दिल्ली में पुलिस दंगे कंट्रोल कैसे कर सकती है: सुरेश खोपड़े, रिटायर्ड आईपीएस

सुरेश खोपड़े की पहल के चलते भिवंडी 1992 में दंगों से बच गया था
इमेज कैप्शन, सुरेश खोपड़े की पहल के चलते भिवंडी 1992 में दंगों से बच गया था
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राजधानी दिल्ली में सरेआम हो रही जानलेवा हिंसा तमाम सवाल खड़े कर रही है. सवाल सियासतदानों पर कि वो ऐसे भड़काऊ बयान कैसे दे सकते हैं. सवाल दिल्ली पुलिस पर कि वो तीन दिन बाद भी हालात क़ाबू करने की स्थिति में क्यों नहीं हैं. और सवाल हाथ में पत्थर लिए लोगों पर भी कि इतनी हिंसा को उन्होंने अपने भीतर पलने कैसे दिया.

1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी इस देश ने अपना बहुत ख़ून बहाया था. पर उस वक्त महाराष्ट्र का भिवंडी ऐसा शहर था, जहां सांप्रदायिक हिंसा को पलने का मौक़ा नहीं दिया गया. इसके पीछे थे आईपीएस सुरेश खोपड़े, जिनकी कम्युनिटी पुलिसिंग जैसी पहल ने माहौल बिगड़ने से पहले ही संभाल लिया.

दिल्ली हिंसा में पुलिस की विफलता को लेकर जब बीबीसी संवाददाता नितिन नगरकर ने उनसे बात की, तो उन्होंने कई सटीक बातें कहीं.

पुलिस की संदिग्ध भूमिका के सवाल पर सुरेश कहते हैं, "सब मानते हैं कि हिंदू-मुस्लिम फ़साद में पुलिस की भूमिका तटस्थ होनी चाहिए, लेकिन बहुत बार ऐसा होता नहीं है. क्योंकि कॉन्स्टेबल से लेकर आईपीएस तक पुलिस की जो ट्रेनिंग होती है, उसमें आधा टाइम एक्सरसाइज़ करने और आधा टाइम क्रिमिनल प्रोसीजर और इंडियन पीनल कोड जैसे क़ायदे स्टडी करने में जाता है."

सुरेश कहते हैं कि एक्सरसाइज़ की ज़्यादा ज़रूरत हमारे दिमाग़ को होती है. 'हमारे दिमाग़ में जो भावनात्मक और आलोचनात्मक पहलू हैं, हम उनके बारे में नहीं सोचते हैं.'

'परवरिश से भी बदल जाती हैं कई चीज़ें'

परवरिश के बारे में सुरेश कहते हैं, "हिंदू हो या मुसलमान, उनके घर में उनके ऊपर जो प्रभाव होता है, जिसे हम परवरिश बोलते हैं. एक-दूसरे के बारे में जो पूर्वाग्रह होते हैं, वो सारे पूर्वाग्रह हम पुलिस में आते हैं. फिर एक-दूसरे की तरफ देखने का तरीका भी अलग होता है."

दंगों में पुलिस की विफलता की दूसरी वजह सुरेश मानते हैं कि पुलिस की जो इंटरनेट ट्रेनिंग यानी ऑन दि जॉब ट्रेनिंग होती है, उस पर ध्यान नहीं दिया जाता.

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात सुरेश यह बताते हैं, "पुलिस का काम करने का तरीका और उद्देश्य जो होता है, उसकी वजह से वो आंकड़ों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं. गुनाह कितने बढ़े, कितने कम हुए, इस पर ध्यान देते हैं. लेकिन जिन लोगों के लिए काम करना होता है, उन लोगों के साथ संवाद नहीं होता है. इसी को हम कम्युनिटी पुलिसिंग कहते हैं, जो होती ही नहीं है."

सुरेश यह भी मानते हैं कि सीनियर और जूनियर अफसरों के बीच अंडरस्टैंडिंग का बहुत फर्क और अंतर होने की वजह से अच्छा टीमवर्क नहीं होता. 'टीमवर्क और क्राइम कंट्रोल करने के अलग-अलग तरीकों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता.'

दिल्ली में मस्ज़िदों को नुकसान पहुंचाया गया. एक मस्ज़िद पर यूं झंडे लगा दिए गए.
इमेज कैप्शन, दिल्ली में मस्ज़िदों को नुकसान पहुंचाया गया. एक मस्ज़िद पर यूं झंडे लगा दिए गए.

'फायर ब्रिगेड की तरह काम करती है भारत की पुलिस'

सुरेश भारत की पुलिस की तुलना फायर ब्रिगेड से करते हैं. वह कहते हैं, "क्राइम कंट्रोल करने का इंडियन पुलिस का अप्रोच फायर ब्रिगेड जैसा होता है. जैसे फायर ब्रिगेड आग लगने के बाद भागदौड़ करती है, लेकिन आग न लगे, इसके बारे में नहीं सोचती है. उसी तरह भारत की पुलिस ऐसे फसाद न हों और उन्हें रोकने के लिए क्या करना चाहिए, इस बारे में नहीं सोचती."

भिवंडी में सुरेश की कम्युनिटी पुलिसिंग की पहल का बेहद सकारात्मक असर हुआ था.

इस पहल के बारे में सुरेश बताते हैं, "जब मैं भिवंडी में था, तो बाबरी विध्वंस के बाद सारी जगह फसाद हो गए, लेकिन भिवंडी शांत रहा. हमने वहां मोहल्ला कमेटी या जिसे भिवंडी एक्सपेरिमेंट कहा जाता है, वो हमने लागू किया. वहां फसाद नहीं हुआ, क्योंकि हमने फसाद रोकने के लिए कम्युनिटी पुलिस या क्राइम कंट्रोल करने के तरीके शुरू किए थे."

नेताओं और सियासत को लेकर सुरेश कहते हैं, "वैसे तो सरकार के निर्देश हैं, लेकिन अभी सरकार बदलने के बाद तो दोनों कम्युनिटीज़ के बीच ज़्यादा से ज़्यादा विवाद बढ़ाने का काम हुआ है."

दिल्ली की सूरत.
इमेज कैप्शन, दिल्ली की सूरत.

'आईपीएस का नज़रिया बदल जाए, तो काम बन जाए'

तो इन हालात में पुलिस दंगे कैसे रोक सकती है? इस पर सुरेश कहते हैं, "पुलिस की ट्रेनिंग में कुछ कमियां हैं, इसलिए कंट्रोल करने का तरीका भी अलग ढंग का होता है. जब हम न्यूज़ पढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है कि पुलिस और अलग ढंग से काम करे, तो दंगा नियंत्रित करना आसान होता है. दिल्ली को देखकर लग रहा है कि ऐसा नहीं किया गया होगा."

नज़रिए की बात करते हुए सुरेश कहते हैं, "पुलिस की आईपीएस लीडरशिप का माइनॉरिटी को देखना का तरीका बदल गया, तो बहुत सारी बातें बदल जाएंगी. दंगा नियंत्रित करने में उनका ही रोल बहुत महत्वपूर्ण होता है. मैं तो कहता हूं कि दिल्ली के जो आईपीएस लीडर्स हैं, उन्हें दिल्ली में मोहल्ला कमेटी या भिवंडी जैसे एक्सपेरिमेंट शुरू करने चाहिए. उम्मीद है इससे अभी दंगे कम होंगे और आगे चलकर भी दंगे नियंत्रित करना आसान हो जाएगा."

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