शाहीन बाग़: सार्वजनिक जगहों पर अनिश्चित समय के लिए प्रदर्शन की इजाज़त नहीं-सुप्रीम कोर्ट

शाहीन बाग़

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भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक जगहों को अनिश्चित समय के लिए विरोध-प्रदर्शनों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यह फ़ैसला शाहीन बाग़ में महीनों तक चले प्रदर्शन के ख़िलाफ़ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.

सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति विरोध प्रदर्शन के मक़सद से किसी सार्वजनिक स्थान या रास्ते को नहीं रोक सकता.

अदालत ने ये भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्तिचकालीन के लिए इस तरह धरना या प्रर्दशन स्वाकीर्य नहीं है और ऐसे मामलों में सम्बन्धित अधिकारियों को इससे निबटना चाहिए.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "शाहीन बाग़ को खाली कराना दिल्ली पुलिस की ज़िम्मेदारी थी. विरोध प्रदर्शनों के लिए किसी भी सार्वजनिक स्थान का अनिश्चितकाल के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, चाहे वो शाहीन बाग़ हो या कोई और जगह. प्रदर्शन निर्धारित जगहों पर ही होने चाहिए."

अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने सार्वजनिक स्थानों को खाली रखना सुनिश्चित कराना चाहिए.

महिलाएँ

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फ़ैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की इस तीन सदस्यीय बेंच की अध्यक्षता जस्टिस संजय किशन कौल ने की. सुनवाई करने वालों में अन्य दो जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस कृष्ण मुरारी थे.

सुप्रीम कोर्ट में इस संदर्भ में कई याचिकाएँ दायर की गई थीं. शाहीन बाग़ में कई महीनों तक प्रदर्शनकारियों ने नागरिकता संसोधन क़ानून को लेकर विरोध दर्शन किया था. इस दौरौन दिल्ली और नोएडा को जोड़ने वाली एक मुख्य सड़क पर प्रदर्शनकारी बैठे हुए थे.

बेंच ने इस मामले में 21 सितंबर को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था और कहा था कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार और लोगों के आवागमन के अधिकार के बीच संतुलन होना चाहिए.

बेंच ने कहा था कि विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से किया जा सकता है लेकिन 'विरोध-प्रदर्शन का अधिकार निरंकुशता पूर्ण नहीं है. यह एक अधिकार है.'

प्रदर्शनकारी महिला

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याचिकाकर्ता अमित साहनी और शशांक देव सुधी ने विरोध-प्रदर्शन के ख़िलाफ़ याचिका डालते हुए यह दलील दी थी कि विरोध-प्रदर्शन की वजह से लोगों को आने-जाने में तकलीफ़ पैदा हो रही है. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को हटाए जाने की मांग की थी.

वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहंती के मुताबिक़ अमित साहनी ने कहा था,"भविष्य में अपनी मर्ज़ी और ज़रूरत के हिसाब से प्रदर्शन नहीं होने चाहिए. व्यापक जनहित में एक फ़ैसला लिया जाना चाहिए. मैं सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध करता हूँ वो इस मामले में एक विस्तृत आदेश दें."

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शुरू में बताया था कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर विचार करने से इनकार कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने पहले संजय हेगड़े, साधना रामाचंद्रन और पूर्व नौकरशाह वजाहत हबीबुल्लाह को मध्यस्थ नियुक्त किया था ताकि वो प्रदर्शनकारियों से बात करें और उन्हें कहीं और जाकर प्रदर्शन करने के लिए मनाने पर बात करें.

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धरने पर बैठने वालों में सबसे ज़्यादा महिलाएं थीं. वो इस बात पर अड़ी थी कि जब तक सरकार सीएए क़ानून वापस नहीं लेती वो प्रदर्शन करती रहेंगी.

फ़रवरी में मध्यस्थों की टीम ने अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपी थी.

शाहीन बाग़ में 15 दिसंबर के बाद से लगातार कई महीनों तक विरोध प्रदर्शन होते रहे थे. इसके कारण कालिंदी कुंज के पास दिल्ली से नोएडा को जोड़ने वाली सड़क महीनों बंद रही थी और आम लोगों को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था.

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