एपी सिंहः निर्भया केस से लेकर चिन्मयानंद को ज़मानत दिलाने तक

    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

किसी केस में सज़ा-ए-मौत मिलने पर आमतौर पर किन-किन न्यायिक सहूलितों का विकल्प बचता है- रिव्यू पीटिशन, क्यूरेटिव पीटिशन और दया याचिका का.

लेकिन निर्भया केस में अभियुक्तों पवन गुप्ता, मुकेश सिंह, अक्षय ठाकुर और विनय शर्मा ने फांसी की सज़ा से बचने के लिए ऐसी-ऐसी तरक़ीब लगाई जिससे ये केस सात साल तीन महीने तक खींचता चला गया. और इस केस को यहां तक पहुंचाने का सारा क्रेडिट अजय प्रकाश सिंह यानी एपी सिंह को जाता है.

इन चार में से तीन अभियुक्तों के वकील एपी सिंह थे. शुक्रवार की सुबह साढ़े पांच बजे चारों अभियुक्तों को तिहाड़ जेल में फ़ांसी दी गई.

लेकिन एपी सिंह ने मामले को हर न्यायिक स्तर पर ले जाकर मौत की सजा पलटने की आख़िर तक कोशिश की.

बतौर वकील उन्होंने दलील दी कि फ़ांसी किसी अपराध की सज़ा देने का तरीका नहीं हो सकता. और इस दलील के साथ वो इस केस को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस तक ले गए.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका

यहां तक कि गुरुवार की रात में अभियुक्त अक्षय सिंह की दया याचिका को ख़ारिज करने के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई.

और नतीजा ये हुआ कि एपी सिंह की जमकर आलोचना हुई. उन पर कानूनी कमियों के जरिए न्याय में देरी के आरोप लगाए गए. फ़ांसी के ठीक बाद तिहाड़ के गेट नंबर 3 के पास लोगों ने जश्न मनाते हुए, "निर्भया ज़िंदाबाद, एपी सिंह मुर्दाबाद" के नारे लगाए.

जब देश के प्रधानमंत्री इसे न्याय और महिलाओं का सम्मान बता रहे हैं तो एपी सिंह कहते हैं तमाम मीडिया ट्रायल के कारण इस केस का फ़ैसला तो आया लेकिन न्याय नहीं हुआ.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "जब देश के चारों मजबूत खम्भे (न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस) खिलाफ़ होते हैं तो यही नतीजा होता है. जब कई मामले पेंडिंग थे, आईपीसी की धारा 308 के तहत पवन कुमार का सिर फ़ाड़ने का मामला पेंडिंग था, गवर्नर और दिल्ली के सीएम के यहां मामला 432 और 433 के तहत विचाराधीन था तो फ़ांसी क्यों दी गई. सरकार ने इस केस को केस की तरह ना देख कर प्रतिष्ठा से जोड़ लिया."

दोषियों के लिए फांसी की मांग

एपी कैटेगोरियल सज़ा की बात करते हैं यानि अपराध में जिसका जितना हिस्सा हो उसे उसके मुताबिक़ सज़ा दी जाए. कानून के जानकार मानते हैं कि याचिका ख़ारिज होने के बाद मिलने वाले 14 दिन का इस्तेमाल एपी सिंह ने काफ़ी चतुराई से किया और इस केस को आगे तक ले गए.

सुप्रीम कोर्ट की जानी-मानी अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह, जस्टिस मारकंडे काटजू भी फांसी की सज़ा के खिलाफ़ रहे हैं. इस केस पर एपी सिंह ने एक किताब 'दामिनी: अ पॉलिटिकल मर्डर' लिखी है.

इसमें उन्होंने कहा है, "मुझे पता है कि इस केस में बहुत कुछ होगा. निर्भया को बचाना मुश्किल होगा क्योंकि लोग दोषियों के लिए फांसी की मांग कर रहे हैं. निर्भया को राजनीतिक कारणों से मारा गया. क्योंकि जिंदा रहते तो दोषियों को फांसी नहीं दी जा सकती, ऐसे में मार दिया गया."

एपी कहते हैं, "मैंने अपनी किताब में लिखा है कि कानून का दुरुपयोग कैसे होता है. आप बताइए अक्षय ठाकुर की पत्नी औरंगाबाद कोर्ट में तलाक़ की अर्ज़ी दी है अब वो किससे तलाक लेगी. अब वो विधवा हो गई, वो विधवा नहीं होना चाहती थी. उसके बच्चे के कई अधिकार नहीं हैं."

