इरफ़ान ख़ान में निर्देशक बनने की तड़प थी, ...अफ़सोस कि वो दिन नहीं आ पाया

    • Author, अजय ब्रह्मात्मज
    • पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

एकबारगी जैसे आपके सामने कोई अल्बम पलटता है, किसी भी अच्छे इवेंट का, वैसे इरफ़ान का पूरा अल्बम पन्ना दर पन्ना मेरे सामने पलटता चला गया. इरफ़ान के साथ बिताए अनगिनत लम्हों की यादें झरने लगीं.

मेरे प्रति उनके मन में जो आदर और प्यार था, जिस तरह से वो ख़याल रखते थे, हमेशा समय-समय पर जब भी कोई दिक़्क़त होती थी, उनका हाथ हमेशा आगे बढ़ता था. उनका अनुभव हमेशा मेरे काम आता रहा है.

बहुत सी बातें थीं जो उनसे करनी थीं. लेकिन जब से वो बीमार हुए थे, मैंने उन्हें कॉल करना छोड़ दिया था. मैं सिर्फ़ उनसे मैसेज पर ही बात किया करता था. हम वॉइस नोट में बात करते थे, ताकि एक दूसरे की भावनाओं को समझ सकें.

बहुत कम लोगों को शायद ये मालूम हो कि इरफ़ान में निर्देशक बनने की तड़प थी. उनके पास एक सोच-समझ थी, वो फ़िल्मों को अपने हिसाब से बनाना चाहते थे. हमें उस दिन का इंतेज़ार था जब वो लाइट्स-कैमरा बोलते, लेकिन अफ़सोस वो दिन नहीं आ पाया.

इरफ़ान ने अपने पीछे फ़िल्मों की एक लंबी विरासत छोड़ी है. विशेष पहचान पाई लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें अभी वो ऊँचाई मिली नहीं थी, वो उसकी तलाश में थे. वो अपनी एक शैली विकसित कर रहे थे और काफ़ी कुछ हासिल भी कर लिया था उन्होंने.

मुझे उनसे एक बातचीत याद आती है, उन्होंने कहा था, "मैं वह अभिनय शैली हासिल कर लेना चाहता हूँ जब मुझे ये बिलकुल अहसास न हो कि मैं एक्ट कर रहा हूं. अभी मैं उस स्वाभाविकता को हासिल नहीं कर पा रहा हूं. लेकिन मेरी कोशिश है कि वह स्वभाविकता आए."

संवाद बोलने में उनके समकालीन या उनके पहले के लोगों से बिलकुल भिन्न उनकी शैली है. वो शैली इतनी आत्मीय, इतनी अलग है कि कभी लगता है कोई कानाफूसी कर रहा हो और कभी लगता है कोई कानों में मीठे शब्द घोल रहा है. उनका ये अंदाज़ सिर्फ़ फ़िल्म में नहीं था, व्यक्तिगत जीवन में भी वो ऐसे ही बात करते थे.

इरफ़ान का जादू

कई बार अपनी मुस्कान से चुटकी लेकर निकल जाते थे, उस मुस्कान में एक कटीलापन और एक कुटिलता दोनों एक साथ थीं, आप किस भाव को ग्रहण कर रहे हैं और वो क्या ज़ाहिर कर रहे हैं अगर उसमें मेल बैठ जाए तो आप उनसे बातचीत का पूरा मज़ा ले सकते थे.

कई बार ये लग सकता था कि आदमी बहुत अहमवादी है, अहंकारी है, और बहुत सारी चीज़ों को, जिन्हें लोग उपलब्धियाँ कहते हैं, उन्हें वह तुच्छ समझता है.

नेमसेक, पान सिंह तोमर, लंच बॉक्स, दिल कबड्डी, शुरू के दिनों में एक डॉक्टर की मौत, दृष्टि जैसी फ़िल्मों से उन्होंने अलग ही छाप छोड़ी. वॉरियर फ़िल्म को वो ख़ुद अपनी ज़िंदगी का बहुत बड़ा मोड़ मानते थे.

