कोरोना वायरस: लॉकडाउन में कैसे रह रहे हैं स्पेशल बच्चे?

    • Author, सूर्यांशी पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

“कब तक रहेगा लॉकडाउन! अब बहुत हो गया”

“घर में रहा नहीं जा रहा...आख़िर कब ख़त्म होगा लॉकडाउन”

लोग आपस में एक-दूसरे को वाट्सऐप मैसेज कर बाहर ना जा पाने की टीस कुछ यूं निकाल रहे हैं.

इसके अलावा और कर भी क्या सकते हैं. फिर ख़याल आता है कि जब हम और आप इस लॉकडाउन में कभी-कभी तनाव में आ जाते हैं तो स्पेशल बच्चों को कैसा महसूस हो रहा होगा.

यह ख़याल हमें कुछ स्पेशल बच्चों के परिवार तक ले आया जिससे हमने जाना कि आख़िर वह इस लॉकडाउन में कैसे कर रहे हैं अपने बच्चों की देखभाल.

दिल्ली में रहने वाली फ़्रूटी को डाउन सिंड्रोम है. आजकल अपनी मां के साथ वह कई नई चीज़ें सीख रही हैं, जैसे अपना पसंदीदा खाना बनाना, गुड़िया के लिए नए-नए कपड़े सिलना.

फ़्रूटी की मां, रजनी बताती हैं कि लॉकडाउन जिस दिन से लागू हुआ, उन्होंने फ़्रूटी को कहा कि "फ़्रूटी बाहर एक बीमारी घूम रही है तो अब आपको घर में रहना होगा वरना पुलिस पकड़कर ले जाएगी. फिर आप मुझसे मिल नहीं पाओगे."

वह बताती हैं कि फ़्रूटी को समझाना मुश्किल नहीं था. वह जल्द ही समझ गई और वह उसको तरह तरह के कामों में उलझाए रखने की कोशिश करती रहती हैं.

फ़्रूटी को गुड़िया के लिए कपड़े बनाना पसंद है तो वह उस काम को ख़ूब रुचि से करती है.

जिन परिवारों से हमने बात की उनमें से कुछ के बच्चे स्पेशल खिलाड़ी भी हैं.

स्पेशल खिलाड़ी भी इस लॉकडाउन से निपट रहे हैं

हरियाणा की रहने वाली मुस्कान एक स्पेशल खिलाड़ी है. 18 वर्ष की मुस्कान मानसिक रूप से कमज़ोर हैं.

वह अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भारत की तरफ़ से पॉवर लिफ्टिंग के खेल में भाग लेती है.

मुस्कान की मां, नीना गर्ग, अपने पति से अलग होने के बाद अकेले ही मुस्कान को संभाल रही हैं.

14 साल की थी मुस्कान जब उसने सोनीपत में अपने स्कूल में खेलना शुरू किया था जिसके बाद मां ने उसको स्पेशल ओलंपिक भारत से जोड़ दिया जहां वह पॉवरलिफ़्टिंग के खेल में ट्रेनिंग लेती है. नीना के दो बेटे हैं जिनकी कमाई के ज़रिए उनका घर चलता है.

वह बताती हैं कि जबसे लॉकडाउन हुआ है, मुस्कान स्कूल और अपनी स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग के लिए जा नहीं पाती. लेकिन उसके कोच उसको कुछ वीडियो भेजते हैं जिससे वह घर में व्यायाम करती है.

नीना ने मुस्कान के लिए एक रूटीन तैयार किया है जिसमें वह उसको सुबह व्यायाम करने को कहती है, फिर उसको घर के काम में लगाए रखती हैं जैसे साथ खाना बनाना या फिर उसको सिलाई भी सिखाती हैं.

यही नहीं वह मुस्कान के साथ बैटमिंटन भी खेलती हैं और उससे पेंटिंग भी करवाती हैं.

हमने पूछा, कभी-कभी तो वो परेशान होकर घर से बाहर जाने की ज़िद्द करती होगी, तब आप क्या करते हो?

तो नीना कहती हैं कि बच्चे चाहे नॉर्मल हो या स्पेशल, हमें उनको सुनना चाहिए. सब्र ऐसे समय में सबसे ज़्यादा काम आता है. अगर बच्चा कुछ बोल रहा है तो उसको बोल लेने दो और फिर आप उसको प्यार से समझाओ, वो ज़रूर समझेगा.

