क़तर में गिरफ़्तार पूर्व नौसैनिकों को छुड़ाने के लिए भारत ने भेजा अपना अधिकारी- प्रेस रिव्यू

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भारत ने अपने एक वरिष्ठ अधिकारी को दोहा रवाना किया है ताकि वहाँ गिरफ़्तार किए गए अपने नौसेना के पूर्व अधिकारियों की रिहाई की कोशिशों को बल मिल सके.
अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, ये भारतीय अधिकारी अक्तूबर महीने के आख़िरी सप्ताह में दोहा गए हैं.
मंगलवार को पूर्व नौसेना अधिकारियों को क़तर में गिरफ़्तार हुए 71 दिन पूरे हो गए. इस बीच सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों से इन पूर्व अधिकारियों की रिहाई की अपील भी तेज़ी से बढ़ी है.
हिरासत में रखे गए अधिकारियों के परिवार के बीच भी ये चिंता बढ़ती जा रही है कि भारत अभी तक अपने पूर्व अफ़सरों की रिहाई सुनिश्चित नहीं कर सका है.
बीते 10 दिनों से भी अधिक समय से भारत सरकार क़तर के साथ बातचीत कर रही है लेकिन अभी तक कोई समाधान निकलता नहीं दिखा है.
अख़बार लिखता है कि बीते सप्ताह दूसरी बार भारतीय दूतावास के अधिकारी को पूर्व नौसैनिकों से मिलने की मंज़ूरी मिलने सहित कुछ ऐसे संकेत मिले थे, जिनसे लगा कि कुछ समय में ये अधिकारी रिहा कर दिए जाएंगे, लेकिन ये उम्मीद भी बेकार हो गई. पहली बार अधिकारियों और कॉन्सुलर की मुलाक़ात पिछले महीने हुई थी.
भारतीय नौसेना के ये पूर्व अधिकारी क़तर की एक कंपनी 'अल-ज़ाहिरा अल-आलमी कन्सलटेन्सी एंड सर्विसेज़' के लिए काम करते हैं. यह कंपनी क़तर की नौसेना को प्रशिक्षण और सामान मुहैया कराती है.
गिरफ़्तारी के दो सप्ताह बाद भारतीय दूतावास को मिली सूचना
दोहा में भारतीय दूतावास को इन आठ लोगों की गिरफ़्तारी की सूचना सितंबर महीने के मध्य में मिली थी. इससे दो सप्ताह पूर्व यानी 30 अगस्त को क़तर की ख़ुफ़िया एजेंसी स्टेट सिक्योरिटी ब्यूरो ने इन्हें गिरफ़्तार किया गया था.
सितंबर के आख़िरी सप्ताह में इन लोगों को परिवार से फ़ोन पर बात करने की इजाज़त दी. तीन अक्तूबर को गिरफ़्तार किए गए लोगों से पहली बार भारतीय दूतावास के अधिकारी को मिलने दिया गया. दूसरी बार नवंबर महीने के पहले सप्ताह में भारतीय अधिकारी को गिरफ़्तार लोगों से मिलने की इजाज़त दी गई.
अभी तक इस बारे में क़तर की तरफ़ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है कि उन्हें कब और क्यों गिरफ़्तार किया गया है. सभी आठों लोगों को एकांत कारावास में रखा गया है जो आमतौर पर सुरक्षा संबंधित अपराधों के लिए दिया जाता है.

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क्यों अलग है मामला?
क़तर पहले भी अलग-अलग आरोपों में भारतीयों को जेल में रख चुका है और उन्हें प्रत्यर्पित कर चुका है. लेकिन भारत ने ख़ासतौर पर इस मामले में हैरानी दिखाई है जबकि क़तर के साथ उसके दोस्ताना संबंध है.
दोनों देशों ने संयुक्त नौसेना अभ्यास भी किया है.
दोनों देशों के बीच मौजूदा परिस्थितियों में एक साथ इतने सैन्य अधिकारियों की गिरफ़्तारी, फिर वो सेवानिवृत्त ही क्यों न हों, सामान्य संकेत नहीं दे रहे हैं.
गिरफ़्तार किए गए लोगों में से कुछ नौसेना से कैप्टन बनकर रिटायर हुए तो कुछ कमांडर पद से सेवानिवृत्त हुए थे. ये सभी लोग क़तर की कंपनी के लिए पिछले 4-6 सालों से काम कर रहे थे. कंपनी के एमडी कमांडर पुरनेंदू तिवारी (रिटायर्ड) को 2019 में प्रवासी भारत सम्मान दिया जा चुका है.
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, ये मामला तब सामने आया जब डॉक्टर मीतू भार्गव नाम के एक ट्विटर यूज़र ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री और कुछ अन्य कैबिनेट मंत्रियों से 27 अक्टूबर को अपील की थी.
जम्मू-कश्मीर में चरमपंथ के पीड़ितों के लिए केंद्र ने आरक्षित की मेडिकल सीटें

