम चेंजर के तौर पर केंद्र सरकार पेश कर रही है.

क्या है 'स्वामित्व योजना'?

भारत के गाँवों में एक बड़ा हिस्सा ऐसा होता है, जिसे 'आबादी इलाक़ा' कहा जाता है. ये वो ज़मीन है, जिसके स्वामित्व के कागज़ात मालिकों के पास नहीं होते.

पीढ़ी दर पीढ़ी लोग इसे अपना मान कर हक़ जताते आए हैं. ऐसी ज़मीन पर मालिकाना हक़ के लिए काफ़ी झग़डे भी होते हैं. लेकिन आज़ादी के बाद से अलग-अलग राज्यों में ऐसे 'आबादी इलाक़े' में पड़ने वाली ज़मीन का ना तो कभी सर्वे किया गया और ना ही इसके लीगल कागज़ तैयार करने की कोई पहल की गई.

राज्यों को इस ज़मीन पर बने घर का प्रॉपर्टी टैक्स भी नहीं मिलता है.

हालाँकि इसी से मिलती जुलती एक पहल ओडिशा और तमिलनाडु सरकार ने की थी, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई कोशिश अब तक नहीं हुई थी.

ऐसे ही ज़मीन पर बने घरों के मालिकाना हक़ के लिए भारत सरकार की ओर से एक नई पहल की गई है, जिसे 'स्वामित्व स्कीम' नाम दिया गया है.

इस योजना के तहत घर मालिकों को सर्वे के बाद 'संपत्ति कार्ड' दिया जा रहा है. अब लाभार्थियों के पास अपने घरों के मालिक होने का एक क़ानूनी दस्तावेज़ होगा.

गाँव के घर

इमेज स्रोत, BBC/SHURAIH NIAZI

रविवार को इस योजना की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत के गाँवों के लिए ऐतिहासिक क़दम बताया.

हालाँकि इस स्कीम से कितने लोगों को फ़ायदा पहुँचेगा, इसके बारे में कोई आधिकारिक आँकड़ा सरकार के पास मौजूद नहीं है. ना ही राज्य सरकारों के पास इस बारे में कोई आँकड़ा है कि किस राज्य में सबसे ज़्यादा आबादी इलाक़ा है.

स्कीम के फ़ायदे

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में नुपूर तिवारी एसोसिएट प्रोफे़सर हैं. डॉ. नूपुर तिवारी के मुताबिक़ स्वामित्व योजना घर मालिकों और सरकार दोनों के लिए 'विन-विन' वाला मामला है.

अब 'संपत्ति कार्ड' मिलने से लोग इसे दिखा कर बैंकों से क़र्ज़ ले सकेंगे. राज्य सरकारें चाहे तो उन इलाक़ों में सर्कल रेट तय कर सकती हैं. ज़मीन की ख़रीद और बिक्री आसान हो जाएगी. इससे सरकार को राजस्व का फ़ायदा होगा. इसका इस्तेमाल लोकल एरिया डेवलपमेंट में भी किया जा सकता है.

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ग्राम पंचायतों की ओर से जितना प्रॉपर्टी टैक्स वसूल किया जाना चाहिए, उसका केवल 19 फ़ीसदी ही वसूल किया जाता है. ये आँकड़े 2018 के हैं.

अब इस योजना के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि इस टैक्स में भी इजाफ़ा होगा.

हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के एक लाख लाभार्थियों को उनके घरों के क़ानूनी काग़ज़ात सौंप कर रविवार को इस योजना की शुरुआत की गई है. देश भर के कुल 763 ज़िलों में इसका काम चल रहा है.

वीडियो कैप्शन, “क्या बताएं दीदी, पानी पी कर रोज़ा खोलते हैं."- उज्ज्वला योजना की पहली लाभार्थी

इस योजना के पहले चरण में सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश के ज़िलों को शामिल किया गया है. यूपी के 346 ज़िले में इस योजना के लाभार्थी हैं. उसके बाद हरियाणा का नंबर आता है, जहाँ 221 ज़िलों में इस तरह का सर्वे कराया गया है. महाराष्ट्र सरकार ने इसकी शुरुआत केंद्र से पहले कर दी थी और वहाँ के 100 ज़िलों में ये सर्वे हो चुका है.

फ़िलहाल बिहार में विधानसभा चुनाव हैं और अभी वहाँ इस तरह का कोई सर्वे नहीं कराया गया है.

केंद्र सरकार का दावा है कि 2024 तक देश के 6.62 लाख गाँव में हर परिवार को ऐसे संपत्ति कार्ड दे दिए जाएँगे.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ आबादी इलाक़ों में इस तरह की ज़मीन पर बने घरों में 40 फ़ीसदी मामले झगड़े फसादे में फँसे है और मामला अलग-अलग अदालतों में लंबित है.

