शिव सेना और कांग्रेस का साथ आना बदल सकता है देश की राजनीति: नज़रिया

    • Author, सुहास पलशीकर
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
  • प्रकाशित

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे 24 अक्तूबर को आ गए थे. तबसे क़रीब एक महीना हो गया है मगर अभी तक कोई भी दल या गठबंधन सरकार नहीं बना पाया है.

इस कारण राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा है. अब यह स्पष्ट नहीं है कि राज्यपाल नई सरकार बनाने के लिए सहमति देंगे या विधानसभा भंग करके फिर से चुनाव करवाने का रास्ता खोलेंगे.

इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने चर्चाओं की सुनामी सी ला दी है. इन चर्चाओं में जनादेश, नैतिकता, अस्थिरता और सिद्धांतहीन गठबंधन जैसे शब्दों का अक्सर ज़िक्र हो रहा है.

कुछ लोगों का कहना है कि फिर से चुनाव करवाने से ही कोई रास्ता निकल सकता है. जो लोग थोड़े सिद्धांतवादी मगर नरम (और सरल) हैं, उनका मानना है कि बीजेपी और शिवसेना को मिलकर सरकार बना लेनी चाहिए.

इस पूरी उथल-पुथल के बीच राजनीति के स्वभाव, राजनीतिक अवसरों और राजनीतिक बाध्यताओं पर विचार किए बिना ही बहस छेड़ दी जा रही है.

जनादेश का मतलब क्या है?

पहले तो हमें देखना होगा कि जनादेश की संकल्पना क्या है. अगर एक नेता या पार्टी किसी मुद्दे पर एक दृढ़ रुख़ के साथ जनता के बीच जाते हैं और अन्य कोई नेता या पार्टी इसके विपरीत रुख़ के साथ आगे आते हैं तो लोगों को उनमें एक को चुनना होता है.

जिसे लोग चुनते हैं, उसके बारे मे कहा जाता है कि उसे जनादेश मिला है. इस तरह का जनादेश बहुत कम चुनावों में मिलता है.

कुछ मामलों में नेता चुनाव में अकेले ही मोर्चा संभालता है और लोगों से अपने लिए वोट मांगता है (इस तरह से कि उसमें और अन्य उम्मीदवारों में भेद मिट जाए). वह दावा करता है कि वह देश को नई दिशा में ले जा रहा है. इस तरह की स्थिति में यह नेता और उसकी पार्टी अगर चुनावों में जीत जाते हैं तो इसे भी जनादेश कहा जा सकता है.

लेकिन दोनों ही तरह की परिस्तिथियां हर चुनावों में पैदा नहीं होतीं. लोग संपूर्ण जनादेश नहीं देते. वे अपने सामने उपलब्ध विकल्पों में किसी एक उम्मीदवार को पसंद करते हैं. जिन लोगों को जनता की वरीयता मिलती है, उम्मीद की जाती है कि वे एक निश्चित समय के लिए सरकार चलाएंगे. संक्षेप में, चुनाव यह तय करते हैं कि सरकार किसे चलानी है.

पिछले महीने महाराष्ट्र में संपन्न हुए चुनाव इसी तरह के थे. चार प्रमुख पार्टियों में से किसी को भी यक़ीन नहीं था कि वे अपने दम पर बहुमत ला सकेंगी. इसलिए वे दो अलग-अलग गठबंधन बनाकर चुनाव में उतरीं. ऐसे में अब यह हाहाकार मचाने का कोई मतलब नहीं है कि जनता ने किसी एक पार्टी या गठबंधन को जनादेश दिया है और वे उस जनादेश का सम्मान नहीं कर रही.

हमें इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि चुनाव से पहले हुए इन गठबंधनों में से एक टूट चुका है और अब एक नया राजनीतिक ढांचा उभरने की संभावनाएं नज़र आने लगी हैं. इन हालात में फिर से चुनाव करवाने पर ज़ोर देना अवास्तविक, ग़ैरज़रूरी और अविवेकपूर्ण है.

तो चुनाव के नतीजों के क्या मायने हैं?

शुरू से ही यह काफ़ी साफ़ था कि बीजेपी-शिवसेना गठबंधन चुनाव जीत लेंगे और मतदाताओं का झुकाव भी काफ़ी हद तक स्पष्ट था. तो फिर चुनाव से पहले बना गठबंधन टूटने का क्या मतलब है?

ऐसा सोचने का कोई मतलब नहीं है कि गठबंधन का इस तरह से टूटना नैतिकता का पतन है. अगर सबसे ज़्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी बहुमत पर पहुंचने के लिए और सहयोगी ढूंढ लेती तो उसने सरकार बनाने का दावा कर दिया होता.

इस मामले में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी थी और वह ऐसा नहीं कर सकी. इसलिए, अब बाक़ी पार्टियां आपस में कुछ समझौते करके सरकार बनाने की संभावनाएं तलाश रही हैं.

