'कोरोना वायरस: 'पीपीई सूट के अंदर ब्लीडिंग'...स्वास्थ्यकर्मियों को क्या क्या झेलना पड़ रहा है

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कीर्ति शाह* दिल्ली के एक अस्पताल में इंटेंसिव केयर नर्स हैं. वह 31 साल की हैं और खुद को एक आशावादी शख़्स मानती हैं.

शाह कहती हैं, "लेकिन, गुजरे तीन महीने बेहद मुश्किल रहे हैं." उनकी शिफ्ट 45 मिनट की पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) पहनने की प्रक्रिया के साथ शुरू होती है. इस प्रक्रिया में एक गाउन, फेस मास्क, चश्मा, फ़ेस शील्ड और दस्ताने पहनना शामिल है.

चूंकि वे एक महिला हैं ऐसे में उन्हें कुछ अतिरिक्त उपाय भी करने पड़ते हैं. उन्हें एक्स्ट्रा-लार्ज साइज के गाउन के साथ मास्क को टेप के ज़रिए चिपकाना होता है क्योंकि यह सरकता है और इससे उनकी गर्दन के खुलने का ख़तरा पैदा हो जाता है. चश्मे और नाक के बीच उन्हें कपास भरनी पड़ती है ताकि जख़्म न हों. इसके अलावा उन्हें लंबी बाहों को समेटना पड़ता है और फिर वे दस्ताने पहनती हैं. इसके बाद वे सारी चीज़ों को चेक करती हैं. वे देखती हैं कि मास्क अच्छी तरह से उनके कानों के पीछे बंधा हुआ है या नहीं. ये मास्क भी लार्ज साइज में ही उपलब्ध हैं.

पीपीई पहनने के कम से कम दो घंटे पहले से वह कुछ भी नहीं पीती हैं. वह कहती हैं, "हम अपनी पूरी शिफ्ट के दौरान न तो कुछ खा सकते हैं, न ही पानी पी सकते हैं या वॉशरूम जा सकते हैं. ऐसे में शिफ्ट शुरू करने से पहले से ही हम पानी पीना बंद कर देते हैं."

प्रोटेक्टिव गियर केवल छह घंटे की शिफ्ट पूरी करने के बाद ही उतारा जा सकता है. इस प्रक्रिया को डोफिंग कहते हैं.

पीपीई में ब्लीडिंग

वह कहती हैं, "पीरियड आने तक यह झेला जा सकता है. मुश्किल तब होती है जबकि मुझे बहुत ज़्यादा पसीना आ रहा होता है, मेरे चश्मे के आगे धुंध छाने लगती है और मेरे पीपीई सूट के अंदर ब्लीडिंग भी शुरू हो जाती है."

वह याद करती हैं कि किस तरह से एक बार उन्हें अपने पुरुष सहयोगी को यह बोलना पड़ा कि वह उन्हें कवर कर लें ताकि उनके दाग़ नजर नहीं आएं. इस तरह से उन्हें अपनी शिफ्ट बीच में ही छोड़कर वापस लौटना पड़ा.

ज़्यादा दिक्कत न हो इसके लिए उन्हें इंटरनेट पर 'दिन में कम ब्लीडिंग के उपाय' सर्च करने पड़े. वह बताती हैं कि एक सलाह उनके काम आई. यह सलाह थी कि गर्म पानी में एक घंटे तक नहाया जाए और शिफ्ट करने से पहले ही पर्याप्त खून निकाल दिया जाए.

वह कहती हैं, "इस रुटीन का कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं है, लेकिन मेरे पास कोई दूसरा तरीका भी नहीं है. प्रोटेक्टिव गीयर को डिजाइन करते वक्त महिलाओं की मासिक धर्म की ज़रूरत के बारे में सोचा ही नहीं गया होगा."

पीपीई मोटे तौर पर पुरुषों के लिए बनाए गए हैं.

इस बात को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं जताई जा रही हैं कि एक स्टैंडर्ड पीपीई जो कि अक्सर यूनीसेक्स डिजाइन होता है, वह ज़्यादातर दफ़ा महिलाओं के फ़िट नहीं बैठता है.

