कोरोना वायरस: ईरान में फंसे भारतीयों की बढ़ती मुसीबतें, भारत सरकार से लगा रहे गुहार

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 3 मिनट
"हम तेहरान इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास परांद शहर के एक अपार्टमेंट में फंसे हुए हैं. कोरोना के आतंक की वजह से हमारे दिन का चैन और रातों की नींद हराम हो गई है. घर में खाने-पीने का स्टॉक भी तेजी से ख़त्म हो रहा है. बाहर निकलने में ख़तरा है."
ये कहते हुए कोलकाता के इलेक्ट्रिकल इंजीनियर सायंतन बनर्जी के चहरे से हताशा साफ़ झलकती है. उस अपार्टमेंट में जो 22 लोग रह रहे हैं उनमें से 11 भारतीय हैं.
सभी इंजीनियर हैं. उनमें से पश्चिम बंगाल के दो लोग हैं- कोलकाता के सायंतन और दुर्गापुर के विकास दास. बाकी लोग श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान के हैं.
वे लोग दुबई स्थित एक तंबाकू कंपनी में काम करते हैं. लेकिन कोरोना वायरस की वजह से उनके दफ्तर फिलहाल बंद है.
सायंतन ने चार दिनों पहले एक वीडियो संदेश के जरिए सरकार से परांद के एक अपार्टमेंट में फंसे लोगों को बचाने की गुहार लगाई थी.
हालांकि अब एक मेडिकल टीम तेहरान पहुंच गई है.
लेकिन सायंतन बताते हैं कि अब तक किसी ने उन लोगों से संपर्क नहीं किया है. वे अब किसी भी तरह जल्द से जल्द घर लौटना चाहते हैं.

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एक साल पहले दुबई से आए थे ईरान
कोलकाता में पढ़ाई-लिखाई कर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद सायंतन ने पहले तो कुछ साल यहीं नौकरी की.
लेकिन साल 2017 में दुबई की कंपनी में नौकरी मिलते ही वहां चले गए. अभी एक साल पहले ही कंपनी ने एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में इन लोगों को परांद भेजा था.
परांद में अगर सायंतन परेशान हैं तो कोलकाता में उनकी मां शर्मिला देवी और बहन डॉक्टर विश्वरूपा बनर्जी भी कम परेशान नहीं हैं.
शर्मिला देवी कहती हैं, "किसी तरह मेरे बेटे को घर बुला दीजिए. बेटे की सलामती की फ़िक्र में खाना-पीना तक भूल गए हैं. मोबाइल की घंटी बजते ही आंखें इस उम्मीद में चमकने लगती हैं कि शायद कहीं से कोई खुशखबरी मिल जाए. लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती है."
सायंतन के पिता का निधन लगभग दस साल पहले हो गया था. ऐसे में बेटे की सलामती के लिए मां की चिंता और बढ़ गई है.
सायंतन की बहन और पेशे से होम्योपैथिक डाक्टर विश्वरूपा बताती हैं, "भैया का दफ्तर बंद है. रोजाना उनसे बातचीत हो रही है. लेकिन वापसी की राह में पैदा गतिरोध टूटने का नाम नहीं ले रहा है. सरकार वहां फंसे लोगों को जितनी जल्दी बुला ले उतना ही अच्छा होगा."

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'शहर में कर्फ़्यू जैसा नज़ारा'
सायंतन बीबीसी से बताते हैं, "हम जहां रहते हैं, वहां से लगभग 130 किमी दूर कूम नामक शहर में कई लोग कोरोना की चपेट में आकर मारे जा चुके हैं. हम बेहद आतंकित हैं. किसी तरह यहां से निकलकर देश लौटना चाहते हैं. लेकिन कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है."
वो बताते हैं कि परांद शहर में कर्फ़्यू जैसा नजारा है. सड़कें और बाज़ार वीरान हैं. सिर्फ इक्का-दुक्का गाड़ियों की आवाज ही इस ख़ामोशी को तोड़ती है.
सायंतन का कहना है कि बीते आठ-दस दिनों से किसी बाहरी व्यक्ति के साथ उन लोगों का कोई संपर्क नहीं हुआ है. पहले उन लोगों ने दुबई होकर वापसी की बुकिंग कराई थी. लेकिन संक्रमण फैलते ही तमाम उड़ानें रद्द कर दी गईं. उसके बाद से यह तमाम लोग अपने घर में कैद होकर रह गए हैं.
सायंतन का वीडियो संदेश वायरल होने के बाद इलाके की तृणमूल कांग्रेस सांसद माला राय ने सायंतन की मां और बहन से मुलाकात कर इस मामले को विदेश मंत्रालय के समक्ष उठाने का भरोसा दिया है. सायंतन के परिजनों ने राज्य सरकार से मदद की अपील की है ताकि उनका बेटा सुरक्षित घर लौट सके.
सायंतन के साथ उसी अपार्टमेंट में दुर्गापुर के मैकेनिकल इंजीनियर विकास दास भी हैं. विकास के पिता विष्णुपद दास बताते हैं, "बेटे से रोज़ाना वीडियो काल के जरिए बातचीत होती है. लेकिन हम बेहद चिंतित हैं. हमने सरकार से उसकी शीघ्र वापसी का इंतजाम करने की अपील की है." दास ने दुर्गापुर में स्थानीय प्रशासन के जरिए राज्य सरकार से मदद की गुहार लगाई है.
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