मुंबई के कोरोना संक्रमित पत्रकारों के सामने कितना बड़ा है संकट

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- Author, मयंक भागवत
- पदनाम, बीबीसी मराठी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
मुंबई में क़रीब 53 पत्रकार और कैमरा पर्सन कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं.
बीते सप्ताह मुंबई में टीवी पत्रकारों के एसोसिएशन और बृहनमुबंई म्यूनिसिपल कारपोरेशन (बीएमसी) ने फ़ील्ड में काम करने वाले 167 पत्रकारों का कोविड-19 टेस्ट करवाया था. इस टेस्ट की रिपोर्ट आने के बाद पता चला है कि 53 रिपोर्टर और कैमरामैन कोरोना से संक्रमित हैं.
इस ख़बर के सामने आने के बाद कई मंत्रियों और राजनेताओं ने ट्विटर पर अपना दुख प्रकट किया है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस कांफ्रेंस में भी इस सूचना की पुष्टि की गई. स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया प्रतिनिधियों से कहा, "किसी बीमारी को रोकने में सबसे अहम है संक्रमण को रोकना. हमें जानकारी मिली है कि कुछ पत्रकार कोरोना से संक्रमित हो गए हैं. यह दुखद ख़बर है. हम पत्रकारों से अपील करते हैं कि काम करते हुए वे बचाव के सभी तरीक़ों को अपनाएं. सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखें. चेहरा ढंकने के लिए फ़ेस मास्क का इस्तेमाल करें."
पत्रकारों का दर्द
एक महिला पत्रकार ने बीबीसी मराठी से गोपनीयता की शर्त के साथ बताया, "हमें बीमारी का डर नहीं है. लेकिन कई पत्रकारों को इस बात का डर है कि वे घर से काम करने लगेंगे तो उनकी नौकरियां चली जाएंगी. आने वाले दिनों में मीडिया में छंटनी होगी. इसलिए कईयों को लगता है कि वे घर बैठ गए तो यह उनके हित में नहीं होगा."
वहीं एक अन्य फ़ोटोग्राफ़र ने गोपनीयता के साथ बीबीसी मराठी से अपना अनुभव बताते हुए कहा, "मैंने लॉकडाउन के बाद भी काम जारी रखा है. फ़ील्ड में काम करने के दौरान कई जगहों पर जाना होता है. ख़तरे में भी हमें काम करना होता है. ये बता पाना मुश्किल है कि किसके संपर्क में आने से मैं संक्रमित हुआ. हम रोज़ाना कई लोगों से मिलते हैं. लेकिन जब मैंने अपने दफ्तर को कोरोना संक्रमण के बारे में बताया तो उनकी प्रतिक्रिया बेहद ठंडी थी."
मुंबई में जिन पत्रकारों को कोरोना संक्रमित पाया गया है उनमें कई पत्रकार प्रमुख चैनलों से संबंद्ध हैं.
इनमें से एक पत्रकार ने बताया, "इसका कोई लक्षण नहीं था. कोरोना संबंधित ख़बरों को कवर करने के लिए मैं मुंबई में कई जगहों पर गया हूं. मैं धारावी भी गया और मैं कुछ एलीट इलाक़ो में भी गया. मैंने लोगों की समस्याएं कवर की और सरकार के लागू प्रावधानों को भी कवर किया. लेकिन मुझे इस पर यक़ीन नहीं हुआ कि मैं कोरोना संक्रमित हो गया हूं. मैं अपनी पूरी तरह देखभाल कर रहा था लेकिन फिर भी कोरोना संक्रमित हो गया."

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कोरोना के मुंबई में फैलने के बाद कुछ चैनलों ने अपने रिपोर्टर, कैमरामैन और फ़ोटोग्राफ़रों के दफ्तर आने से मना कर दिया.
एक कैमरामैन ने बताया, "लॉकडाउन की शुरुआत होने पर हमारे जैसे फ़ील्ड में काम करने वाले रिपोर्टर और कैमरामैन को दफ्तर में आने की अनुमति नहीं दी गई. हमें कैमरा और दूसरे उपकरण घर ले जाने को कहा गया. ऐसा रोस्टर बनाया गया जिसमें हमें एक सप्ताह काम करने की इजाज़त मिली और दूसरे सप्ताह हमें लीव दिया गया."