ये गीयर कोविड-19 से लड़ाई के मोर्चे पर सबसे आगे मौजूद स्टाफ़ की सुरक्षा के लिए बेहद ज़रूरी है.

लेकिन, कुछ हेल्थकेयर वर्कर्स का कहना है कि कुछ महिलाओं के लिए पीपीई सूट का सबसे छोटा साइज भी बेहद बड़ा साबित होता है. ग्लोबल हेल्थ सिस्टम में काम करने वालों में 70 फ़ीसदी महिलाएं हैं.

अगर पीपीई सूट बहुत बड़ा होता है तो यह वायरस को पूरी तरह से रोक पाने में नाकाम रहता है. साथ ही यह पहनने वाले के लिए जल्द ही दिक्कत पैदा करने लगता है.

ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन की डॉक्टरों की यूनियन की कंसल्टेंट्स कमेटी की सदस्य हेलेन फिडलर के मुताबिक, "यह मसला इस वजह से पैदा हो रहा है क्योंकि ये सूट मूलरूप में अमरीकी या यूरोप के पुरुषों के हिसाब से तैयार किए गए हैं."

ब्रिटेन की ट्रेड यूनियन कांग्रेस (टीयूसी) की 2017 में कराई गई रिसर्च के मुताबिक, करीब 57 फ़ीसदी महिला स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि उनके पीपीई कई बार उनके काम को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं.

केवल दो साइज के मास्क

लेकिन, बात केवल यूके तक सीमित नहीं है. पूरी दुनिया की महिला स्वास्थ्यकर्मी पीपीई की फ़िटिंग को लेकर आवाज़ उठा रही हैं.

स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन की स्कॉलर-इन-रेजिडेंस डॉ. अर्गवन सालेस फ़िलहाल न्यू यॉर्क के एक हॉस्पिटल की इंटेंसिव केयर यूनिट में काम कर रही हैं.

वह कहती हैं, "एन95 मास्क केवल दो साइज में आता है जो कि अजीब चीज़ है. ऐसी कौन सी चीज़ है जो केवल दो साइज में आती है? हम क्या यह बता रहे हैं कि पूरी धरती पर चेहरे केवल दो आकार के होते हैं."

डॉ. सालेस कहती हैं कि उनके छोटा साइज फ़िट आता है, लेकिन यह बमुश्किल ही मिल पाता है.

सालेस कहती हैं कि छोटे साइज के दस्ताने और चश्मे भी बहुत बड़े होते हैं. वह कहती हैं, "मेरे हाथ का साइज 6 है, लेकिन मुझे 6.5 साइज का दस्ताना पहनना पड़ता है."

हमें लगातार समझौता करना पड़ता है.

कई देश स्वास्थ्यकर्मियों के लिए प्रोटेक्टिव गीयर की कमी की बात लगातार कह रहे हैं. कुछ महिलाओं का कहना है कि यह चीज़ उनके लिए अपने हिसाब के पीपीई की मांग करना मुश्किल बना रही है.

दिल्ली की इंटेंसिव केयर यूनिट की नर्स ने बताया, "हमसे कहा गया है कि हम खुशनसीब हैं कि हमें प्रोटेक्टिव गीयर मिल पा रहे हैं. ऐसे में हमें समझौता करना पड़ता है."

कई दिनों तक लंबे वक्त तक ब्लैडर भरे रहने से उन्हें यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई) हो गया.

उन्होंने यह भी बताया कि ख़राब फिटिंग वाले पीईई किट की वजह से कई अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की त्वचा और चेहरे पर जख़्म और निशान पड़ गए हैं.

रीनाता पीएत्रो ब्राजील के साओ पाउलो के एक हॉस्पिटल में इंटेंसिव केयर में काम करती हैं.

वह ब्राजीलियन एसोसिएन ऑफ़ क्रिटिकल केयर नर्सेज की संस्थापक सदस्य भी हैं.

