कोरोना: कर्नाटक में डॉक्टरों, नर्सों की कमी से जूझते हुए जारी है महामारी से जंग
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इमेज कैप्शन, डॉक्टर ताहा मतीन के जारी किए वीडियो का स्क्रीनशॉट....में
Author, इमरान क़ुरैशी
पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिन्दी के लिए
प्रकाशित
जब डॉक्टर ताहा मतीन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो उनके अपने देश के अलावा अमरीका, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में उनकी काफ़ी तारीफ़ की गई.
इस वीडियो में उन्होंने अपने साथी डॉक्टरों से अपील की थी कि महामारी के मौजूदा दौर को देखते हुए वो "मानवता की मदद के लिए" कोविड-19 वॉरियर बनें.
लेकिन इसके एक सप्ताह बाद जब कर्नाटक के बेंगलुरु के एचबीएस अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टर ताहा मतीन से मैंने ये सवाल पूछा कि वीडियो वायरल होने के बाद उन्हें डॉक्टरों और नर्सों से किस तरह का समर्थन मिला, तो इसके उत्तर में वो मुस्कुरा दिए.
डॉक्टर ताहा मतीन ने बीबीसी से कहा, "फ़िलहाल एचबीएस अस्पताल में कोरोना मरीज़ों के लिए 30 से 35 बेड लगाए गए हैं. हम इसमें और 18 बेड जोड़ने वाले हैं. हम ये उम्मीद कर रहे हैं कि अगले कुछ दिनों में हम तीन गुना अधिक पैसे देकर नर्सों की सेवाएं ले सकेंगे और इन सभी बेड्स पर भी मरीज़ों को रखना शुरू कर सकेंगे."
अगर आंकड़ों की बात करें तो डॉक्टर मतीन की अपील सुनकर जिन डॉक्टरों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है उनकी संख्या तीन है.
कई डॉक्टरों ने पूछताछ करने के लिए उनसे संपर्क किया, तन्ख़्वाह की बात की और कहा कि वो उनसे इस बारे में बाद में बात करेंगे. कई डेन्टिस्ट्स ने भी उनसे संपर्क किया. लेकिन उन्हें ऐसे डॉक्टर नहीं मिले जो आईसीयू में मदगार साबित हो सकते थे.
डॉक्टर मतीन शायद सही कहते हैं कि डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी स्टाफ़ की कमी से अकेला उनका चैरिटेबल अस्पताल नहीं जूझ रहा है.
वो कहते हैं कि उनके प्रोफ़ेशनल साथी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि वीडियो में डॉक्टर मतीन ने जो बातें कही थीं वो देश के निजी और सरकारी अस्पतालों की सच्ची कहानी है.
एनेस्थेसियोलॉजिस्ट और कर्नाटक मेडिकल काउंसिल के सदस्य डॉक्टर वीरभद्रैय्या ने बीबीसी को बताया, "हमारे पास पहले ही 30 फ़ीसद ख़ाली पोस्ट हैं जिन पर नियुक्ति होना बाक़ी है. कोरोना महामारी की स्थिति के कारण हमें और 30 फ़ीसद डॉक्टरों, नर्सों और तकनीकी स्टाफ़ की ज़रूरत है. ये इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि कोरोना की जाँच और इलाज के लिए अधिकतर लोग सरकारी अस्पतालों में आ रहे हैं."
हालांकि निजी स्वास्थ्य सेक्टर की बात करें तो मौजूदा दौर में वो एक अन्य चुनौती से जूझ रहा है.
जानीमानी स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर लता वेन्कटराम ने बीबीसी को बताया, "कम से कम पचास फ़ीसद डॉक्टरों, नर्सों और तकनीनी स्टाफ़ की कमी तो है. बड़ी संख्या में स्टाफ़ संशय से जूझ रहा है, स्टाफ़ की कमी मॉर्बिडिटी के डर से हो रही है. डॉक्टर और नर्स परिवारों के साथ रहते हैं और उनके परिवारों में ऐसे लोग हैं जिनके लिए कोरोना का जोखिम अधिक है. कोविड वॉर्ड में तैनात किए जाने का लोगों में डर है."
कर्नाटक के फ़ेडेरेशन ऑफ़ हेल्थकेयर एसोसिएशन के मुख्य समन्वयक डॉक्टर एससी नागेन्द्र स्वामी कहते हैं, "अस्पताल इंडस्ट्री में अमुमन दस से पंद्रह फ़ीसद स्टाफ़ में ख़ास कर नर्सों में इस तरह की परेशानी या डर होता है. लेकिन बीते तीन महीनों में ये डर कम से कम 45 फ़ीसद लोगों में फैला है."
