पीएम मोदी और शी जिनपिंग के बीच क्या एससीओ बैठक में होगी मुलाक़ात?

साल 2025 में एससीओ के राष्ट्राध्यक्षों की काउंसिल की 25वीं बैठक में शी जिनपिंग और पीएम मोदी की मुलाक़ात की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच साल 2025 में एससीओ के राष्ट्राध्यक्षों की काउंसिल की 25वीं बैठक में मुलाक़ात हुई थी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 29 अगस्त से 1 सितंबर 2026 तक उज़्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के दौरे पर हैं. वो शनिवार सुबह दिल्ली से उज़्बेकिस्तान के लिए रवाना हुए हैं.

प्रधानमंत्री मोदी 29 से 30 अगस्त को उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में रहेंगे. इसके बाद वह किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक जाएंगे, जहां वह 26वें एससीओ शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. यहां चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाक़ात हो सकती है.

पिछले साल पीएम मोदी ने सात साल में पहली बार चीन का दौरा किया था, लेकिन दोनों देशों के संबंधों में धीरे-धीरे ही सुधार हुआ है. हाल में सीमा से जुड़े एक विवाद के बाद दोनों पक्षों के बीच तीख़ी राजनयिक बयानबाज़ी भी हुई थी.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट का मानना है कि दोनों देशों के बीच संबंध सुधर रहे हैं और आपसी आदान प्रदान का सिलसिला इसी बात का संकेत है.

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने बताया है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 30 अगस्त से 3 सितंबर तक बिश्केक में एससीओ के शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे और किर्गिस्तान और मिस्र की राजकीय यात्राएं करेंगे.

यह सम्मेलन एससीओ के 25 साल पूरे होने के मौके पर हो रहा है. भारत साल 2017 से एससीओ का सक्रिय सदस्य रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी ने रवाना होने से पहले एक्स पर लिखा, "अगले कुछ दिनों में उज़्बेकिस्तान और किर्गिज़ गणराज्य की यात्रा पर रहेंगे. कार्यक्रमों में शामिल हैं- ताशकंद में राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के साथ द्विपक्षीय बातचीत, जिसका उद्देश्य भारत और उज्बेकिस्तान के बीच दोस्ती को और मजबूत करना है."

उनके कार्यक्रम में ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ ओरिएंटल स्टडीज में शास्त्री स्मारक और महात्मा गांधी केंद्र का दौरा भी शामिल है.

क्या पीएमी मोदी और राष्ट्रपति शी की मुलाक़ात होगी

मोदी

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इमेज कैप्शन, अक्सर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दा होता है (फ़ाइल फ़ोटो)
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अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कहा जा रहा है कि एक बार फिर चीन, भारत और रूस के नेता एक मंच पर साथ दिखेंगे.

पिछले साल सितंबर में चीन के तियानजिन में हुए एससीओ सम्मेलन में तीनों नेताओं की गर्मजोशी भरी मुलाक़ात काफ़ी चर्चित रही थी.

उस समय कहा गया कि शी जिनपिंग और पीएम मोदी ऐसे समय पर मिले, जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ वॉर और एकतरफ़ा फ़ैसलों का सामना कर रहे थे.

इस मुलाक़ात को रिश्तों को संतुलित करने की सतर्क कोशिश के रूप में देखा गया.

अब फिर से एससीओ की बैठक है और दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय मुलाक़ात की अटकलें लगाई जा रही हैं.

भारत और चीन दुनिया के दो बड़े देश हैं और दोनों पड़ोसी भी हैं. ख़ास बात यह है कि चीन के साथ जहां भारत के बड़े कारोबारी संबंध हैं, वहीं सीमा विवाद की वजह से अक्सर यह संबंध सुर्खियों में होता है.

ऐसे में दोनों ही देशों के राष्ट्राध्यक्षों का एक मंच पर होना काफ़ी अहम माना जा रहा है. हालांकि इस दौरान दोनों नेताओं की आपसी मुलाक़ात के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है.

लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि भारत में हो रहे ब्रिक्स के अगले सम्मेलन से पहले दोनों नेताओं के बीच अलग से मुलाक़ात की प्रबल संभावना है.

साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के एसोसिएट प्रोफ़ेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं, "मुझे लगता है कि एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की अलग से मुलाक़ात होनी चाहिए. जिस तरह की ख़बरें हैं कि शी जिनपिंग अगले महीने भारत में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं, तो ऐसी मुलाक़ात की संभावना बढ़ जाती है."

उनका कहना है, "अभी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी चीन की यात्रा पर थे और उनकी यात्रा कुल मिलाकर अच्छी रही है. दोनों देशों के बीच ज़ाहिर तौर पर सीमा विवाद ही सबसे अहम है, लेकिन डोभाल की यात्रा के बाद राजनीतिक तौर पर दोनों ही देशों की ओर से कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं की गई है."

धनंजय त्रिपाठी के मुताबिक़, "दो बड़ी राजनीतिक हस्तियाँ एक साथ एससीओ बैठक में होंगी और मुझे कोई वजह नहीं दिखती है कि शी जिनपिंग और पीएम मोदी की मुलाक़ात वहां न हो."

