कोरोना लॉकडाउन में भूखों को खाना खिलाने की ख़ातिर बेच दी ज़मीन

मुज़म्मिल पाशा

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

'अगर हम धर्म देखें और लोगों को खाना दें तो ईश्वर हमारी ओर देखना बंद कर देगा.'

यह कहना है मुज़म्मिल और तजम्मुल दो भाइयों का.

कर्नाटक राज्य के कोलार में रहने वाले इन दो भाइयों ने लॉकडाउन में ग़रीब लोगों को खाना खिलाने के लिए 25 लाख में अपनी संपत्ति बेच दी.

मुज़म्मिल पाशा ने दोनों भाइयों में छोटे हैं.

37 साल के मुज़म्मिल ने बीबीसी से कहा, 'हमें लगा कि बहुत से लोग हैं जो ग़रीब हैं, जिनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है. एक वक्त था जब हम ख़ुद भी बहुत ग़रीब थे. किसी ने हमारे प्रति भेदभाव नहीं रखा, अलबत्ता मदद ही की.'

जब इन दोनों भाइयों को एहसास हुआ कि लॉकडाउन के कारण बहुत से गरीब लोगों के लिए परिस्थितियां मुश्किल हो गई हैं और उन्हें परेशानी से जूझना पड़ रहा है तो इन दोनों भाइयों अपनी ज़मीन के टुकड़े को बेचने का फ़ैसला किया.

इस जगह पर वे अपने बागान की चीज़ों को स्टोर करते थे.

मुज़म्मिल बताते हैं, 'हमने ज़मीन का वो टुकड़ा अपने एक दोस्त को बेच दिया. वो बड़ा भला मानस था और उसने हमें उस ज़मीन के बदले 25 लाख रुपये दिये. इस दौरान और भी बहुत से दोस्तों ने अपनी-अपनी ओर से सहयोग किया. किसी ने 50 हज़ार रुपये दिए तो किसी ने एक लाख रुपये. वास्तव में यह कहना ठीक नहीं है कि अभी तक कितना ख़र्च किया जा चुका है. अगर ईश्वर को पता है तो काफी है.'

बिना किसी भेदभाव के मदद

वो बताते हैं, 'हमने ग़रीबों को खाना देना शुरू किया और जिस किसी भी जगह पर हमें पता चला कि कोई किल्लत से जूझ रहा है वहां हमने उसे 10किलो चावल, 2 किलो आटा, एक किलो दाल, एक किलो चीनी, 100-100 ग्राम करके धनिया, लाल मिर्च, हल्दी, नमक और साबुन इत्यादि चीज़ें मुहैया करायीं.'

वीडियो कैप्शन, मास्क पहनने को लेकर अब भी लोगों में काफी संशय और संदेह हैं.

रमज़ान को शुरू हुए दो दिन हुए हैं और इन दो दिनों में ढाई हज़ार से तीन हज़ार लोगों को खाने के पैकेट दिए जा रहे हैं और ज़रूरत की चीज़ें भी.

इन दोनों भाइयों ने बहुत छोटे पर ही अपने पिता को खो दिया था.

जब पिता की मौत हुई तो बड़ा भाई चार साल का और छोटा भाई तीन साल का था.

लेकिन दुख यहीं ख़त्म नहीं हुआ.

40 दिन ही बीते थे कि मां का भी निधन हो गया.दोनों बच्चों को उनकी दादी ने बड़ा किया.

एक स्थानीय मुअज्ज़िन ने उन्हें एक मस्जिद में रहने के लिए जगह दी.

मस्जिद के पास ही एक मंडी थी,जहां दोनों भाइयों ने काम करना शुरू किया.

मुज़म्मिल बताते हैं, 'हम दोनों बहुत अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं. साल 1995-96 में हम हर रोज़ 15 से 18 रुपये रोज़ाना कमाया करते थे. कुछ सालों बाद मेरे भाई ने मंडी शुरू करने के बारे में सोचा.'

जल्द ही दोनों भाइयों ने कुछ और मंडियों की शुरुआत की. अब वे आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से भी केले लाते हैं और डीलरों के साथ थोक व्यापार करते हैं.

लेकिन ग़रीबों को खाना खिलाने का विचार कहां से आया?

मुज़म्मिल कहते हैं, 'हमारी दादी हमें बताया करती थीं कि हमारी परवरिश के लिए बहुत से लोगों ने मदद की थी. किसी ने पांच रुपये की मदद की तो किसी ने दस रुपये की. वो कहा करती थीं कि हमें बिना किसी भेदभाव के लोगों की मदद करनी चाहिए.वो अरबी पढ़ाया करती थीं.

'मुज़म्मिल कहते हैं, 'धर्म सिर्फ़ इस धरती पर ही है. ईश्वर के पास नहीं.वो जो हम सब पर नज़र रखता है वो सिर्फ़ हमारी भक्ति को देखता है बाकी और कुछ नहीं.

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