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रूस की एक लाइब्रेरी में पहुंचकर हमने क्या पाया?
- Author, स्टीव रोज़नबर्ग
- पदनाम, संपादक, बीबीसी रूसी सेवा
- प्रकाशित
अगर इवानोवो में लगे बिलबोर्ड्स पर भरोसा किया जाए तो रूस सच में आगे बढ़ रहा है. इस शहर में लगे बिलबोर्ड पर ये सब लिखा है:
''रिकॉर्ड फसल''
''इवानोवो क्षेत्र में हज़ार किलोमीटर से अधिक सड़कों की मरम्मत की गई.''
''अच्छे के लिए बदलाव!''
मॉस्को से चार घंटे की ड्राइव पर स्थित इस शहर में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण की तारीफ़ करने वाला एक बड़ा बैनर लगा हुआ है. ये बैनर एक पुराने सिनेमा की दीवार पर लगा हुआ है. बैनर पर सैनिकों की तस्वीर लिखी है और स्लोगन लिखा हुआ है:
''जीत के नाम!''
इन पोस्टरों में देश को आर्थिक और सैन्य सफलता की तरफ़ अग्रसर दिखाया गया है.
लेकिन इवानोवो में एक ऐसी जगह भी है जो आज के रूस की एक बहुत अलग तस्वीर पेश करती है.
जॉर्ज ऑरवेल लाइब्रेरी
मैं इस जगह के बाहर खड़ा हूं. यहां एक पोस्टर भी है. ये एक रूसी सैनिक का नहीं बल्कि एक ब्रिटिश उपन्यासकार की तस्वीर है. जॉर्ज ऑरवेल का चेहरा यहां आने-जाने वालों को घूर रहा है.
इसके ऊपर लगे बोर्ड पर लिखा है, जॉर्ज ऑरवेल लाइब्रेरी.
इस छोटी सी लाइब्रेरी के भीतर ऐसी किताबें हैं जो आपको भयावह काल्पनिक दुनिया और अधिनायकवाद के ख़तरे के बारे में बताती हैं. यहां जॉर्ज ऑरवेल के क्लासिक उपन्यास ''नाइंटीन एटी-फोर'' की कई प्रतियां उपलब्ध हैं. ये एक ऐसी कहानी है जहां पर ''बिग ब्रदर'' हमेशा निगरानी करता रहता है और सरकार ने शरीर और मन पर पूरा नियंत्रण कर लिया है.
लाइब्रेरियन एलेग्ज़ेंद्रा कारासेवा मुझसे कहती हैं, ''रूस में अब स्थिति 'नाइंटीन एटी-फोर' जैसी है. सरकार, राज्य और सुरक्षा संरचनाओं का पूर्ण नियंत्रण है.''
'नाइंटीन एटी-फोर' में पार्टी लोगों की वास्तविकता की धारणा से हेरफेर करती है ताकि ओशिनिया के नागरिक इस बात पर भरोसा करें कि ''युद्ध ही शांति'' है और ''अज्ञान ही शक्ति'' है.
रूस का मीडिया लगातार करता है दावा
रूस में आज कुछ ऐसा ही है. सुबह से रात तक यहां का मीडिया ये दावा करता है कि यूक्रेन में रूस का युद्ध आक्रमण नहीं बल्कि रक्षात्मक कार्रवाई है. रूसी सैनिक क़ब्ज़ा करने वाले नहीं बल्कि आज़ाद कराने वाले लोग हैं. वो दावा करते हैं कि पश्चिमी देशों ने रूस के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ रखा है, जबकि सच्चाई ये है कि क्रेमलिन ने ही पूरी ताक़त के साथ यूक्रेन पर हमला किया है.
एलेग्ज़ेंद्रा कहती हैं, ''मैं ऐसे लोगों से मिली हूं जो टीवी देखने के आदी हैं और उनका मानना है कि रूस यूक्रेन के साथ युद्ध में नहीं है और पश्चिमी देश हमेशा से रूस को ख़त्म करने के लिए तैयार हैं.''
''ये नाइंटीन एटी-फोर जैसा है. लेकिन ये रे ब्रैडबरी के उपन्यास फ़ारेनहाइट 451 जैसा भी है. उस कहानी में हीरो की पत्नी दीवारों से घिरी हुई है जो टीवी स्क्रीन के बने हुए हैं, जो उसे बताते हैं कि आख़िर उसे करना क्या है और दुनिया को किस तरीके से देखना है.''
इस लाइब्रेरी में कैसी किताबें हैं?
दो साल पहले स्थानीय कारोबारी दिमित्री सिलिन ने ये लाइब्रेरी खोली थी. वो यूक्रेन पर रूसी हमले की मुखर आलोचना कर रहे थे. ऐसे में वो एक ऐसा स्पेस तैयार करना चाह रहे थे जहां रूस के लोग ''टीवी देखने के बजाए खुद सोच सकें''.
दिमित्री को बाद में इसकी सज़ा भी भुगतनी पड़ी. उन पर एक इमारत पर ' नो टू वॉर' लिखने का आरोप लगा. हालांकि उन्होंने इस आरोप से इनकार किया. उनके लिए माहौल ऐसा बना कि उन्हें रूस छोड़कर भागना पड़ा.
एलेग्ज़ेंद्रा कारासेवा मुझे लाइब्रेरी दिखाती हैं. यहां फ़्रेज़ काफ़्का से फ़्योदोर दस्तोवेस्की जैसे दिग्गजों की साहित्यिक रचनाएं हैं. नॉन-फ़िक्शन किताबें भी हैं जिसमें रूसी क्रांति से लेकर स्टालिन के दमन, कम्यूनिज़्म के विफल होने और आधुनिक समय में रूस में लोकतांत्रिक व्यवस्था की विफलता की भी किताबें हैं.