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कोरोना के डर के साए में अस्पताल कर्मचारी
डॉक्टर लता वेन्कटराम कहती हैं, "नर्सिंग स्टाफ़ को ख़ास कर इस बात का डर है कि अगर वो बीमार पड़ गईं तो उनका ख़याल कौन रखेगा. वो नहीं चाहतीं कि उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती होना पड़े. बीते कुछ दिनों में इस इंडस्ट्री को इस बात का एहसास हुआ है कि उन्हें अधिक मेहनताना दिया जाना चाहिए. लेकिन इससे भी अब कोई ख़ास मदद नहीं मिल पा रही."
डॉक्टर नागेन्द्र स्वामी कहते हैं, "अधिकतर अस्पतालों में नर्सों की तन्ख़्वाह दोगुनी कर दी गई है ताकि वो कोविड-19 वॉर्ड में मरीज़ों की देखभाल करें."
कोरोना महामारी के कारण अस्पतालों के आईसीयू में मरीज़ों की संख्या तो बढ़ी ही है, वहां ज़रूरतें भी बढ़ गई हैं.
अब कोविड-19 के मरीज़ों का अधिक ध्यान रखना होता है.
डॉक्टर वीरभद्रैय्या कहते हैं, "कभी-कभी मरीज़ को एडमिट करने के तुरंत बाद उन्हें आईसीयू में शिफ़्ट करना पड़ता है. ऐसे में हमें अनुभवी डॉक्टर और नर्सों की ज़रूरत है जो वहां मरीज़ों की देखभाल के लिए मौजूद हों. हमें इन्टेन्सिविस्ट्स की ज़रूरत हैं लेकिन वो लोग अधिकतर निजी क्षेत्र में काम करते हैं."
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इस वायरस को लेकर डॉक्टरों और नर्सों के डर का असर इस बात पर भी पड़ रहा है कि निजी अस्पतालों में सरकार के निर्देशानुसार कितने बेड कोरोना के मरीज़ों के लिए अलग से रखे जा सकते हैं.
डॉक्टर नागेन्द्र स्वामी कहते हैं, "किसी अस्पताल में दो सौ तक बेड हो सकते हैं लेकिन उनके पास केवल सौ बेड पर मरीज़ों को देखने के लिए स्टाफ़ हो सकता है. अभी स्थिति ऐसी है कि असर आधे बेड की संख्या पर भी पड़ रहा है क्योंकि या तो स्टाफ़ में डर है या फिर स्टाफ़ है ही नहीं. इस कारण हम सरकार के आदेश के अनुसार कॉमन पूल के लिए जितने बेड होने चाहिए वो भी नहीं कर पा रहे हैं."
डॉक्टर वेन्कटराम कहती हैं, "कुछ अस्पताल तो आईसीयू में काम के अनुभव वाली नर्सों 60 हज़ार तक की तनख़्वाह दे रहे हैं. ये भी मानना पड़ेगा कि नर्सों पर भी दवाब अधिक है क्योंकि कोविड मरीज़ों की देखभाल के लिए पीपीई सूट पहने रहना होता है. आम तौर पर नर्स दस घंटे की शिफ़्ट में काम करती हैं. लेकिन हर छह घंटे में पीपीई सूट बदलना पड़ता है. ऐसे में एक दिन में चार नर्सों की शिफ़्ट की ज़रूरत होती है यानी एक दिन में चार शिफ़्ट."
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डॉक्टर वेन्कटराम कहती हैं, "एक समस्या ये भी है कि डॉक्टर और नर्सों को हर एक सप्ताह के बाद आराम देना होता है क्योंकि काम का माहौल काफ़ी तनावपूर्ण होता है. इन मुश्किल हालात में कोविड मरीज़ों के साथ-साथ दूसरे मरीज़ों की देखभाल के लिए अस्पतालों को अतिरिक्त स्टाफ़ की ज़रूरत पड़ना स्वाभाविक है. लेकिन इन सबके बीच बीते कुछ महीनों में अस्पतालों की आमदनी पर काफ़ी असर पड़ा है, उन्हें नुक़सान झेलना पड़ा है."
कोरोना के कारण उपजे हालात को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने छह महीनों के लिए तुरंत 380 माइक्रोबायोलॉजिस्ट, तकनीकी कर्मचारियों और डेटा ऑपरेटरों की नियुक्ति के आदेश दिए हैं.
आयुष डॉक्टरों और बीडीएस मेडिकल अफ़सरों के लिए सरकार ने छह महीने में 8.1 लाख रूपये तनख़्वाह देने का ऐलान किया है.
वहीं छह महीने के लिए सरकार ने नर्सों को 7.20 लाख रूपये तनख़्वाह देने की बात की है.
कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले
बीबीसी न्यूज़स्वास्थ्य टीम
कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.