एक रिपोर्टर ने बताया, "फ़ील्ड में काम करते हुए हम कोरोना संक्रमित हुए. लेकिन हमें अपने परिवार के सदस्यों की चिंता नहीं हुई कि उनका क्या होगा, उनकी मदद कौन करेगा. काम पर नहीं जाना विकल्प नहीं हो सकता. लेकिन ऑफ़िस को इन चीज़ों को समझना चाहिए."
वहीं बीजेपी नेता किरीट सौमया ने कहा, "52 पत्रकारों का कोरोना पॉज़िटिव होना चौंकाने वाली बात है. मैं सरकार और उनके चैनलों से अनुरोध करता हूं कि इनके इलाज में मदद की जाए. इन सबको इंश्यूरेंस कवर मिलना चाहिए."
वहीं महिला एवं बाल कल्याण मंत्री यशोमति ठाकुर ने ट्वीट करने पत्रकारों को अपना ध्यान रखने की अपील की है.
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कई पत्रकारों को ख़ुद को आइसोलेट करने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. इनमें कई संयुक्त परिवारों में रह रहे हैं. कुछ महिला पत्रकारओं को घर का काम भी संभालना होता है, उसके बाद फ़ील्ड में जाकर उन्हें काम करना होता है. इन लोगों की मुश्किलें काफ़ी बढ़ गई है. ऐसे मुश्किल में घर का काम करने के लिए किसी तलाशना भी संभव नहीं है. फ़ील्ड में काम करने वाली कुछ महिला पत्रकार अपने घरों से दूर रह रही हैं ताकि उनके घर के लोग सुरक्षित रहें.
इन दिनों, मुंबई म्यूनिसिपलिटी रिपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विष्णु सोनावाने ने बताया कि इन सभी 53 पत्रकारों को गोरेगांव के फ़र्न होटल में क्वारंटीन किया गया है और उनका इलाज किया जा रहा है.
मुंबई और पुणे कोरोना के हॉटस्पॉट बन गए हैं. मुंबई में कोरोना संक्रमित मरीज़ों की संख्या 2700 के पार पहुंच चुकी है. राज्य में अब तक कोरोना संक्रमित 223 लोगों की मौत हो चुकी है, जिसमें 132 मौतें केवल मुंबई में ही हुई है.
डरे नहीं हैं पत्रकार
इस घटना के बाद भी पत्रकारों में कोरोना से डर का भाव नहीं है, क्योंकि जिस वक्त ये पत्रकार घरों से काम करना शुरू कर देंगे, उन्हें छंटनी का डर सताने लगेगा, क्योंकि मीडिया इंडस्ट्री में छंटनी का दौर शुरू होने वाला है. इसलिए पत्रकारों में यह डर दिख रहा है कि अगर वे घरों से काम करना शुरू कर देंगे तो उनकी छंटनी हो सकती है.
हालांकि दूसरा नज़रिया यह भी है कि मौजूदा समय में अभूतपूर्व स्थिति है. ऐसे वक्त में लोगों को सूचनाओं की ज़रूरत है. पत्रकारों की दी गई सूचनाएं प्रशासन और ज़रूरतमंद लोगों के बीच में पुल की भूमिका निभाते हैं. यही वजह है कि कई पत्रकार कैलकुलेटेड रिस्क भी उठाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस समय मानवता को उनके काम की ज़रूरत है.
लेकिन मुंबई जैसे महानगर में जहां आबादी का घनत्व बहुत ज़्यादा है और संक्रमण फैलने की दर भी ज़्यादा है, ऐसे में आप जो भी काम करते हों और कितनी सावधानी बरतते हों, ख़ुद को संक्रमण से बचाना पूरी तरह से संभव नहीं है.
दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में लोगों के पास अपनी निजी कारें और बाइक होती हैं. ऐसी स्थिति में ख़बरों के लिए कहीं भी जा सकते हैं. लेकिन मुंबई जैसे महानगर में लोग सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर निर्भर हैं. इसलिए ज़्यादातर पत्रकारों के पास अपना वाहन नहीं है. इन लोगों को ऑफ़िस से ट्रांसपोर्ट मिल जाता है. लेकिन ऐसे मामलों में दफ्तर एक ही कार और एक ही चालक की सुविधा नहीं दे पाती. हाल ही में कुछ चालक कोरोना पॉज़िटिव पाए गए हैं और इसके चलते दफ्तरों के वाहन के इस्तेमाल पर भी सवालिया निशान उठ रहे हैं.
