मनोज सिन्हा: पीएम मोदी के भरोसेमंद और जम्मू-कश्मीर के नए उप राज्यपाल

मनोज सिन्हा
    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

2014 में ग़ाज़ीपुर संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जब मनोज सिन्हा ने रेल राज्य मंत्री का पदभार संभाला, उसी दिन उत्तर प्रदेश में गोरखधाम एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त होने की खब़र आई. मंत्री पद की शपथ लेने के कुछ घंटों के अंदर ही मनोज सिन्हा सीधे घटनास्थल के लिए रवाना हो गए थे. वहाँ उन्होंने ख़ुद ही राहत कार्यों की निगरानी की.

माना जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन पर काफ़ी भरोसा करते हैं. इसी कारण उनका नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की दौड़ में भी आया. हालाँकि बाज़ी योगी आदित्यनाथ ने मार ली. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

और अब उन्हें जम्मू-कश्मीर का नया उपराज्यपाल बनाया गया है. 5 अगस्त को ही जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का ठीक एक साल पूरा हुआ है. उनको जीसी मुर्मू की जगह जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल का दायित्व सौंपा गया है. मनोज सिन्हा 1996, 1999 और 2014 में तीन बार सांसद रह चुके हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के बड़े चेहरे हैं. हालांकि, 2019 में ग़ाज़ीपुर से लोकसभा चुनाव वो हार गए थे, जिसे एक बड़ा झटका माना गया था. उनके हार के साथ इस बात की चर्चा थी कि उन्हें पार्टी की तरफ़ से राज्यसभा भेजा जाएगा. लेकिन वो अटकलें साबित हुई. उसके बाद चर्चा शुरू हुई कि पार्टी  में महासचिव का पद दिया जा सकता है. लेकिन अब नई पद की घोषणा होते ही पुरानी सभी अटकलों को विराम लग गया है. 

मनोज सिन्हा

इमेज स्रोत, Hindustan Times

राजनीति की शुरुआत

लंबा कुर्ता और कभी साथ में धोती तो कभी पायजामा- अक्सर इसी पहनावे में मनोज सिन्हा नज़र आते हैं. उनको क़रीब से जानने वालों ने कभी उन्हें शर्ट पैंट में नहीं देखा है. वो पान के काफ़ी शौकीन माने जाते हैं.

61 साल के मनोज सिन्हा 80 के दशक में छात्र राजनीति से जुड़े. बीएचयू आईआईटी से उन्होंने एमटेक की पढ़ाई की और 1982 में  एवीबीपी की तरफ़ से छात्र संघ अध्यक्ष रहे.

उनको क़रीब से जानने वाले बताते हैं कि आईआईटी में पढ़ने वाला लड़का, छात्रसंघ में चुनाव लड़े- उस ज़माने में ऐसा बहुत ही कम होता था. वो भी धोती कुर्ता पहन कर, जब शर्ट पैंट का फ़ैशन हो. उनकी पढ़ाई और उनकी पहनावे की इस बेमेल जोड़ी को बीएचयू के उनके दोस्त आज भी याद करते हैं. 

छात्र राजनीति के ज़माने से उनको जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार जय शंकर गुप्त कहते हैं कि उन्हें याद नहीं पड़ता कि आख़िरी बार उनको शर्ट में उन्होंने कब देखा है. 

1980 के ज़माने में छात्र संगठन आईसा का भी बीएचयू में दबदबा शुरू हो गया था. लेकिन मनोज सिन्हा की ख़ासियत थी कि उनके दोस्त हर पार्टी में थे, फिर चाहे वो आईसा छात्र संगठन के हों या फिर एनएसयूआई छात्र संगठन से जुड़े हों. दोस्ती ऐसी कि अलग-अलग राजनीतिक रुझान के बावजूद इनके दोस्त हमेशा इनके लिए साथ खड़े होते थे. 

मनोज सिन्हा ग़ाज़ीपुर के रहने वाले हैं. उनके पिता स्कूल में प्रिंसिपल हुआ करते थे. परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी और एक बेटा है. बेटा सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है और दामाद भी पेशे से इंजीनियर हैं.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद भी उन्होंने कभी नौकरी नहीं की. और कॉलेज के ज़माने में जो राजनीति में क़दम रखा, वो आज भी वहीं हैं. 

मनोज सिन्हा

राट विंग के सरजू पांडे

वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह ने 2019 के लोकसभा चुनाव में ग़ाज़ीपुर में मनोज सिन्हा के चुनाव प्रचार को कवर करते हुए एक लेख लिखा था. उस लेख में अजय सिंह ने मनोज सिन्हा की तुलना कम्युनिस्ट लीडर सरजू पांडेय से की थी. 

