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भारत बंदः ट्रेड यूनियन क्यों कर रहे हैं आज हड़ताल?
केंद्र सरकार की 'श्रमिक विरोधी नीतियों' के खिलाफ़ बुधवार को मजदूर यूनियनों ने देशव्यापी बंद का ऐलान किया है. दावा है कि हड़ताल में करीब 25 करोड़ लोग हिस्सा लेंगे.
मजदूर यूनियनों का आरोप है कि सरकार श्रम कानून में बदलाव करके उनके अधिकारों का हनन कर रही है और लेबर कोड के नाम पर मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह ख़त्म किया जा रहा है.
ट्रेड यूनियनों की प्रमुख मांगों में बेरोजगारी, न्यूनतम मजदूरी तय करना और सामाजिक सुरक्षा तय करना शामिल हैं. यूनियन सभी श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी 21 हज़ार रुपये प्रति महीने तय करने की मांग कर रही हैं. ट्रेड यूनियन नए इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड बिल को 'मालिकों के पक्ष में और मजदूरों के ख़िलाफ़' बता रहे हैं.
बीबीसी संवाददाता मानसी दाश से बातचीत में भारतीय ट्रेड यूनियनों की फ़ेडरेशन सीटू के महासचिव तपन सेन ने कहा, ''हमारी 12 सूत्रीय मांगें हैं. मुख्य मांगों में कम से कम मजदूरी 21 हज़ार रुपये प्रतिमाह करना. समान काम के लिए समान वेतन, ख़ासकर ठेका मज़दूरों को जो एक ही काम में हैं लेकिन रेगुलर कामगारों को आधे से कम वेतन मिलता है और कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती.
उन्होंने कहा कि महंगाई को कंट्रोल किया जाए और जरूरी चीज़ों की बढ़ती कीमतों पर सरकार को रोक लगानी चाहिए. ये हड़ताल रेलवे, पेट्रोलियम, डिफेंस, इंश्योरेंस सेक्टर के निजीकरण के ख़िलाफ़ भी हैं.
तपन सेन कहते हैं, ''लेबर कोड के नाम पर जो श्रम कानून पर बदलाव लाए जा रहे हैं ये प्रैक्टिकली मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह ख़त्म करने का काम हो रहा है. 44 कानूनों को एक साथ मिलाने के नाम पर मजदूरों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के मुद्दों से भटकाया जा रहा है. इसके ख़िलाफ़ हम सड़क पर उतर रहे हैं.''
केंद्रीय मंत्री से मिलकर रखी गई थी मांगें
ट्रेड यूनियनों ने बीते गुरुवार को केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार से मुलाकात की थी. ट्रेड यूनियनों के मुताबिक केंद्रीय मंत्री गंगवार ने यूनियन प्रतिनिधियों को बताया था कि सरकार श्रमिकों की भलाई के लिए सभी कदम उठा रही है और लेबर कोड से जुड़ा क़ानून भी इसका हिस्सा है.
लेकिन, इसके बाद 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने एक संयुक्त बयान जारी बताया था कि गंगवार ने उनकी '14 सूत्रीय मांगों में से किसी के समाधान का भरोसा नहीं दिया.'
मजदूर यूनियन नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को लागू ना करने की भी मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि ये ऐसा कानून है जो देश को बांट रहा है इससे मज़दूरों के हित भी प्रभावित होते हैं.
तपन सेन ने कहा, ''इन सब मुद्दों को लेकर जब हम लड़ रहे हैं तो समाज को बांटने के लिए ये आपराधिक साजिश रची रही है. सरकार अलग-अलग तरह से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर लाकर भी वो देश को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. अगर हम सबको एकजुट नहीं रख पाएंगे तो विरोध कैसे करेंगे. इसलिए हम इन कानूनों का भी विरोध कर रहे हैं.''
कितना असर होगा?
तपन सेन का मानना है कि इस बंद को सफल बनाने में करीब 25 करोड़ से अधिक मज़दूर शामिल होंगे.
वो कहते हैं, ''हम उम्मीद कर रहे हैं कि ये सफल हो. मजदूरों के अलावा किसानों ने भी शामिल होने का ऐलान किया है. वो गांवों से शहरों तक बंद को सफल बनाएंगे. हम रास्ते रोकेंगे, रेल रोकेंगे. मजदूर इसमें भागीदारी करेंगे.''
भारतीय मजदूर संघ क्यों शामिल नहीं?
उधर, भारतीय मजदूर संघ (BMS) का कहना है कि यह एक राजनीतिक हड़ताल है इसलिए उसने ख़ुद को इससे अलग रखा है. संघ के अखिल भारतीय महासचिव बृजेश उपाध्याय का कहना है कि विपक्षी दलों ने बंद का आह्वान किया है जिससे मज़दूरों का कोई लेना-देना नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''ये उनका अपना निर्णय है. ये मजदूरों का आह्वान नहीं है. ये राजनीतिक दलों ने बुलाया है. राजनीतिक दलों से जुड़े यूनियन अपनी पार्टी लाइन के आधार पर इसमें शामिल हो रहे हैं. बीएमएस इस फ़ैसले से सहमत नहीं है इसलिए इसमें हिस्सा नहीं ले रहा.''
उनका कहना है कि श्रम कानून में किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ. सरकार ने 44 किताब की चार किताब बनी है. नया कुछ नहीं आया उसमें. जो पहले लिखा था वही अब भी लिखा है उसमें.''
हालांकि वो कहते हैं कि भारतीय मजदूर संघ भी ठेकेदारी प्रणाली और निजीकरण के ख़िलाफ़ हैं. लेकिन वो इस कानून की वजह से नहीं है, पहले से चला आ रहा है. इसके ख़िलाफ़ संघ ने तीन जनवरी को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन किया है.
बृजेश उपाध्याय कहते हैं, ''बुधवार को होने वाले बंद का जो एजेंडा है उससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है. नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी, अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दे भी इसमें शामिल हैं, जिनका मजदूरों से कोई मतलब नहीं है. इसलिए हम इसमें शामिल नहीं हो रहे. यह पूरी तरह राजनीतिक पार्टियों के आह्वान पर हो रहा है. रेलवे के निजीकरण से लेकर एफडीआई तक के ख़िलाफ़ हम पहले ही विरोध कर चुके हैं.''
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