प्रोग्रेसिव और रिग्रेसिव का मिक्सचर

एपी सिंह जहां फ़ांसी को लेकर प्रोग्रेसिव विचार रखते हैं वहीं उन्होंने 23 साल की फ़िजियोथैरिपिस्ट निर्भया को लेकर कई आपत्तिजनक बयान दिए जो उनकी रिग्रेसिव (पुराने विचारों वाली) छवि को सामने लाता है.

सितंबर 2013 में उन्होंने ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले के बाद एएनआई को दिए इंटरव्यू में कहा था, "अगर मेरी बहन या बेटी शादी से पूर्व संबंधों को प्राथमिकता दे या शादी से पूर्व अपना चाल-चरित्र खराब करे तो मैं उसे अपने फार्म हाउस पर अपने घर वालों के सामने सज़ा देने का माद्दा रखता हूं."

यहां तक कि 20 मार्च यानी फ़ांसी से कुछ घंटे पहले एपी सिंह ने निर्भया की मां को मिल रही सहानुभूति पर फिर सवाल उठाते हुए कहा, "पवन की मां विकलांग हैं अपने बेटे से मिलना चाहती हैं. उस मां का दर्द भी समझो. एक मां के लिए साढ़े सात साल से दौड़ते फिर रहे हो, नाचते फिर रहे हो. क्या पवन की मां, मां नहीं है?"

फांसी की सज़ा का विरोध करके वो न्यायिक प्रक्रिया में प्रोग्रेसिव बनने की बात करते हैं लेकिन महिलाओं को लेकर उनके बयान इतने बेतुके क्यों होते हैं?

इस पर वह कहते हैं, "हम बेटी-बहन के पैर छूते हैं. कन्यादान दुनिया का सबसे बड़ा दान होता है. क्या आप जेवर और नोटों की गड्डी लेकर रातों को घूमते हैं. जो लोग किस-डे, हग-डे, पब-बार कल्चर को मानते हैं उन्हें मेरी सोच खटकती है."

चिन्मयानंद से चंद्रास्वामी तक की पैरवी

लखनऊ से लॉ और अमरीका से क्रिमिनोलॉजी में डॉक्ट्रेट हालिस करने वाले एपी सिंह पूर्व बीजेपी नेता चिन्मयानंद के डिफ़ेंस काउंसिल भी रहे और उन्हें जमानत दिलाने में खास भूमिका निभाई. इसके अलावा वो डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम और हनीप्रीत के भी वकील रहे हैं. हनीप्रीत ने बाद में एपी सिंह से खुद को अलग कर लिया था.

एपी सिंह चंद्रास्वामी के क़रीबी भी रह चुके हैं साल 1997 में एपी सिंह विवादित तांत्रिक चंद्रास्वामी की पैरवी की थी. चंद्रास्वामी पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में परोक्ष रूप से शामिल होने का आरोप था.

मिलाप चंद्र जैन की अगुवाई वाली जैन कमेटी ने इस बात का साफ़ ज़िक्र किया था कि उन्होंने राजीव गांधी की हत्या करने वालों की मदद की. हालांकि इस रिपोर्ट में कई गड़बड़ियों का हवाला दिया गया और ये कोर्ट में टिक नहीं पाई. लेकिन साल 2017 में चंद्रास्वामी की मौत तक उनकी इस भूमिका की जांच होती रही.

विवादित मुकदमों से जुड़ने के सवाल पर वह कहते हैं, "मेरे पास जो केस आते हैं, मैं उनका केस लड़ता हूं. क्यों मेरे पास आते हैं चिन्मयानंद जी, क्यों आते हैं चंद्रास्वामी जी, राजस्थान के रामपाल जी, क्यों आते हैं राम रहीम, क्यों आती हैं हनीप्रीत, क्यों आते हैं नारायणसामी जी. देखिए मेरा तो काम ही वहां से शुरू होता है जहां से लोगों का काम ख़त्म होता है."

पुरुष आयोग की मांग करने वाले एपी

इतना ही नहीं एपी सिंह पुरुष आयोग बनाने की वकालत करते हैं.

उनका कहना है कि कई पुरुष महिलाओं के कारण आत्महत्या करते हैं उन्हें भी महिला आयोग की तरह एक आयोग की ज़रूरत है.

यूं तो एपी सिंह ने कई हाईप्रोफ़ाईल केस लड़ चुके हैं. लेकिन निर्भया केस ने उन्हें वो पॉपुलैरिटी दे दी है जो उन्हें अब तक किसी केस में नहीं मिली थी.

लोगों ने आलोचनाओं में ही सही लेकिन उनका नाम याद रखा है. और नाम इसलिए भी याद रखा गया क्योंकि कानून के इतने आयामों और विकल्पों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने इस केस के अपराधियों की सज़ा में देरी करने में सफल भी हुए.

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