कोरोना महामारी के कहर और दंगे की आग के बावजूद खिलती उम्मीद की एक कोंपल

गुलिस्तां शेख और उनके पति

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    • Author, चिंकी सिन्हा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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गुलिस्तां शेख अपने कमरे में बैठी हुई हैं और उनकी बचपन की सहेली उनकी आंखों में काजल लगा रही हैं.

उन्होंने अपने हाथ में एक छोटा सा आईना पकड़ रखा है. आज उनकी शादी का दिन है. हालांकि पहले उनकी शादी नवंबर में होने वाली थी. जब वो रिलीफ़ कैंप में थीं तब ही उन्होंने मुझसे अपनी शादी का जिक्र किया था. उस दिन ईदगाह में लगे रिलीफ़ कैंप का तंबू मूसलाधार बारिश की वजह से पस्त हो चुका था.

यह रिलीफ़ कैंप उत्तर-पूर्वी दिल्ली के एक ईदगाह में वहाँ हुई हिंसा में प्रभावित हुए लोगों के लिए लगाया गया था. तब गुलिस्तां को उम्मीद थी कि शिव विहार में उनके घर में दूसरे घरों की तरह तोड़फोड़ नहीं हुई होगी. उन्होंने अपने उस कमरे के बारे में बताया था जिसकी दीवारें गुलाबी रंग से रंगी हैं.

गुलिस्तां शेख

उनकी शादी को लेकर उनके अब्बू ने कई चीजें सालों से जोड़कर रखी थीं कि जब उनकी शादी होगी तो वो उन्हें शादी में ये चीजें देंगे. इन चीजों में डिनर सेट, जेवर, सोने की चेन और शादी का जोड़ा शामिल था.

25 फरवरी जब उनके इलाके में हिंसा भड़की थी उसके बाद से उनके परिवार ने दूसरे कई परिवारों की तरह ईदगाह में ही पनाह ले रखी थी. 14 मार्च के दिन ईदगाह के रिलीफ़ कैंप में उन्होंने ये सारी बातें मुझे बताई थीं. उनके परिवार के लोग शिव विहार में अपने घर लौटने को लेकर डरे हुए थे.

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मुआवजे का इंतज़ार

अब भी वहाँ का मंजर कुछ ऐसा ही एहसास दिलाता है मानो वहाँ से तूफ़ान गुज़रा हो. इमारतें अब भी जली पड़ी हुई हैं. उन्हें अब भी न्याय और मुआवजे का इंतज़ार है. आखिरकार 22 मई को गुलिस्तां का परिवार अपने घर किसी तरह लौट आया और अब सात जून को कोरोना के खतरे के साए में उनकी शादी भी हो रही है.

जिस शख़्स से गुलिस्तां की नवंबर में शादी होने वाली थी, उसने शादी से इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि उसे इस बात का अंदेशा था कि गुलिस्तां के परिवार वालों के पास दंगे के बाद कुछ नहीं बचा होगा.

फ़ैज़ान ख़ान

आज भी शादी का टूटना समाज में इज्जत के लिहाज से अच्छा नहीं माना जाता. गुलिस्तां के परिवार के लोग इसीलिए जल्द-से-जल्द उनकी शादी कहीं तय करना चाहते थे. यहाँ इन दिनों कई शादियां हो रही हैं. बात पक्की होते ही हफ्ते के अंदर शादियां हो जा रही हैं. लोगों को डर है कि लॉकडाउन बहुत लंबा चल सकता है.

इन दिनों शादी का खर्च भी पहले की तुलना में कम आ रहा है क्योंकि सिर्फ 50 लोगों को ही शादी में बुलाने की इजाज़त मिली हुई है. गुलिस्ता अभी 22 साल की हैं. वो खुद के बारे में कहती हैं, "मुझे लगता है कि शादी के बाद मुझे प्यार होगा. अब मैं एक घर संभालने वाली बीवी बन जाऊंगी."

गुलिस्तां शेख

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माँ का इंतकाल

गुलिस्तां के कमरे के एक ताखे पर एक ट्रॉफी रखी हुई है. वो चौथी क्लास में थीं तो अपने क्लास में फर्स्ट आई थीं और उन्हें ये ट्रॉफी मिली थी. वो अपनी इस ट्रॉफी को अपने ससुराल नहीं ले जाएंगी. वो यहीं उनके पुराने कमरे में रहेगा. उनकी बहन शगुफ्ता बताती हैं कि गुलिस्तां स्कूल के दिनों में अच्छी स्टूडेंट थीं.

