मोदी की राजनीति में रील्स की एंट्री: जेन ज़ी को साधने की कोशिश क्यों?

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- Author, निकिता यादव
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
- ........से, नई दिल्ली
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
भारत की जेन-ज़ी के कई युवा शायद नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त नहीं मानते होंगे. लेकिन भारत के प्रधानमंत्री अब उनसे दोस्त की तरह बात करने की कोशिश कर रहे हैं.
75 वर्षीय मोदी ने लंबे समय तक भाषणों, औपचारिक प्रसारणों और बेहद सावधानी से तैयार किए गए सार्वजनिक कार्यक्रमों के ज़रिए मज़बूत नेता की अपनी छवि बनाई है.
लेकिन हाल के हफ़्तों में उन्होंने इंस्टाग्राम पर ज़्यादा सहज और अनौपचारिक शैली अपनाई है. फ़ोटो और वीडियो साझा करने वाला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम युवाओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय है.
मोदी की टाइमलाइन पर, जहां करीब एक महीने पहले तक बेहद सोच-समझकर तैयार की गई पोस्ट ही दिखाई देती थीं, वहाँ अब कुछ 'कैंडिड' यानी सहज और अनौपचारिक कंटेंट भी नज़र आ रहे हैं.
इसमें 'गेट रेडी विद मी' जैसी रील और युवाओं को संबोधित करते हुए कई सेल्फी-स्टाइल वीडियो शामिल हैं. इन वीडियो में वह युवाओं को 'दोस्त' कहकर संबोधित करते हैं.
एक वीडियो में उन्होंने जेन-ज़ी के बीच लोकप्रिय एक अभिव्यक्ति 'फर्स्ट इन माय ब्लडलाइन' का भी ज़िक्र किया. दिल्ली में एक दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "उस पीढ़ी से हैं, जिसने रॉकेट, चिप और ड्रोन बनाने का काम किया है."
इंस्टाग्राम पर मोदी के 10.6 करोड़ से अधिक फ़ॉलोअर्स हैं. इससे वह इस मंच पर सबसे ज़्यादा फ़ॉलो किए जाने वाले राजनीतिक नेताओं में शामिल हैं.
लेकिन इस मंच पर उनकी संवाद शैली उनकी टीम या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सोशल मीडिया रणनीति का कभी मुख्य हिस्सा नहीं रही.
ऐसा तब भी था जब बीजेपी की पहचान एक ऐसी पार्टी के तौर पर बनी, जिसने 2014 के चुनावों में जीत दिलाने वाली डिजिटल रणनीति का प्रभावी इस्तेमाल किया था
हालांकि, इस साल भारत में हुए युवा प्रदर्शनों के बाद हालात बदल गए.
व्यंग्य से निकली कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के नेतृत्व में यह आंदोलन मीम्स, लाइवस्ट्रीम और इंस्टाग्राम रील्स के ज़रिए फैला. बाद में यह इतना प्रभावशाली बन गया कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
सीजेपी की शुरुआत एक मज़ाक के रूप में हुई थी. लेकिन ऑनलाइन मिले सपोर्ट को सड़कों पर जुटी भीड़ और राजनीतिक दबाव में बदलने की इसकी क्षमता ने बीजेपी को चौंका दिया.

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लेखक और टिप्पणीकार अनुराग माइनस वर्मा के अनुसार, एक दशक से ज़्यादा समय से बीजेपी ने व्हाट्सऐप समूहों, फ़ेसबुक पेजों और एक्स अकाउंट्स के ज़रिए जरिए अपने संदेशों को बड़े पैमाने पर फैलाकर भारत की सबसे मजबूत ऑनलाइन राजनीतिक ताकतों में से एक खड़ी की है
लेकिन भारतीय युवा कॉटेंट और राजनीति को अलग तरीक़े से देखते और समझते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की 60 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है. 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई जेन-ज़ी 2029 के आम चुनाव तक देश के सबसे बड़े मतदाता समूहों में से एक बनने की उम्मीद है.
उन्हें अपने पक्ष में करना है तो इंस्टाग्राम जैसे मंचों तक पहुंचना ज़रूरी है. जहां पारंपरिक राजनीतिक संदेशों के मुकाबले व्यक्तिगत और बिना ज्यादा फिल्टर वाला कंटेंट ज्यादा असर डाल सकता है.
यह बदलाव तब साफ़ दिखाई दिया, जब मोदी की नई पोस्ट पहली बार इंस्टाग्राम पर सामने आईं. युवा यूज़र्स ने तुरंत उन पर व्यंग्य करना शुरू कर दिया.
कई लोगों ने उनकी पहली सेल्फ़ी-वीडियो रील का मज़ाक उड़ाया. इसी वीडियो में उन्होंने युवा प्रदर्शनों पर अपनी चुप्पी तोड़ी थी, जबकि प्रदर्शन अभी जारी थे.
लेकिन सबसे ज़्यादा ध्यान उस लंबे ठहराव ने खींचा, जो उन्होंने "दोस्तों" कहने के बाद लिया था.
जल्द ही इस वीडियो के कई वर्ज़न ऑनलाइन ट्रेंड करने लगे.
लोगों ने उनमें अलग-अलग तरह की एडिटिंग और चुटकुले जोड़े. कई यूजर्स ने वीडियो की लाइटिंग और कैमरे के एंगल का भी मज़ाक बनाया.