अगर हम रेट्रो तैयार करें तो हमारे पास कम से कम दर्जनों फ़िल्में हैं उनकी जो मिल जाएगी. 53-54 साल की उम्र में गुज़रे किसी भी कलाकार की ये बहुत बड़ी पूंजी है. ये कलात्मक पूंजी है जो वो छोड़ गए हैं.

बहुत से कलाकार बहुत पैसा कमाते हैं लेकिन कोई असेट नहीं छोड़ते हैं. क्योंकि उनकी फ़िल्में उस समय चर्चित होती हैं और बाद में भुला दी जाती हैं. लेकिन इरफ़ान के साथ ऐसा नहीं है. इरफ़ान की फ़िल्में बार बार देखी जाती रहेंगी.

उनके समकालीन, उनके साथ काम करने वाले कलाकारों को मैंने उन्हें इरफ़ान सर कहते सुना था. अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार ने जब उनके साथ काम किया तो उनसे कहा- कैसे कर लेते हैं आप?

विश्व प्रसिद्ध अभिनेता भी ये नहीं समझ पा रहा है कि वो कैसे कर लेते हैं. इसे 'कैसे कर लेते हैं' में ही इरफ़ान का पूरा जादू था.

इरफ़ान की ख़ासियत

मैं इरफ़ान को उस दौर से जानता हूँ जब वो दृष्टि या चाणक्य जैसी फ़िल्में कर रहे थे. उनकी इंटेंसिटी और अभिनय की समझ में निश्चित रूप से आगे चलकर परिपक्वता आई, लेकिन जो ऑर्गेनिक खूबियाँ थीं उनके अंदर, वो शुरू से मौजूद थीं. जो समय-समय पर अच्छी फ़िल्में या अच्छा माहौल मिलने से, जैसे पीकू में उन्हें अच्छा माहौल मिला. जो विदेशी फ़िल्में या सीरीज़ उन्होंने की, उन्हें खोज-खोजकर देखा जाए तो वहाँ इरफ़ान की ख़ासियत दिखाई देती है.

हम स्टार स्ट्रक दर्शक हैं, हम फ़िल्मों में नायक या बड़ी भूमिका देखते हैं और उन्हीं के हिसाब से चीज़ों को आँकते हैं. लेकिन इरफ़ान अपने वजूद के साथ, अपने अभिनय के साथ उन फ़िल्मों में भी मौजूद रहे हैं जो घोर कमिर्शयल फ़िल्में थीं. जैसे 'रोग' या 'गुनाह' फ़िल्म, जिन फ़िल्मों की चर्चा नहीं की जाती है, वहाँ भी इरफ़ान अपनी मेधा के साथ मौजूद हैं.

इरफ़ान के मन में सवाल बहुत होते थे. बहुत प्रसिद्ध क़िस्सा है, जब वो सीआईडी टीवी शो कर रहे थे. जब उनसे कहा गया कि आपको बीस क़दम आगे जाकर इस किरदार से बात करनी है, तो उनका सवाल था कि मुझे बीस क़दम ही क्यों जाना है, मैं पाँच क़दम भी जा सकता हूँ या नहीं भी जा सकता हूं. निर्देशक के पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था, लेकिन जब दृश्य के लेखक ने उन्हें समझाया तो फिर उन्होंने अभिनय किया.

इस स्वभाव की वजह से शुरू में उन्हें काम मिलने में दिक़्क़तें हुईं. वैसे भी एनएसडी के लोग बदनाम हैं कि वो सवाल बहुत करते हैं, और करेक्टर की बैकस्टोरी तैयार करते हैं, जबकि हिंदी फ़िल्मों में कैरेक्टर की ना बैकस्टोरी होती है और न ही फ़ॉरवर्ड स्टोरी होती है. जो होता है बस स्क्रीन पर होता है, न लेखक सोचता है न अभिनेता. लेकिन इरफ़ान कैरेक्टर की बैक स्टोरी तैयार करते थे.