दोनों ने ही पास के ही स्कूल से पढ़ाई की शुरुआत की थी लेकिन शगुफ्ता को 7वीं क्लास के बाद ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी. उनकी माँ का इंतकाल हो गया था और घर संभालने की ज़िम्मेदारी शगुफ्ता पर आ गई थी. उस वक्त वे और उनका परिवार बगल की ही एक गली के छोटे से मकान में रहता था.

यह घर पिछले साल ही उनके परिवार ने खरीदा था और यहाँ शिफ्ट हुए थे. शगुफ्ता बताती हैं कि "उनके ससुराल में ऐसा घर नहीं है लेकिन अब्बू का कहना है कि लड़की को एक न एक दिन अपने असली घर जाना ही होता है. "

गुलिस्तां ने 12वीं तक पढ़ाई की है और इसके बाद वो आगे पढ़ाई नहीं जारी रख पाईं लेकिन वो आगे पढ़ना चाहती थीं और एक टीचर बनना चाहती थीं. बड़ी बहन शगुफ्ता की शादी होने के बाद घर की ज़िम्मेदारी उनके कंधे पर आ गई थी.

गुलिस्तां शेख

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ईदगाह में शरण

11 साल पहले जब उनकी माँ चल बसी थी तब से उनके अब्बू ने ही अकेले अपने चारों बच्चों को पाला-पोसा था. उनके अब्बू शम्सुल शेख सिद्दीकी ने देवबंद और फिर अलीगढ़ में पढ़ाई की थी. उस दौरान बड़े सपने थे. लेकिन वे सपने पूरे नहीं हुए और उन्हें ट्यूशन पढ़ाकर अपनी ज़िंदगी चलानी पड़ी.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के इलाके में फरवरी में भड़की हिंसा के वक्त उन्हें अपना घर छोड़कर ईदगाह में शरण लेनी पड़ी. उनका घर जिस शिव विहार इलाके में हैं, वो इस हिंसा में बुरी तरह से प्रभावित हुआ था. कई परिवारों को ईदगाह में जाकर शरण लेनी पड़ी थी.

लेकिन जब प्रधानमंत्री ने अचानक लॉकडाउन की घोषणा की तब गुलिस्तां के परिवार को एक मदरसे में पनाह लेनी पड़ी और आखिरकार उनका परिवार ईद के दौरान अपने घर लौट पाया. हफ्तों तक गुलिस्तां और उनके भाई पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से मदद मांगते रहे.

वे शादी के इंतेजाम में अपने अब्बू की मदद करना चाहते थे क्योंकि उन्होंने जो सालों से अपनी बेटी की शादी के लिए जमाकर रखा था, वो सब दंगे में लुट गया था. शगुफ्ता का नीला लहंगा बाहर पड़ा हुआ था. उसके ऊपर गुलाबी रंग के फूल लगे हुए थे.

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लॉकडाउन और महामारी

गुलिस्तां का भी लहंगा ऐसा ही था हरे रंग का लेकिन अब उसे गुलाबी रंग का लहंगा पहनना पड़ रहा था जो उनके ससुराल की तरफ से भेजा गया था.

"आपको यह पसंद आया?" यह पूछती हुई वो लहंगे पर लेट जाती हैं. उनकी दोस्त उनके बालों में जूड़ा बना देती है. लॉकडाउन और महामारी की वजह से शादी में ज्यादा मेहमान नहीं आ रहे थे. गुलिस्तां भी मास्क नहीं पहन रही थीं. वो कहती हैं, "ऐसे अच्छा नहीं लगेगा".

उनकी सहेली रुखसार ने शगुफ्ता को तैयार होने में मदद की. वो 23 साल की हैं और वो साथ में बड़े हुए हैं. रुखसार के अब्बू दिहाड़ी मज़दूर हैं. उनकी पांच बहने हैं.

रुखसार बताती हैं, "यहाँ कई शादियां इन दिनों हो रही हैं. मेरे अब्बू ने मेरे लिए भी एक लड़का ढूंढा है. हम लोग गरीब हैं. लॉकडाउन के बाद हालात और बदतर हो गए हैं. हो सकता है कि मेरी शादी के बाद मेरे अब्बू के ऊपर से कुछ बोझ कम हो जाए."

गुलिस्तां शेख

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सगाई की रस्म

रुखसार ने वहीं के एक सैलून में ब्यूटीशियन का काम सीखा है. बातों-बातों में वो कहती हैं, "हमारे इलाके में लड़कियों को मोहब्बत नहीं होती."