भारत के लिए क्यों है अहम

पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद दुनियाभर में तेज़ी से बदलाव देखे गए हैं

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इमेज कैप्शन, पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद दुनियाभर में तेज़ी से बदलाव देखे गए हैं (फ़ाइल फ़ोटो)

मौजूदा जियोपॉलिटिकल हालात में दुनिया के कई देशों के रिश्ते नया आकार ले रहे हैं. यह स्थिति भारत और चीन के लिए भी समान रूप से काफ़ी अहम है.

ख़ासकर 28 फ़रवरी को इसराइल और अमेरिका ने जब ईरान पर हमले किए, उसके बाद से कई देशों के अंतराष्ट्रीय संबंध और कई पुराने राजनीतिक समीकरण बदलते हुए दिख रहे हैं.

इस दौरान जंग के असर समुद्री व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और ख़ास कर तेल और ग़ैसी की सप्लाई से लेकर उनकी कीमतों पर इसका असर देखा गया है.

वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ ने अंतरराष्ट्रीय कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया है.

ऐसे में चीन एक मज़बूत देश के तौर पर उभरा है. आर्थिक ताक़त से लेकर तकनीक और एआई जैसे क्षेत्र में चीन ने दुनियाभर में स्थिति काफ़ी मज़बूत बनाई है.

धनंजय त्रिपाठी कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में जो बदलाव हो रहे हैं उसमें भारत जैसे बड़े देश को अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए मल्टीएलाइनमेंट स्ट्रेटजी अपनानी पड़ेगी. उसमें चीन का जो उदय हुआ है, जिसे आज आप दरकिनार नहीं कर सकते."

उनका कहना है, "मौजूदा हालत में भारत को अमेरिका ही नहीं चीन से भी अपने संबंध ठीक करने होंगे और इसके लिए पीएम मोदी का बैठक में शामिल होना बड़े संकेत देता है. चीन के साथ हमारे कारोबारी संंबंध अच्छे हैं, लेकिन हमें राजनीतिक संबंध भी अच्छे करने होंगे."

शी जिनपिंग भारत आएंगे?

शी जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले महीने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने शी जिनपिंग भारत आएंगे

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ शामिल हो सकते हैं.

एजेंसी ने तीन सूत्रों के हवाले से जानकारी दी थी. अगर ऐसा होता है तो यह सात साल में उनकी पहली भारत यात्रा होगी और दोनों प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच संबंधों में सुधार का एक और संकेत माना जाएगा.

रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत 12 और 13 सितंबर को इस शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा है. इसमें शी की मौजूदगी पर ब्रिक्स के एजेंडे से ज़्यादा इस बात को लेकर नज़र रहेगी कि यह 2020 में सीमा पर हुई घातक झड़पों के बाद बीजिंग और नई दिल्ली के बीच संबंधों को स्थिर करने की कोशिशों के बारे में क्या संकेत देती है.

इस मामले की सीधी जानकारी रखने वाले एक भारतीय सूत्र ने रॉयटर्स को बताया, "चीनी अधिकारी होटल और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने में जुटे हैं."

दो अन्य भारतीय सूत्रों ने कहा कि शी के साथ क़रीब 400 अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल आने की संभावना है. 2019 में पिछली बार आए प्रतिनिधिमंडल में 200 से कम अधिकारी थे.

सूत्रों ने कहा कि दोनों देशों के अधिकारी शिखर सम्मेलन के दौरान लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मतभेदों को संभालते हुए आपसी संपर्क बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा कर सकते हैं.

शंघाई सहयोग संगठन क्यों है महत्वपूर्ण

राष्ट्रपति पुतिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ये तस्वीर जापान के ओसाका में हुए शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन की है, तस्वीर 28 जून 2019 की है

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इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति पुतिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ये तस्वीर जापान के ओसाका में हुए शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन की है, तस्वीर 28 जून 2019 की है

शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की स्थापना वर्ष 2001 में चीन, रूस और सोवियत संघ का हिस्सा रहे चार मध्य एशियाई देशों कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान ने मिलकर थी.

इसका उदय रूस, चीन और इन मध्य एशियाई देशों के बीच वर्ष 1996 में सीमा को लेकर हुए एक समझौते के साथ हुआ था. इसे 'शंघाई फ़ाइव' समझौता कहा गया.

चीन के सुझाव पर इस समझौते का विस्तार, क्षेत्र के देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए किया गया.

सदस्य देशों के बीच व्यापार और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए, संगठन की भूमिका भी बढ़ाने की बात की गई.

ये वो दौर था जब सोवियत संघ में टूट के नकारात्मक नतीजों और अव्यवस्थाओं के बारे में पूरी दुनिया में चिंता जताई जा रही थी.

भारत और पाकिस्तान साल 2017 में इस संगठन में शामिल हुए थे, जबकि ईरान साल 2023 में इसका सदस्य बना.

इस समय एससीओ देशों में पूरी दुनिया की क़रीब 40 फीसदी आबादी रहती है. दुनिया की जीडीपी में एससीओ देशों की 20 फ़ीसदी हिस्सेदारी है. दुनिया भर के तेल रिज़र्व का 20 फ़ीसदी हिस्सा इन्हीं देशों में है.

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