अब तक क्यों नहीं हुआ था ऐसा कोई सर्वे?

जानकारों की राय में आबादी इलाक़ों में आने वाली ज़मीन बहुत ही छोटे-छोटे साइज़ की होती थी और सर्वे कराने में खर्च़ उससे कहीं अधिक आता है. सरकारों को ये कभी फ़ायदे का सौदा नहीं लगा. लेकिन अब नई तकनीक के ज़रिए इस तरह के सर्वे कराए जा रहे हैं, जिसमें ड्रोन का इस्तेमाल कर ज़मीन की मैपिंग की जा रही है.

इसके अलावा झगड़ा-फसाद और विवाद होने पर कोर्ट कचहरी और मुक़दमें में वक़्त बेकार होने का अलग ही झंझट था.

सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, RITESH SHUKLA/NURPHOTO VIA GETTY IMAGES

कैसे होगा संपत्ति का सर्वे?

केंद्र सरकार ने इस तरह के 'आबादी इलाकों' में सर्वे के लिए राज्यों को अपने-अपने नियम बनाने के लिए कहा है. पंचायती राज मंत्रालय से जुड़े एक अधिकारी ने बीबीसी को सर्वे की पूरी प्रक्रिया साझा की है.

सर्वे के दौरान ग्राम पंचायत के सदस्य, राजस्व विभाग के अधिकारी, गाँव के ज़मीन मालिक और झगड़ा फसाद रोकने के लिए पुलिस की टीम मौक़े पर तैनात रहती है.

आपस में सहमति से अपनी-अपनी दावे वाली ज़मीन पर चूना लगा कर ज़मीन मालिक मोटी बाउंड्री बना देते हैं, जिसकी तस्वीर उड़ते ड्रोन से खींची जाती है. इसके लिए गाँव के कई चक्कर ड्रोन को लगाने होते हैं, ताकि हर एंगल से तस्वीरों का मिलान किया जा सके और कंप्यूटर की मदद से ज़मीन का नक़्शा तैयार किया जा सके.

जिस गाँव का सर्वे होता है, वहाँ के सभी सदस्यों को इसकी सूचना पहले दे दी जाती है, ताकि कुछ लोग जो दूसरी जगह नौकरी या किसी और काम से बाहर हों, वो भी सर्वे वाले दिन वहाँ आ सके.

एक बार पूरा नक़्शा तैयार कर लेने के बाद, जिसके नाम की ज़मीन है, वो ब्यौरा पूरे गाँव को बताया जाता है. जिस किसी को कोई भी आपत्ति दर्ज करानी हो तो इसके लिए कम से कम 15 दिन और अधिक से अधिक 40 दिन का समय दिया जाता है.

संकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, RITESH SHUKLA/NURPHOTO VIA GETTY IMAGES

जिस ज़मीन पर कोई आपत्ति नहीं आती और सभी पक्षों की सहमति होती है, राजस्व विभाग के अधिकारी उसके काग़ज़ात ज़मीन मालिक को दे देते हैं. इसे साइट पर जाकर डाउनलोड भी किया जा सकता है.

ऐसे घरों के मालिकाना हक़ के लिए राज्य सरकारें चाहें, तो इसके लिए अपना अलग-अलग क़ानून बना सकती हैं. मिसाल के तौर पर हरियाणा सरकार ने इस आबादी इलाक़े की ज़मीन की जवाबदेही ग्राम पंचायतों के ज़िम्मे सौंप दी है.

इसलिए किसी भी विवाद की सूरत में हल करने की ज़िम्मेदारी ग्राम पंचायतों की होगी. लेकिन ग्राम पंचायतों को आबादी इलाक़े की जानकारी संबंधित राजस्व विभाग ही देगा.

सभी राज्यों में ये काम 'सर्वे ऑफ़ इंडिया' के साथ मिल कर किया जा रहा है.

फिलहाल 'स्वामित्व स्कीम' के ज़रिए कराए जा रहे सर्वे का सारा ख़र्च केंद्र सरकार उठा रही है. पहले वित्तीय वर्ष में इसके लिए केंद्र सरकार ने तकरीबन 80 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान रखा है.

ज़मीन का मालिकाना हक़ और उससे जुड़े काग़ज़ात तैयार कराने के लिए हरियाणा सरकार कोई पैसे नहीं ले रही है. लेकिन आगे की ख़रीद पर सरकार रजिस्ट्री की रकम वसूलेगी.

महाराष्ट्र में सरकार ड्रोन सर्वे का पैसा नहीं लेती, लेकिन कर्मचारियों के आने-जाने और काग़ज़ात तैयार करने का ख़र्च ज़मीन मालिकों से लिया जा रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)