अगली ही गली में उसी शाम एक और नौजवान की सगाई थी. वो सोशल वर्कर हैं और अपनी माँ और भाइयों के साथ शिव विहार के इलाके में रहते हैं लेकिन दंगों के बाद उन्हें अपना घर छोड़कर बगल के इलाके में ही किराए के मकान में रहना पड़ रहा है. उस शाम सगाई की रस्म पूरा करने के लिए उनका परिवार पुराने घर में लौटा था.

29 जून को उनकी शादी होने वाली है. वो बताते हैं कि उन्होंने सारे कीमती समान और नकद लूटे जा चुके हैं. वो अपने इस पुराने घर को फिर से बनाना चाहते थे और उसमें दो कमरे और जोड़ना चाहते थे लेकिन अब वो इंतज़ार करेंगे कि कब वो करे. वो बताते हैं. "हमें हमारे नुकसान के लिए कोई मुआवजा नहीं मिला है."

लेकिन ज़िंदगी तो चलती रहनी है. उनके घर की दीवारों की ईंटें दिख रही है जो दंगों की निशानियों को बयां कर रही हैं. उनकी मां पप्पी देवी एक कोने में खड़े होकर अपने घर को निहार रही हैं. वो कहती हैं, "शायद आने वाले वक़्त में चीज़ें बेहतर हो जाए."

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कोरोना महामारी

इन गलियों में कई घर अब भी खाली पड़े हुए हैं. यहां लोग अपने घरों से निकल कर पूछते हैं कि क्या आप सरकार की ओर से जिस मुआवजे की घोषणा हुई है, उसे दिलवाने में मदद कर सकती हैं. लोग बदहवास होकर मदद की उम्मीद कर रहे हैं. लेकिन कोरोना महामारी ने सब कुछ रोक दिया है.

गुलिस्तां की गली के ठीक बाहर शमीम अपनी बेटी गुलाफ्शां के साथ बैठी हुई थीं. उनकी बेटी की शादी भी इन्हीं वजहों से टूट गई है. उनके पास न कोई घर बचा था ना ही कोई सामान और ना ही शादी में देने को कुछ. वो कहती हैं, "कई शादियां यहाँ टूट चुकी हैं लेकिन हमने अपने बेटे की शादी नहीं रोकी. "

उन्होंने अपने टूटे घर को फिर से रहने लायक बनाया. खिड़कियां तोड़ दी गई थी उनके घर की. उनका परिवार कपड़ों पर इस्त्री करके अपना गुजारा चलाता है लेकिन इन दिनों मुश्किल हो रहा है. उनके बेटे वसीम की शादी एक जून को हुई है और घर में बहू आई है.

गुलिस्तां शेख की मां

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'सामान्य ज़िंदगी' के वापस पाने की जद्दोजहद

21 साल की गुलअफ़शां ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं और उनके अब्बू-अम्मी फिर से उनकी शादी के लिए पैसे जोड़ने में लगे हुए हैं. हाल में सरकार ने शादी समारोहों में सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने को कहा है और कहा है कि शादी में मेहमानों की संख्या कम होनी चाहिए.

लेकिन शिव विहार के इन संकरी गलियों में जहाँ इस साल के शुरुआत में हिंसा भड़की थी, लोग अपनी 'सामान्य ज़िंदगी' के वापस पाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं. अब भी यहाँ आप जले हुए घरों की निशानियाँ देख सकते हैं. एक पार्किंग में आप जले हुए कारों के अवशेष देख सकते हैं जो वैसे ही पड़े हुए हैं.

हर जगह यहाँ अब चहल-पहल है. और जिन लोगों ने यहाँ कुछ महीने पहले आगजनी, खून, चमकती तकवारें देखी हों, उनके लिए ऐसा लगता है कि वायरस का कोई डर ही नहीं रहा गया है. गुलअफ़शाँ कहती हैं कि हमें इन नुकसान झेलने की आदत हो गई है.

उनके अब्बू ने हालांकि उनके लिए एक लड़का ढूंढ लिया है. उन्होंने मोबाइल पर उसकी तस्वीर गुलअफ़शाँ को दिखाई है और वो शादी को मान गई हैं. उनका होने वाला पति जाकिर हुसैन कॉलेज के पास ही अपनी बीमार मां के साथ रहता है. वो एक विज्ञापन बोर्ड पर पेंटिंग करने का काम करता है और 10-12 हज़ार रुपए महीने कमा लेता है.