शुरुआत में छोटी फ़िल्मों में उन्हें इसकी वजह से दिक़्क़तें आईं, लेकिन अपनी पहचान पाने के लिए, अपनी जगह बनाने के लिए वो लगातार हर तरह के काम करते रहे. उन दिक़्क़तों की सच्चाई को समझते हुए, बग़ैर उनमें संलिप्त हुए, एक ज़रूरी व्यवधान की तरह उनका सामना करते रहे.

सबसे ख़ास पहचान

अब जब इरफ़ान चले गए हैं तो बहुत से लोगों के मन में सवाल उठ रहा होगा कि इसकी भरपाई कौन करेगा? लेकिन मेरा मानना है कि कोई किसी की भरपाई नहीं कर पाता है, वो एक वैक्यूम छोड़ गए हैं. उस तरीक़े का, उस संजीदगी के साथ काम करने वाला दूसरा कलाकार नहीं आ पाता है.

इरफ़ान को स्वयं मोतीलाल बहुत पसंद थे, लेकिन हम देखते हैं कि मोतीलाल के बाद कोई उनके क़रीब पहुँचता दिखाई देता है तो वो इरफ़ान ही हैं. हो सकता है चालीस साल के बाद कोई अभिनेता आए जो इरफ़ान की कड़ी को आगे बढ़ाए, जैसे इरफ़ान ने मोतीलाल की कड़ी को आगे बढ़ाया, लेकिन समकालीन अभिनेताओं में कोई ऐसा नहीं दिखता जो इरफ़ान के आसपास भी टिकता हो.

बीमार होने के बाद भी इरफ़ान की कई फ़िल्मों को लेकर प्लानिंग थी. उनकी पत्नी सुतपा कुछ फ़िल्मों पर काम कर रहीं थीं, उनकी लेखिका दोस्त शैलजा और उनके साथ कई फ़िल्मों पर काम करने वाले रितेश शाह भी तैयारी कर रहे थे.

मदारी वो फ़िल्म थी जिसमें इरफ़ान बहुत ज़्यादा इंवाल्व रहे थे. वो मदारी जैसी फ़िल्में करना चाहते थे, लेकिन मदारी से जो उन्हें झटका लगा था, वो कहीं ना कहीं ये सोच रहे थे कि दर्शकों के साथ मैं संगति नहीं बिठा पा रहा हूँ, लेकिन मैं हारूँगा नहीं. ऐसे विषयों पर फ़िल्में बनाने की वो तैयारियाँ कर रहे थे. उनकी वो सारी तैयारियाँ अब अधूरी छूट गई हैं.

इरफ़ान को मैं एनएसडी के दिनों से जानता हूं. वो ही मुझे फ़िल्म पत्रकारिता की ओर लाए थे. लेकिन उनके बीमार होने के बाद मैं उनसे मिलने की हिम्मत नहीं जुटा सका. सिर्फ़ मैसेज में या वाइस नोट में ही उनसे बातें होती रहीं.

एनएसडी और थिएटर से आने वाले नए कलाकार, इरफ़ान से ये ज़रूर सीखें कि फ़िल्मी दुनिया में देर भले होती है, लेकिन क़द्र होती है. इरफ़ान ने तीस साल इंडस्ट्री में काम किया और अंतिम सालों में बड़ी पहचान हासिल की. उन्होंने अपनी निजी शैली को बनाए रखा, बचाए रखा, तमाम तरह के दबाव और प्रभाव आए लेकिन इरफ़ान ने अपनी प्रतिभा की अक्षुण्णता बनाए रखी. यही उनकी सबसे ख़ास पहचान थी.

(बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा से बातचीत पर आधारित)

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