वह बताती हैं, "मैं 5 फुट 1 इंच की हूं. मुझे बड़े मास्क पहनकर हर दिन 8 से 10 घंटे तक काम करना पड़ता है. मुझे सुरक्षित रहने के लिए जोड़तोड़ करने पड़ते हैं."

वह कहती हैं, "मेरे बाल लंबे हैं और इससे भी दिक्कत होती है. मुझे मास्क को कसकर बांधने के लिए बैंड-एड का इस्तेमाल करना पड़ता है. लेकिन, मेरे कई दोस्त ऐसे भी हैं जिन्हें मास्क मिल ही नहीं पाता."

केवल हेल्थकेयर नहीं

ख़ासतौर पर महिलाओं के हिसाब से बनाए गए पीपीई की मांग केवल हेल्थकेयर सेक्टर तक सीमित नहीं है.

साइंस या दूसरे कामों से जुड़ी हुई महिलाओं को भी पुरुषों के लिए बनाए गए इक्विपमेंट्स का इस्तेमाल करना पड़ता है.

2019 में नासा ने अपने पहले केवल महिलाओं के स्पेसवॉक वाले प्लान को रद्द कर दिया था. सही आकार के स्पेससूट्स का उपलब्ध न होना इसकी वजह था.

बायोलॉजिस्ट जेसिका माउंट्स ने बीबीसी को बताया था, "प्रतिनिधित्व हर जगह होना चाहिए. अगर हमें पास इक्विपमेंट और कपड़ों की फिटिंग जैसे मसले ही रोके रखेंगे तो महिलाएं आने वाली पीढ़ी की लड़कियों के लिए कैसे करियर के सभी विकल्पों में प्रतिनिधित्व कर पाएंगी."

उनके काम में नदियों और झीलों का सर्वे करना शामिल है. वह कहती हैं कि उनके इस्तेमाल किए जाने वाले ज्यादतर उपकरण पुरुषों के लिए डिजाइन किए गए होते हैं.

अजीब भेदभाव

लेखिका कैरोलाइन क्रियाडो-पेरेज महामारी से पहले अपनी किताब इनविजिबल विमिन लिखने के दौरान इस मसले पर शोध कर रही थीं.

उन्होंने पाया कि हम महिलाओं के डेटा इकट्ठे नहीं करते और ऐसे में हम महिलाओं के लिए चीजें डिजाइन नहीं करते हैं.

वह कहती हैं, "स्टैब वेस्ट का ही उदाहरण लीजिए. इसमें ब्रेस्ट टिश्यू का ध्यान नहीं रखा गया है और इससे महिलाओं की धमनियां खुली रह जाती हैं. इसका मतलब है कि स्टैब वेस्ट महिलाओं की सुरक्षा नहीं कर पाते हैं."

जब हम हेल्थकेयर इंडस्ट्री में पीपीई की बात करते हैं तो हमारे पास इस बात के पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं कि कितनी महिलाएं पुरुषों के मुकाबले फ़िट टेस्ट में फेल हो रही हैं.

वह कहती हैं, "यूके में नेशनल हेल्थ सर्विस ट्रस्ट जेंडर के आधार पर इसके आंकड़े इकट्ठा नहीं करते हैं."

वह कहती हैं, "यह समस्या इस वजह से भी जारी है क्योंकि बड़े तौर पर यह माना जाता है कि पीपीई यूनीसेक्स होते हैं और शिकायत करने वाली महिलाएं केवल इसे सही तरह से पहनने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं."

कब तक

कीर्ति खुद को सकारात्मक बनाए रखने के लिए अपने अस्थाई निवास पर मेडिटेशन और एक्सरसाइज करती हैं. वह कहती हैं, "मैं खुद को लगातार बताती रहती हूं कि मैं देखभाल करने के इस पेशे में क्यों आई हूं. लेकिन, मैं आख़िरकार खुद को कब तक समझा सकती हूं."

* सुरक्षा के लिहाज से नाम बदल दिया गया है.

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