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केंद्र ने इस साल देशभर में चल रहे सरकारी कॉलेजों में जम्मू-कश्मीर में चरमपंथ से प्रभावित छात्रों के लिए मेडिकल सीटें आरक्षित कर दी हैं. इनमें वे छात्र भी शमिल होंगे जिनके माता-पिता की चरमपंथी हमले में या तो मौत हो गई या फिर वे विकलांग हो गए.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना का हवाला देते हुए बताया है कि एमबीबीएस और बीडीएस कोर्स के लिए ये आरक्षण केंद्र के कोटे से दिया जाएगा और 2022-23 शैक्षिक वर्ष से लागू होगा. हालांकि, ये स्पष्ट नहीं है कि कितनी सीटें आरक्षित रखी जाएंगी.
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने इस अधिसूचना को मंज़ूरी दे दी है.
ख़बर के उन बच्चों को दाख़िले में प्राथमिकता दी जाएगी, जिनके माता और पिता दोनों की जान चरमपंथी हिंसा में गई हो और जो जम्मू-कश्मीर में केंद्र, या किसी अन्य राज्य सरकार के कर्मी हों.
ऐसे बच्चे बारहवीं कक्षा में विज्ञान के विषयों जैसे फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी/बायोटेक्नोलॉजी में कम से कम 50 फ़ीसदी अंक लाने के बाद ये लाभ उठाने के लिए दावा कर सकते हैं. इसके लिए नीट परीक्षा में भी कम से कम 50 फ़ीसदी अंक लाना ज़रूरी है.
जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ़ प्रोफ़ेशनल एंट्रेंस एग्ज़ामिनेशन ने इस संबंध में छात्रों से आवेदन भी मंगाए हैं.
नया विधि आयोग समान नागरिक कानून पर कर सकता है विचार

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गुजरात सरकार की ओर से समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करने के लिए कमेटी बनाने के एलान के बाद अब केंद्रीय कानून मंत्री किरन रिजिजू ने 22वें विधि आयोग के लिए नियुक्तियां कर दी हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट में ये जानकारी दी है कि नया विधि आयोग यूसीसी के मसले पर विस्तृत अध्ययन कर सकता है. सोमवार देर रात किरन रिजिजू ने ट्विटर पर एलान किया कि हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस ऋतुराज अवस्थी विधि आयोग के अध्यक्ष होंगे.
इसके अलावा जस्टि के.टी. शंकरण, प्रोफ़ेसर आनंद पालीवाल, प्रोफ़ेसर डी.पी वर्मा, प्रोफ़ेसर रका आर्या और एम. करुणानिति को इस आयोग के अन्य सदस्यों के रूप में नियुक्त किया गया है.
विधि आयोग का काम केंद्र सरकार को विभिन्न कानूनी मसलों पर सुझाव देना है. आमतौर पर इसका गठन तीन साल के लिए होता है.
नया आयोग बनाने के संबंध में दो साल पहले यानी फ़रवरी 2020 में अधिसूचना जारी की गई थी. इसका मतलब है कि अब इस आयोग का कार्यकाल ख़त्म होने में बमुश्किल तीन महीने का समय बचा है और ऐसे में ये नियुक्तियां अहम बताई जा रही हैं.
अख़बार लिखता है कि इन नियुक्तियों से संकेत मिलते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार की मंशा 2024 लोकसभा चुनाव से पहले यूसीसी को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की है.
भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के घोषणापत्रा में भी समान नागरिक कानून की बात की थी. हालांकि, बीजेपी शासित राज्य उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात में पहले ही इसे लागू करने पर चर्चा हो रही है लेकिन कुछ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले को केवल देश की संसद को ही निपटाना चाहिए.
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