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सोशल डिस्टेंसिंग का पालन

गुलअफ़शां के अब्बू के लिए इतना काफी है. गुलिस्तां की शादी की रात उनके होने वाले शौहर 26 साल के फैज़ान खान अपने मेहमानों को मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की नसीहत दे रहे थे. लेकिन सजी-धजी औरते उनकी एक नहीं सुन रही थी.

उन्होंने पुराने मुस्तफाबाद के एक मैरेज हॉल में शादी की इजाज़त स्थानीय प्रशासन के स्तर पर ली हुई है. साढ़े नौ बजे के करीब उनका निकाह हुआ. उनके दोस्त जहीर बताते हैं कि फैज़ान अपनी शादी के लिए खास तौर पर चांदनी चौक से टॉम एंड जेरी के प्रिंट वाला मास्क खरीद लाया है.

फैज़ान कहते हैं, "इस दिन का इंतज़ार मुझे लंबे वक्त से था. हर मर्द को होता है." लेकिन उन्हें अपनी शादी के इंतजाम के लिए महीने भर का भी समय नहीं मिल पाया. वो और बेहतर इंतेजाम कर सकते थे. उन्होंने गुलिस्तां की तस्वीर देखी थी और वो उन्हें पसंद आ गई थीं.

फैज़ान

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ज़िंदगी की उम्मीद

फैज़ान ने सिर्फ सातवीं तक पढ़ाई की है और अपने अब्बू के गुजर जाने के बाद परिवार की जिम्मेवारी संभालने के लिए स्कूल छोड़ दिया. लेकिन वो शादी की रात यह सब बातें नहीं करना चाहते. उनकी मां लंबे समय से बीमार हैं. उनकी भाभी शादी के सारे काम कर रही हैं.

जब सारे मेहमान चले गए तब इस जोड़े ने साथ में तस्वीर ली एक-दूसरे के साथ खड़े होकर बाहों में बांह डाले और चेहरे पर मुस्कान के साथ. ताकि शादी की एल्बम में यह तस्वीर लगा सके. इस मुश्किल वक्त में यह ज़िंदगी की उम्मीद की तस्वीर है. वे अपनी होने वाली बीवी के लिए अंगूठी लाए थे. देर रात बरात लौट गई.

कोई बड़ा तामझाम नहीं हुआ. थोड़े-बहुत जो मेहमान थे, उनके लिए कोरमा और बिरयानी थी. गुलिस्तां के अब्बू हॉल के बाहर खड़े थे.

वो कहते हैं, "जवान लड़की बाप के सीने पर बोझ होती है. मुझे लगा कि मैं उसके लिए लड़का नहीं ढूंढ पाऊंगा. मुझे इस शादी में डेढ़ लाख रुपये लग गए. अगर कोई दूसरा वक्त होता तो शायद मैं इसे और बेहतर तरीके से कर पाता."

गुलिस्तां शेख

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कई मय्यतें देखीं...

अपनी बेटी की विदाई के बाद शम्सुल को अपने ऊपर चढ़े कर्ज को चुकाना है. लेकिन अपनी बेटी को शादी में तोहफा देने के लिए वो किसी भी तरह से कुछ बंदोबस्त कर पाए. एक डिनर सेट, कुछ फर्नीचर, कोई सोने का गहना नहीं, लेकिन दूल्हे के लिए न कोई सूट ले पाए और ना ही सोने का चेन.

लेकिन आने वाले वक्त में शायद वो कुछ कर पाए अपने दामाद के लिए. वो कहते हैं, "मैं जो कर सकता था मैंने किया."

मैरेज हॉल के बाहर अंधेरे में किसी बूढ़ी महिला की आवाज़ आ रही थी, "हमेशा संतुलन बना रहता है. वो कह रही थीं, "हमने कई मय्यतें देखीं. कई शादियां देखीं. ये वायरस हमसे हमारी ज़िंदगी को लेकर जो जज्बा है वो नहीं छीन सकता."

गुलिस्तां की बहन ने अगली सुबह फोन करके बताया कि सब कुछ ठीक रहा. गुलिस्तां अपने नए घर जा चुकी हैं. गुलाबी दीवारों वाला उनका कमरा अब खाली है. उसके कुछ पुराने कपड़े, हेयरपिन, एक पुराना स्कूल बैग और उसकी ट्रॉफी पड़ी है और उसके कुछ सपने जो कहीं पीछे छूट गए हैं.

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