बीते सप्ताह तक संक्रमण इलाक़े में रहने वाला एक ड्राइवर हर दिन दफ्तर आता रहा. कुछ रिपोर्टरों ने जब इस मुद्दे को उठाया तब उसे घर पर रहने को कहा गया. लेकिन यह भी संकट की स्थिति होती है क्योंकि उससे दूसरों की आजीविका प्रभावित होती है.
रिपोर्टिंग करने के लिए लोगों से बात करने की ज़रूरत होती है. प्रिंट मीडिया के कम से कम आधे पत्रकार घर पर बैठकर फोन कॉल करके स्टोरीज कर लेते हैं. लेकिन इन लोगों का भी कहना है कि जब आप फेस टू फेस नहीं मिलते हैं तो फोन पर लोगों का आपके सवालों के जवाब देने में मुश्किलें होती हैं. यह आसान नहीं होता. इससे काम की क्षमता और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं. वहीं टीवी पत्रकारों के लिए स्टोरी करने के लिए बाइट लेनी ही होती है. वे इसे टाल नहीं सकते.
टीवी रिपोर्टरों को एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े जाना होता है, जिससे ख़तरा बढ़ जाता है. डेस्क पर काम करने वाले ज़्यादातर लोग इस स्थिति को नहीं समझते.
कुछ स्थानीय चैनलों के रिपोर्टरों पर काफ़ी ज़्यादा दबाव होता है. जब तक सरकार गाइडलाइंस जारी नहीं करती तब तक ज़्यादातर संस्थान फ़ील्ड रिपोर्टिंग निलंबित नहीं करना चाहते. इसकी दो वजहें मानी जाती हैं.
एक तो इन मीडिया संस्थानों को केवल कंटेंट की चिंता नहीं होती है, उन्हें लगता है कि कहीं ये माध्यम भी अप्रासंगिक नहीं हो जाए. ऐसी स्थिति का सामना प्रिंट मीडिया इन दिनों कर रहा है. इसलिए फ़ील्ड में लोगों के नहीं रहने से उनके अप्रासंगिक होने का ख़तरा बढ़ सकता है, इससे विज्ञापन से होने वाली कमाई पर भी असर पड़ेगा. जिससे दूसरी मुश्किलें बढ़ेंगी.
टीवी के डेस्क और आपस में गला काट प्रतिस्पर्धा के चलते रिपोर्टरों को फ़ील्ड में उतरना ही होता है. इस संकट के समय में भी उनके पास फोन आते हैं कि दूसरे चैनलों पर ये स्टोरी चल रही है, तुम्हारे पास क्यों नहीं है?
हालांकि मेरे दफ्तर में इस तरह का दबाव नहीं होता है.
इसके अलावा पत्रकारों में भी जागरूकता का अभाव है. कुछ लोग बेपरवाह भी होते हैं. कुछ रिपोर्टर कंटेनमेंट ज़ोन में भी इंटरव्यू करने और वॉकथ्रू करने चले जाते हैं. एक रिपोर्टर के ऐसा करने के बाद दूसरे रिपोर्टरों में भी इसकी होड़ लग जाती है.
कई मीडिया संस्थाओं ने घर से काम करने वालों और डेस्क पर काम करने वाले लोगों के लिए गाइडलाइंस जारी की है, लेकिन ज़्यादातर चैनलों ने फ़ील्ड में काम करने वाले रिपोर्टरों के लिए कोई गाइडलाइंस जारी नहीं की है.
एक चैनल में एक रिपोर्टर और वीडियो जर्नलिस्ट कोरोना संक्रमित हो गए लेकिन चैनल ने सुरक्षा के लिहाज़ से अपने दूसरे कर्मचारियों का टेस्ट नहीं करवाया.
चैनलों को अपनी साख की भी चिंता है. क्योंकि उन्हें लगता है कि जब लोगों को पता चलेगा कि इनके रिपोर्टर कोरोना संक्रमित हो गए हैं तो इसका असर उनके चैनल पर पड़ेगा. ज्यादातर चैनलों ने अपने रिपोर्टरों को मना कर दिया कि वे दफ्तर नहीं आएं, माना कि वे अपना बचाव ख़ुद करें.

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