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इसके बाद आई पोस्ट्स में मोदी की टीम ने इस आलोचना का कुछ हद तक जवाब देते हुए अलग-अलग कैमरा एंगल, बैकग्राउंड और लाइटिंग के साथ प्रयोग किया.
कुछ युवा यूज़र्स ने इस नए अंदाज़ की सराहना की, लेकिन कई लोग अभी भी इसके समय को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
22 वर्षीय गिन्नी मालिया कहती हैं कि वह समझती हैं कि बीजेपी उनकी उम्र के लोगों से जुड़ना क्यों चाहती है. लेकिन उनके अनुसार, "अचानक बढ़ी इस सक्रियता का समय ही वह सवाल है, जिस पर हमें सबसे ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है."
वह आगे कहती हैं कि इन वीडियो में जेन-ज़ी की भाषा और प्रजेंटेशन की शैली अपनाई गई है. लेकिन ये उन मुद्दों पर बात नहीं करते, जिन्होंने प्रदर्शनों को जन्म दिया था.
यह सिर्फ़ मोदी के अकाउंट तक सीमित नहीं है.
बीजेपी के सोशल मीडिया पेज भी युवाओं तक पहुंचने के लिए अब मीम्स, स्लैंग और पॉप-कल्चर के संदर्भों का इस्तेमाल करने लगे हैं
प्रदर्शन खत्म होने के कुछ ही समय बाद बीजेपी ने जिम में शूट की गई एक रील पोस्ट की. इसमें कुछ युवा और एक उम्रदराज़ ट्रेनर इस बात पर बहस करते दिखाई दिए कि भारतीय युवाओं को प्रदर्शनों से दूर रहना चाहिए.
लेकिन वीडियो पर कई लोगों ने कमेंट और शेयर करते हुए इसे "क्रिंज" यानी बनावटी और असहज बताया.
बीजेपी के पोस्ट किए गए एक और वीडियो में 90 के दशक के सिचुएशनल कॉमेडी सीरियल 'फ्रेंड्स' का टाइटल ट्रैक बैकग्राउंड में बज रहा था, जिसमें कैप्शन था- "पीएम मोदी आपके लिए हैं".
यह उस शो का संदर्भ था जो मिलेनियल्स के बीच हिट था लेकिन जेन ज़ी के बीच इसकी पहचान बहुत कम है.
गिन्नी मालिया कहती हैं कि उनके हमउम्र लोगों के बीच इन वीडियो को राजनीतिक संदेश या जनसंपर्क की कोशिश के बजाय "मनोरंजक सामग्री" के रूप में देखा जाता है.
रिपोर्टों के अनुसार, भाजपा को भी यह अहसास है कि युवाओं तक पहुंचने की उसकी कोशिशें उम्मीद के मुताबिक़ असर नहीं डाल पा रही हैं.
प्रदर्शनों के दौरान मोदी ने कथित तौर पर अपने कैबिनेट मंत्रियों से सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ाने और युवाओं तक पहुंचने को कहा था.
'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार को केंद्रीय मंत्रियों को सोशल मीडिया पर उनके प्रदर्शन का "रिपोर्ट कार्ड" दिया गया और अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए कहा गया.
हाल में पार्टी ने अपने सोशल मीडिया प्रमुख अमित मालवीय को भी इस पद से हटा दिया.
वह 2015 से इस जिम्मेदारी को संभाल रहे थे.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इसकी एक वजह प्रदर्शनों के दौरान BJP को ऑनलाइन मिली आलोचना और सोशल मीडिया पर बन रही कहानी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित न कर पाना हो सकती है.

