समलैंगिक विवाह पर आज आएगा सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला

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भारतीय सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने के मामले पर आज फ़ैसला सुनाएगा.

इस फ़ैसले पर समानता चाह रहे एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लाखों लोगों की उम्मीदें टिकी हुई हैं.

देश की सर्वोच्च अदालत समलैंगिक जोड़ों और एक्टिविस्ट द्वारा दायर 18 से ज़्यादा याचिकाओं को मिलाकर उस पर सुनवाई कर रही थी.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि शादी न कर पाने से वे ‘दोयम दर्ज़े के नागरिक’ बनकर रह जा रहे हैं.

सबकी निगाहें पांच जजों की बेंच पर टिकी हैं जिसने इस मामले पर अप्रैल और मई में काफ़ी विस्तार से सुनवाई की. अदालत की कार्यवाही को ‘जनहित में लाइवस्ट्रीमिंग’ भी किया गया था .

शुरुआती सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक खंडपीठ ने कहा था कि वह धार्मिक व्यक्तिगत क़ानूनों में दख़ल नहीं देगी, लेकिन इस बात पर विचार किया जाएगा कि एलजीबीटीक्यू-प्लस समुदाय के लिए अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों को मान्यता देने वाले स्पेशल मैरिज एक्ट में बदलाव किए जा सकते हैं या नहीं.

लेकिन जैसे-जैसे अदालती कार्यवाही आगे बढ़ी, यह स्पष्ट होता चला गया कि मामला कितना पेचीदा है.

सुनवाई के दौरान क्या कुछ हुआ

पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने माना कि सिर्फ़ एक क़ानून में बदलाव लाने से कुछ नहीं होगा क्योंकि तलाक़, गोद लेने, उत्तराधिकार और गुज़ारा देने जैसे अन्य क़रीब 35 क़ानून हैं जिनमें से कई धार्मिक व्यक्तिगत क़ानूनों के दायरे तक जाते हैं.

याचिकाकर्ताओं के वकीलों का तर्क था कि शादी दो लोगों का मिलन है, न कि सिर्फ एक महिला और पुरुष का.

ऐसे में उन्हें शादी करने का अधिकार न देना संविधान के ख़िलाफ़ है क्योंकि संविधान सभी नागरिकों को अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार देता है और सेक्शुअल ओरिएंटेशन के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है.

उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि शादी न कर पाने के कारण इस समुदाय के लोग न तो संयुक्त बैंक खाता खोल सकते हैं, न घर के साझे मालिक बन सकते हैं औ न ही बच्चों को गोद ले सकते हैं. वे शादी के साथ मिलने वाली इज्ज़त से भी महरूम हैं.

एलजीबीटीक्यू समुदाय का क्या है तर्क

वहीं, एलजीबीटीक्यू समुदाय को शादी की समानता देने का कड़ा विरोध कर रही सरकार का कहना था कि शादी के इस सामाजिक-क़ानूनी विषय पर सिर्फ़ संसद चर्चा कर सकती है और अदालत को इसकी सुनवाई का अधिकार नहीं है.

सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील थी कि प्यार करने और साथ रहने का अधिकार बुनियादी है मगर शादी एक ‘संपूर्ण अधिकार नहीं है’ और यह बात विषमलैंगिक (महिला-पुरुष) जोड़ों पर भी लागू होती है.

उन्होंने कहा कि कई सारे रिश्तों पर रोक है, जैसे कि इनसेस्ट (परिवार के सदस्यों के बीच सम्बंध) पर.

सरकार ने समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने के बजाय समलैंगिक जोड़ों की ‘मानवीय पहलुओं से जुड़ी चिंताओं’ को सुलझाने के लिए भारत के शीर्ष नौकरशाह- कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा.

न्यायाधीशों ने इसे ‘एक उचित सुझाव’ मानते हुए कहा कि “कई बार शुरुआत भले छोटी होती है लेकिन यह वर्तमान स्थिति से कहीं आगे ले जाती है और समलैंगिक अधिकारों के भविष्य के लिए यह नींव का पत्थर साबित हो सकती है.”

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