कोच कैसे रख रहे हैं स्पेशल खिलाड़ियों का ख़याल ?

भारतीय खेल प्राधिकरण के अंतर्गत आने वाले स्पेशल ओलंपिक भारत इन स्पेशल खिलाड़ियों को ट्रेन करते हैं. ट्रेनिंग देने के साथ-साथ उनका ख़याल भी रखते हैं.

स्पेशल ओलंपिक भारत के महासचिव बताते हैं कि जितने भी स्पेशल खिलाड़ी उनकी संस्था से जुड़े हुए हैं उन सबके लिए अलग-अलग कोच निर्धारित किए गए हैं. यह कोच लॉकडाउन जैसे कठिन समय में भी उनके संपर्क में रहते हैं और उनसे बात करते रहते हैं.

गोवा में रहने वालीं 19 वर्षीय अविला भले ही मानसिक रूप से कमज़ोर हैं लेकिन आज पेशे से ज़ुम्बा इंस्ट्रक्टर हैं. वह लॉकडाउन में फंसी ज़रूर हैं लेकिन उनकी ट्रेनर उन्हें कोरियोग्राफ़ कर डांस के नए तरीके भेजती रहती हैं जिसका वह अभ्यास कर अपने ज़ुम्बा को निखारती हैं.

स्पेशल ओलंपिक भारत के गोवा के एरिया कोच बताते हैं कि लॉकडाउन के लागू होने से पहले जनवरी के महीने से ही वह स्पेशल खिलाड़ियों को कोरोना वायरस के प्रति जागरूक कर रहे थे.

जब लॉकडाउन हुआ तो इन खिलाड़ियों के लिए ‘फ़िट 5’ करके एक वीडियो सिरीज़ बनाई गई जो निर्धारित कोच को भेजा गया.

वह बताते हैं कि कोच और खिलाड़ियों का रिश्ता इतना मज़बूत है कि कभी-कभी माता-पिता अपनी बात मनवाने के लिए बच्चों के सामने कोच का नाम लेते हैं और फिर बच्चे जल्द से वो बात मान लेते हैं.

कैसे रखें मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों का ख़याल?

हमने उनसे पूछा कि लॉकडाउन के चलते स्पेशल बच्चों का ध्यान किस तरह रखा जाना चाहिए?

तो वह कहते हैं कि इन बच्चों को सिर्फ़ प्यार चाहिए होता है और वह काफ़ी है इनको समझाने के लिए. अगर परिवार का सहारा नहीं मिलेगा तो यह चिंता की बात हो जाती है.

गंगाराम अस्पताल में बच्चों के मनोचिकित्सक, दीपक गुप्ता बताते हैं कि लॉकडाउन में स्पेशल बच्चों की ज़रूरत उनको कौन सी विकलांगता है इस पर निर्भर करती है.

वह कहते हैं कि मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों के लिए लॉकडाउन में ज़रूरी है कि उनकी बात सुनी जाए.

कोशिश करें कि वह अपने डॉक्टर, कोच या थेरेपिस्ट से बात करते रहें.

बच्चों के लिए एक रूटीन बनाकर उनको व्यस्त रखने की कोशिश करें और सबसे ज़रूर है कि उनको नई-नई चीज़ों को सिखाने की कोशिश करें.

उनको पेंटिंग, डांस, संगीत के प्रति प्रेरित करें. लॉकडाउन के समय को बंधन ना समझकर स्पेशल बच्चों के मां-बाप को इसको एक अवसर मानकर चलना चाहिए जहां वह अपने बच्चों के बारे में और जान सकते हैं. उनके साथ और समय बिता सकते हैं और उनके अंदर आत्म विश्वास जगा सकते हैं.

भारत सरकार ने क्या क़दमउठाए हैं?

अब सवाल यह उठता है कि भारत सरकार ने इन स्पेशल बच्चों के लिए लॉकडाउन के चलते कोई दिशा-निर्देश जारी किए हैं?

बेंगलुरु में स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज ने स्पेशल बच्चों के लिए दिशा-निर्देश अपनी वेबसाइट पर जारी की हुई है. यही नहीं उन्होंने आम लोगों को भी मानसिक तनाव से बचने के कुछ उपाय बताएं है. साथ ही योगा से जुड़े कुछ वीडियो भी डाले हैं जिसके माध्यम से मानसिक तनाव को कम किया जा सकता है.

इसके अलावा केंद्र सरकार ने मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन भी जारी की है- 080 46110007.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)