सरजू पांडेय ग़ाज़ीपुर से ही थे और समाज के हर वर्ग में उनकी स्वीकार्यता बहुत थी. मनोज सिन्हा हमेशा सोचते थे कि आख़िर वो कौन सी बात है सरजू पांडेय की, जिस वजह से उनकी स्वीकार्यता इतनी ज़्यादा है. 

उनके राजनीतिक करियर के शुरुआती दिनों में ग़ाज़ीपुर में लेफ़्ट पार्टी मज़बूत हुआ करती थी.

अजय सिंह के लेख में ख़ुद मनोज सिन्हा ने इस बात का ज़िक्र किया था कि वो सरजू पांडेय से बहुत प्रभावित रहे हैं. मनोज सिन्हा ग़ाज़ीपुर में राइट विंग के सरजू पांडेय की छवि बनाने चाहते थे. सरजू पांडे ग़ाज़ीपुर से दो बार लोकसभा भी पहुँचे थे- 1961 और 1967 में.

मनोज सिन्हा

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी

2017 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद जब बीजेपी को बंपर जीत मिली, तब कुछ मीडिया चैनलों में मनोज सिन्हा को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताया गया.

मुख्यमंत्री के नाम पर आम सहमति बनने में जब कुछ वक़्त लग रहा था, उसी समय बनारस के मंदिर में उनके दर्शन करने की तस्वीरें मीडिया चैनलों पर चलने लगी थी. चैनलों पर चला कि वो मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के पहले भगवान का आर्शीवाद लेने आए हैं.

कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि वो रेस में थे लेकिन उनका नंबर कट गया.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की मानें, तो मंदिर में दर्शन करने और उनका उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री ना बनने में कोई रिश्ता नहीं है. उस दिन मंदिर जाने का उनका कार्यक्रम पहले से तय था और मंत्री होने के कारण उनके साथ सिक्योरिटी थी, जिसकी भनक मीडिया को लग गई और तस्वीरें तमाम चैनलों पर चलने लगीं. 

साथ ही राम बहादुर राय ये भी कहते हैं कि वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी और अमित शाह दोनों की पसंद थे, इसमें कोई शक़ नहीं. 

मनोज सिन्हा

ग़ाज़ीपुर चुनाव

उनके समर्थक और सहयोगी ये दावा करते हैं कि 2014 से 2019 तक ग़ाज़ीपुर संसदीय क्षेत्र में उन्होंने ख़ूब काम कराया है.

ग़ाज़ीपुर से सटे मऊ के पत्रकार जय शंकर गुप्त कहते हैं कि आज ग़ाज़ीपुर में बढ़िया रेलवे स्टेशन है, जो देश के सभी महत्वपूर्ण शहरों से जुड़ा है, बनारस और गोरखपुर को ग़ाज़ीपुर से जोड़ने वाली फ़ोर लेन हाई-वे है, जिसका काम उनके सांसद रहते ही पूरा हुआ है.

गंगा पर एक पुल बनने का काम सालों से अटका पड़ा था, मनोज सिन्हा ने उस प्रोजेक्ट को पूरा किया और 100 से अधिक प्राइमरी स्कूलों को मॉर्डन बनाने का काम किया. शिक्षा के क्षेत्र में उनके रहते इलाक़े में बहुत काम हुआ है.

उनके काम की ऐसी लंबी लिस्ट उनके कई पूर्व सहयोगियों ने भी बीबीसी को गिनवाई है. 

बावजूद इसके 2019 में लोकसभा चुनाव वो ग़ाज़ीपुर से हार गए. 2014 के मोदी लहर में भी बतौर सांसद उनकी जीत का अंतर 33 हज़ार वोटों का ही था. 

इस पर जय शंकर गुप्त कहते हैं कि मनोज सिन्हा काम ना करने की वजह से नहीं हारे, बल्कि बसपा-सपा गठबंधन और जातिगत समीकरणों की वजह से चुनाव हारे. बसपा-सपा गठबंधन के उम्मीदवार अफ़ज़ाल अंसारी के साथ इलाक़े के यादव और मुस्लिम दोनों चले जाने की वजह से मनोज सिन्हा को हार का सामना करना पड़ा था. 