यह सही है कि नतीजों का मतलब यह नहीं है कि बीजेपी की हार हुई है. मगर चुनाव के नतीजे आने के बाद पैदा हुए संकट के कारण उसने सत्ता तो गंवा ही दी है. दूसरी तरफ़, शिव सेना को भी इससे बहुत फ़ायदा नहीं हुआ है. फिर भी, वह दुस्साहसी योजनाओं पर आगे बढ़ी है.

इसके साथ ही राज्य से पुराने सत्ता समीकरणों से शिव सेना के अलग होने का समय भी क़रीब आ गया है. हालांकि, इसका उसे आने वाले समय में कब तक और कितना फ़ायदा मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है.

शिव सेना पिछले पांच सालों से बीजेपी के साथ जाकर एक हारा हुआ गेम खेल रही थी. मगर अब यह खेल रुक गया है.

उधर, कांग्रेस और एनसीपी चुनाव से पहले काफ़ी परेशान थीं मगर नतीजे आने के बाद बने घटनाक्रम के बाद राज्य में उनका महत्व बढ़ गया है. कांग्रेस को उम्मीद है कि ज़्यादा प्रयास किए बग़ैर ही वह उबर सकेगी लेकिन निष्क्रिय रहकर वो ख़ुद ही अपनी इन उम्मीदों पर पानी भी फेर सकती है.

दरअसल, इस तरह के कड़े मुक़ाबले वाली परिस्थिति में नई और छोटी पार्टियों को आगे आना चाहिए था. लेकिन तमिलनाडु की तरह, महाराष्ट्र में भी छोटी पार्टियां, जैसे कि एमएनएस और वंचित बहुजन अघाडी, प्रभाव छोड़ने में असफल रही हैं.

यही कारण है कि महाराष्ट्र की राजनीति चार मुख्य पार्टियों के इर्द-गिर्द ही घूमती नज़र आती है और सरकार बनाने व राज्य में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को नई दिशा देने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर है.

इसलिए, बड़ी राष्ट्रीय स्तर की रणनीतियों पर ध्यान देने के बजाय यह आवश्यक है कि महाराष्ट्र की राजनीतिक बाध्यताओं पर विचार किया जाए.

राज्य की चार पार्टियों में से किसी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है इसलिए गठबंधन के बिना सरकार नहीं बनाई जा सकती.

अगर राजनीतिक संकट नहीं सुलझता है तो फिर से चुनाव होंगे. मगर अभी असल सवाल ये है कि क्या पार्टियां चुनाव से पहले हुए गठबंधनों को तोड़ने के बाद सरकार बनाने के लिए नए गठबंधन बना पाती हैं या नहीं.

लचीले गठबंधनों का इतिहास

दरअसल, अलग विचारधाराओं की पार्टियों का सीमित लक्ष्यों को लेकर साथ मिलकर सरकार बनाना पूरे देश में देखने को मिलता रहा है.

पश्चिम बंगाल से लेकर केरल तक में ऐसा देखने को मिला है. जब अटल बिहारी वाजपेयी ने एनडीए की सरकार चलाई थी, शिव सेना के अलावा गठबंधन की और किसी भी पार्टी ने बीजेपी के आधारभूत एजेंडे का समर्थन नहीं किया था. बावजूद इसके, गठबंधन बना था और सरकार भी चली थी.

संक्षेप में, हमने ऐसे गठबंधन देखे हैं जो कुछ बातों को लेकर हुए समझौतों के आधार पर बने थे. इन गठबंधनों ने दिखाया कि कैसे राजनीतिक सुविधा के लिए साथ आया जा सकता है. इससे राजनीतिक परिपक्वता भी देखने को मिली.

महाराष्ट्र के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक डायमेंशन ऐसा है जो राज्य की सीमाओं से भी परे है. अहम सवाल ये है कि क्या कांग्रेस को उस शिव सेना के साथ गठबंधन सरकार बनानी चाहिए जो अब तक हिंदुत्व के एजेंडे को समर्थन देती रही है?

राज्य के घटनाक्रम से एक और अहम सवाल उठा है- पहले जब देश में कांग्रेस का प्रभाव था, तब भारत की राजनीति में कांग्रेस-विरोधी ट्रेंड देखने को मिला था. तो क्या अब बीजेपी से लड़ने के लिए बीजेपी-विरोधी भावना का समर्थन करने का समय आ गया है?

बीजेपी-विरोधवाद

पिछले दो लोकसभा चुनावों के नतीजों से काफ़ी स्पष्ट है कि कांग्रेस अकेली बीजेपी से नहीं लड़ सकती है. इसलिए स्वाभाविक निष्कर्ष है कि कांग्रेस को गठबंधन बनाना होगा. मगर सवाल यह है कि क्या इस तरह के गठबंधन किसी भी बीजेपी विरोधी के साथ बना लेने चाहिए या फिर उन्हीं के साथ हाथ मिलना चाहिए जिनकी विचारधारा कांग्रेस से मेल खाती हो?

बीजेपी का विरोध करने वाली सभी पार्टियों में विचारधारा के आधार पर आपस में साम्य हो, यह संभव नहीं है. इसलिए, कांग्रेस के सामने जटिल चुनौती है. कुछ राज्यों को छोड़ दें तो बाक़ी में कांग्रेस अकेली बीजेपी से नहीं लड़ सकती. लेकिन बीजेपी से लड़े बिना उसकी राजनीति भी आगे नहीं बढ़ सकती. इसलिए, कांग्रेस को अस्थायी रणनीतियां बनानी होंगी और क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाकर कुछ जोखिम तो उठाना होगा.