आप यहां से जो किताबें ले सकते हैं, वो रूस में प्रतिबंधित नहीं हैं लेकिन ये किताब जिन विषयों पर लिखी गई हैं, वो यहां बेहद संवेदनशील हैं. रूस के अतीत और वर्तमान पर किसी भी तरह की ईमानदार बहस समस्याएं खड़ी कर सकती हैं. 1984 की कॉपियां. एलेग्ज़ेंद्रा को ये विश्वास है कि इन किताबों के शब्द बदलाव लाने वाले हैं. इसलिए वो इस पर अडिग हैं कि ये लाइब्रेरी खुली रहनी चाहिए.
एलेग्ज़ेंद्रा बताती हैं कि ये किताबें पाठकों को बताती हैं कि निरंकुश शासन हमेशा के लिए नहीं होता है.
उन्होंने कहा, " सभी तरह के सिस्टम में कुछ कमज़ोरियां होती हैं और वो सभी परिस्थितियां समझ सकते हैं, वो अपनी स्वतंत्रता बचा सकते हैं. "
"मेरी पीढ़ी के ज़्यादातर लोगों को ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र का कोई अनुभव नहीं है. हमने सोवियत यूनियन के विघटन में मदद की लेकिन लोकतंत्र स्थापित करने में विफल रहे. हमें ये नहीं पता कि हमें कब मज़बूती से खड़ा रहना है और ये कहना है कि आप ये नहीं कर सकते हैं. शायद मेरी पीढ़ी ने 1984 पढ़ा होता तो वो कुछ अलग तरह से व्यवहार करते.''
18 साल के दिमित्री शेसतोपालोव ने 1984 किताब पढ़ी है. वो यहां सहायता मुहैया कराते हैं.
दिमित्री कहते हैं, ''ये जगह पवित्र है. रचनात्मक युवा लोगों के लिए ये जगह ऐसी है कि जहां वो अपने जैसे विचार के लोगों से मिल सकते हैं. ये उन्मुक्त और स्वतंत्र माहौल वाला एक टापू है."
एलेग्जेंद्रा ये मानती हैं कि यहां पर आने वाले लोगों की संख्या कम है.
यहां लोग क्या सोच रहे हैं?
इसके उलट, मुझे इवानोवो के केंद्र में एक बड़ी भीड़ दिखाई देती है. ये बिग ब्रदर नहीं है जिन्हें सुनने के लिए लोग इकट्ठा हैं. ये एक बिग बैंड है.
तेज़ धूप के बीच एक ऑर्केस्ट्रा क्लासिक सोवियत धुन बजा रहा है और लोग गाने पर नाच रहे हैं. भीड़ से बात करते हुए मुझे अहसास हुआ कि कुछ रूसी बिलबोर्ड पर लिखी बातों को मानने के लिए तैयार हैं कि रूस तरक्की की राह पर है.
पेंशनभोगी व्लादिमीर कहते हैं, ''मैं रूसी प्रगति से ख़ुश हूं. हम अधिक आज़ाद हो रहे हैं और पश्चिम पर निर्भरता कम हो रही है.''
नताल्या नाम की एक युवती कहती हैं, ''हम प्रगति कर रहे हैं. जैसा कि व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि रूस के लिए नया चरण शुरू हो रहा है.''
लेकिन यूक्रेन पर रूस के हमले के बारे में क्या कहना है?
नीना कहती हैं, ''मैं कोशिश करती हूं कि इस बारे में कुछ नहीं देखूं, ये परेशान करने वाला है.''
जॉर्ज ऑरवेल लाइब्रेरी में वो एक कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं. एक स्थानीय मनोवैज्ञानिक यहां पर ''असहायता की समझ'' से जुड़े विषय पर व्याख्यान दे रहे हैं, इसमें वो बता रहे हैं कि कैसे आपके पास अपनी ज़िंदगी बदलने की शक्ति है. दर्शकों में दस लोग हैं.
'इमारत बिक्री पर है, लाइब्रेरी को बाहर जाना होगा'
जब व्याख्यान ख़त्म होता है तो लाइब्रेरियन एलेग्ज़ेंद्रा कारासेवा ख़बर बताती हैं.
वो कहती हैं, ''इमारत को बिक्री के लिए रखा गया है. हमारी लाइब्रेरी को बाहर जाना होगा. हमें तय करना होगा कि क्या करना है. अब हम कहां जाएंगे?''
लाइब्रेरी को शहर में किसी छोटे परिसर में भेजने की पेशकश की गई है.
उसी वक्त एक महिला ने इस काम में मदद के लिए अपनी वैन देने की पेशकश की. दर्शकों में से एक ने लाइब्रेरी में मदद के लिए वीडियो प्रोजेक्टर दान देने की बात कही. वहां मौजूद दूसरे लोगों ने पैसे जुटाने के लिए सुझाव दिए.
ये सक्रिय सिविल सोसाइटी है. ज़रूरत के समय नागरिक एकजुट होते हैं.
बेशक इसका पैमाना थोड़ा छोटा है और सफलता की कोई गारंटी नहीं है. ऐसे समाज में जहां आज़ादी कम होती जा रही है, लाइब्रेरी का दीर्घकालिक भविष्य ख़तरे में है. लेकिन वो हार नहीं मान रहे हैं, अभी तक तो नहीं.
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