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युवा दर्शकों से जुड़ने की कोशिश सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं कर रही है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी इंस्टाग्राम पर अक्सर सेल्फ़ी शैली के वीडियो और अनौपचारिक तस्वीरें साझा करते हैं. प्रदर्शनों के बाद उन्होंने इंस्टाग्राम पर ' आस्क मी एनीथिंग' सेशन भी किया, जिसमें उन्होंने कुछ सवालों के मजेदार अंदाज़ में जवाब दिए.
मसलन, एक सवाल के जवाब में उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में पूछा- "क्या आपने मुझे और बैटमैन को कभी एक ही कमरे में देखा है?"
हालांकि इंस्टाग्राम पर लोगों का ध्यान खींचना एक बात है, लेकिन वहां बातचीत की दिशा को नियंत्रित करना दूसरी बात है.
मिशिगन विश्वविद्यालय में सोशल मीडिया के राजनीतिक इस्तेमाल के बारे में पढ़ाने वाले जोयोजीत पाल कहते हैं कि बीजेपी लंबे समय से एक्स और व्हाट्सऐप पर अपने समर्थकों के नेटवर्क का सहारा लेकर अपने संदेश को फैलाती रही है और जनमत को प्रभावित करती रही है. लेकिन इंस्टाग्राम पर यह रणनीति उसी तरह काम नहीं करती.
यह मंच आमतौर पर उस कंटेंट को आगे बढ़ाता है, जिस पर ज़्यादा लोगों की प्रतिक्रिया मिलती है. इसमें लंबे समय तक देखा जाना, दोबारा देखा जाना, शेयर और कमेंट जैसी एक्टिविटीज़ शामिल हैं.
पाल कहते हैं, "ऐसी रील ढूंढना मुश्किल नहीं है जिसे 1 करोड़ बार देखा गया हो, जबकि उसे पोस्ट करने वाले अकाउंट के सिर्फ़ 200 फ़ॉलोअर्स हों. वहीं, लाखों फ़ॉलोअर्स वाले लोगों की कुछ पोस्टों पर सिर्फ़ कुछ हज़ार व्यूज़ आते हैं."
वह कहते हैं, "यह बीजेपी के लिए एक चुनौती है, क्योंकि उसकी रणनीति ऐसे इंटरनेट के लिए बनाई गई थी, जो नेटवर्क पर आधारित था. जबकि आज के प्लेटफॉर्म्स भावनाओं और प्रतिक्रियाओं पर ज़्यादा आधारित हैं."

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बीजेपी के सामने एक और चुनौती यह हो सकती है कि वीडियो पोस्ट होने के बाद उस पर उसका नियंत्रण नहीं रहता.
मोदी की पहली रील इसका एक उदाहरण है, जिसे 40 करोड़ से ज़्यादा बार देखा जा चुका है. इसने बड़ी संख्या में दर्शकों तक पहुंच बनाई.
लेकिन वर्मा के अनुसार, युवाओं ने इसे व्यंग्यात्मक और मज़ाकिया एडिटिंग के साथ दोबारा साझा किया. इससे वीडियो का स्वर मोदी की मूल मंशा से काफ़ी अलग हो गया. बीजेपी के लिए इस स्थिति को स्वीकार करना एक चुनौती हो सकता है.
वर्मा कहते हैं, "इंस्टाग्राम मूल रूप से व्यंग्य और कटाक्ष पर आधारित प्लेटफॉर्म है. रील के रूप में पेश किए गए गंभीर राजनीतिक संदेशों का भी मज़ाक बनाया जा सकता है."
हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जेन-ज़ी को आकर्षित करने की बीजेपी की कोशिशों को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व नहीं देना चाहिए.
उनका कहना है कि पार्टी की चुनावी सफलता अब भी इंस्टाग्राम पर उसकी सामग्री के प्रदर्शन से ज़्यादा उसकी संगठनात्मक ताक़त और वफ़ादार समर्थक आधार पर निर्भर करती है.
पाल कहते हैं, "चुनाव जीतने की क्षमता और सोशल मीडिया पर चर्चा को अपने पक्ष में करने की क्षमता, दोनों अलग बातें हैं. बीजेपी चुनावों में बड़ी जीत हासिल कर सकती है, भले ही सोशल मीडिया पर जेन-ज़ी का हर व्यक्ति उसे नापसंद करता हो."
फ़िलहाल, भारत की राजनीति में मौजूद कई अन्य दलों की तरह बीजेपी भी एक ऐसे क्षेत्र में काम करना सीख रही है, जो उसके लिए नया है.
लेकिन पाल का कहना है कि अगर बीजेपी आख़िरकार इसे समझ ले और इसमें सफल हो जाए, तो यह कोई हैरानी की बात नहीं होगी.
नई राजनीतिक संवाद शैलियों को अपनाने का उसका लंबा इतिहास रहा है.
चुनाव प्रचार के लिए सोशल मीडिया का शुरुआती इस्तेमाल करने से लेकर पॉडकास्ट और इन्फ्लुएंसर इंटरव्यू जैसे नए प्रारूपों को अपनाने तक, पार्टी ने समय के साथ ख़ुद को ढाला है.
वह कहते हैं, "लेकिन इसमें समय लगेगा. और यह तथ्य कि हम अभी यह समस्या देख रहे हैं, इसका मतलब है कि उन्हें नए नियम सीखने होंगे."
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
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