इसके लिए कांग्रेस को बीजेपी को अपना मॉडल मानना होगा! जब बीजेपी 90 के दशक में गठबंधन की राजनीति में आई थी तब ज़्यादा पार्टियां उसकी नीतियों से सहमत नहीं थी. बीजेपी भी कुछ पार्टियों की आर्थिक-सामाजिक नीतियों को पसंद नहीं करती थी.

फिर भी, अपनी वृहद रणनीति के तहत बीजेपी ने समझौते किए. उसने दो तरीक़े अपनाए. एक- जिन जगहों पर पार्टी ज़्यादा मज़बूत नहीं है, वहां उसने स्थानीय पार्टी के सहारे वहां के विरोधी दलों से मुक़ाबला किया. दूसरा- बीजेपी ने मुद्दों पर आधारित समर्थन और ऐसे कार्यक्रमों की तलाश की जिनकी मदद से वह कुछ राज्यों में लोकप्रिय हो सके.

महाराष्ट्र में चुनौती क्या है

फ़िलहाल, कांग्रेस का शिव सेना के साथ जाने से पहले दो बार सोचना स्वाभाविक है. लेकिन कांग्रेस अगर बीजेपी विरोधी रुख़ को नज़रअंदाज़ कर कोई फ़ैसला लेना चाहती है तो उसे तीन बिंदुओं पर सोचना होगा. ये तीन बिंदु हैं- गठबंधन, बीजेपी और पार्टी की व्यापक पहुंच वाली नीतियां.

नरसिम्हा राव द्वारा किए गए पंचमढ़ी समझौते के दिनों से ही कांग्रेस गठबंधनों को लेकर डांवाडोल सी रही है. लेकिन पिछले दो चुनावों में मिली हार के बाद उसे अपना रुख़ बदलना होगा.

अगर कांग्रेस को लगता है कि अभी बीजेपी से निपटना ही उसकी मुख्य प्राथमिकता है तो उसे उसे दिल्ली में बैठे विशुद्ध बुद्धिजीवी सलाहकारों से परे सोचना होगा और देखना होगा कि तुरंत किन राजनीतिक रणनीतियों को अपनाने की ज़रूरत है. साथ ही उसे ख़ुद को याद दिलाना होगा कि वह आख़िर किन कारणों से बीजेपी का विरोध करती है.

इस मामले में, शिव सेना के साथ हाथ मिलाने की संभावना कांग्रेस के लिए लंबे समय तक चलने वाले युद्ध का एक चरण मात्र है. अगर वह सिर्फ़ महाराष्ट्र में सत्ता में आने के लिए या फिर बीजेपी को शर्मिंदा करने के लिए गठबंधन में आती है तो इसका उसे बहुत कम फ़ायदा होगा.

और अगर यह तथाकतिथ सैद्धांतिक आधार पर फ़ैसला लेकर विपक्ष में बैठने का फ़ैसला लेती है तो यह तुरंत ही गुमनामी में डूब जाएगी.

शिवसेना की संभावनाएं

जो बात कांग्रेस पर लागू होती है, वही बीजेपी का विरोध करने वाली अन्य पार्टियों के लिए भी है. आज के संदर्भ में शिव सेना आत्मसम्मान के मुद्दे और मुख्यमंत्री की कुर्सी पाकर संतुष्ट हो सकती है.

लेकिन ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू के बीजेपी से अलग होने के कारणों को देखते हुए शिव सेना को भी आने वाले 10-20 सालों के संभावित घटनाक्रम के बारे में सोचना होगा और समझना होगा कि बीजेपी से वह कैसे अलग है.

मोदी और शाह हिंदू राष्ट्रवाद के एजेंडे को बेच रहे हैं. इसलिए शिव सेना को फ़ैसला करना होगा कि क्या वह भी इसी एजेंडे को सस्ते दाम और ऊंची आवाज़ में बेचते हुए बीजेपी के मराठी संस्करण के तौर पर राजनीति चलाएगी; ख़ुद को हिंदू हृदयसम्राट का वारिस कहलाने में ही गर्व लेती रहेगी या फिर अपनी शैली बदलकर मुक़ाबले में बनी रहने की कोशिश करेगी.

यह राजनीतिक चयन का सवाल है.

ज़रूरी राजनीतिक चयन करके अचानक मिलने वाले मौक़ों का लाभ उठाना सफल राजनीति का संकेत है. अगर ऐसा करना है तो राजनीतिक फ़ैसले करने होंगे.

कांग्रेस और शिव सेना इस तरह के राजनीतिक फ़ैसले लेने की इच्छाशक्ति दिखाएंगे या नहीं और उनका राजनीतिक चयन क्या होगा, इसी से निकट भविष्य में महाराष्ट्र की क़िस्मत का फ़ैसला होगा. इससे भारत की राजनीति में एक बड़ा और निर्णायक मोड़ भी आ सकता है.

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