मनोज सिन्हा

इमेज स्रोत, Twitter/Manoj Sinha

एक व्यक्ति दो पद 

राम बहादुर राय को मनोज सिन्हा के क़रीबी पत्रकारों में से एक माना जाता है. राम बहादुर राय के मुताबिक़ बतौर दूरसंचार मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और बतौर रेल राज्य मंत्री उनके काम की सराहना ख़ुद प्रधानमंत्री और अमित शाह दोनों करते रहे हैं. यही वजह है कि अमित शाह 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मनोज सिन्हा के नामांकन के लिए उनके साथ गए थे. 

बीबीसी से एक वाक़या शेयर करते हुए राम बहादुर राय ने कहा, "मुकेश अंबानी ने जब जियो लॉन्च  किया तो नियम-क़ानून तोड़ कर वो 6 महीने तक बिना प्राइसिंग के चलाते रहे. उसमें मनोज सिन्हा ने बतौर मंत्री हस्तक्षेप किया. मुकेश अंबानी को झुकना पड़ा, प्राइसिंग में आना पड़ा. उनके काम के ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं."

अरुण जेटली को याद करते हुए राम बहादुर राय कहते हैं कि वैसे वो बहुत कम लोगों की तारीफ़ के लिए जाने जाते हैं, लेकिन कई बार उन्होंने मनोज सिन्हा की तारीफ़ की है. राम बहादुर राय की मानें, तो अब भी अमित शाह और जेपी नड्डा ये चाहते थे कि बतौर महामंत्री मनोज सिन्हा पार्टी में काम करें, लेकिन जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल के तौर पर वो प्रधानमंत्री की पसंद हैं. 

मनोज सिन्हा

इमेज स्रोत, Twitter/Manoj Sinha

आगे का पॉलिटिकल करियर 

कई जानकार मानते हैं कि मनोज सिन्हा का अभी सक्रिय राजनीति में होना बीजेपी के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद होता. इस फ़ैसले पर कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को हैरानी भी हो रही है. लेकिन राम बहादुर राय इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

उनके मुताबिक़ 2024 का लोकसभा चुनाव मनोज सिन्हा ज़रूर लड़ेंगे. इस वक़्त बीजेपी को जम्मू कश्मीर में एक राजनेता की ज़रूरत है, जिसके पास प्रशासनिक अनुभव भी हो. उस खांचें में मनोज सिन्हा बिल्कुल फ़िट बैठते हैं. 

ऐसी ही बात जम्मू कश्मीर से बीजेपी के नेता जीतेन्द्र सिंह ने भी ट्वीट कर कही है.

छोड़िए X पोस्ट
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त

उनके मुताबिक़ मनोज सिन्हा को पार्टी राज्यसभा भी भेज देती तो क्या हासिल होता. इस नए पद पर उन्हें एक नया अनुभव भी हासिल होगा.

वो आगे कहते हैं कि किसी नेता का सक्रिय राजनीति में लौटना पार्टी की लीडरशिप पर निर्भर करता है, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को नेता पर भरोसा हो, तो वापसी मुश्किल नहीं होती.  कांग्रेस में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब राज्यपाल बनने के बाद नेताओं ने सक्रिय राजनीति में वापसी की है. 

इसके सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर दिवंगत कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह का नाम लिया जाता है. 11 मार्च 1985 को अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने, 12 मार्च 1985 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें इस्तीफ़ा दिलाकर पंजाब का राज्यपाल बना दिया. 

कई और ऐसे नाम हैं, जिन्हें सक्रिय राजनीति में रहते राज्यपाल बना दिया गया और फिर उन नेताओं ने पॉलिटिक्स में वापसी की. सबसे ताज़ा उदाहरण दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का है, जिन्हें केरल के राज्यपाल बनाया गया और फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में उतारा गया. हालाँकि गठबंधन की राजनीति में वो चुनाव नहीं लड़ीं. 

राम बहादुर राय कहते हैं कि साल भर में जम्मू-कश्मीर में जितना काम हुआ वो अच्छा रहा, लेकिन केंद्र की चाहत है नया जम्मू-कश्मीर बनाने की. उसके लिए स्थानीय लोगों को भरोसे में लेना होगा और फिर सरकारी नीतियों को वहाँ अमल में लाना होगा. अभी वहाँ चुनाव भी होने है और नई असेंबली के गठन का काम भी बचा है. 

राम बहादुर राय के मुताबिक़ अब जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल का पद केवल प्रशासनिक पद नहीं है, नई परिस्थिति में वो एक राजनीतिक पद भी हो गया है, जब तक वहाँ चुनाव नहीं हो जाते. इसलिए केंद्र की इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए मनोज सिन्हा उपयुक्त हैं. 

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)