जातिगत भेदभाव पर बैन: कैलिफ़ोर्निया में क़ानून के लिए कितनी चुनौतियां?

प्रकाशित

सविता पटेल

बीबीसी हिंदी के लिए, सैन फ्रांसिस्को से

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  • जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए कैलिफोर्निया की डेमोक्रेट नेता आयशा वहाब ने ‘एसबी-403’ बिल पेश किया है.
  • इसके तहत भेदभाव विरोधी क़ानून की श्रेणी में लिंग, नस्ल, धर्म के साथ जाति को भी शामिल किया जाएगा.
  • ये बिल क़ानून बना, तो कैलिफ़ोर्निया जातिगत भेदभाव पर बैन लगाने वाला देश का पहला राज्य बनेगा.
  • इस साल सिएटल जातिगत भेदभाव पर बैन लगाने वाला पहला शहर बना था.
  • अमेरिका में रह रहे भारतीयों में से दलित समुदाय के कुछ लोग इसके लिए समर्थन जुटा रहे हैं.
  • वहीं एक बड़ा वर्ग इस तरह के भेदभाव के दावों को खारिज करता है और बिल के विरोध में है.

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सुखजिंदर कौर अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया के एक अस्पताल में बतौर नर्स काम करती हैं. कोरोना महामारी के दौरान वो अस्पताल में लगातार कई घंटे काम किया करतीं, ये सिलसिला अभी भी जारी है.

लेकिन जैसे ही खाने या ख़ुद के लिए ब्रेक लेने की बारी आती, उनके लिए चीज़ें परेशान करने वाली हो जातीं.

सुखजिंदर दलित हैं और उनका कहना है कि उन्हें अक्सर अपने दक्षिण एशियाई सहयोगियों से जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

अस्पताल में पांच सालों के काम के दौरान उन्होंने अपनी जातिगत पहचान नहीं बताई. बीबीसी से बातचीत के दौरान भी उन्होंने अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करने का फ़ैसला किया.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहती हैं, ''ऊंची जाति से आने वाली नर्सें जाति विशेष को गंदा बताते हुए उन्हें गालियां देती हैं.''

उनका कहना है कि अगर अमेरिका में जाति को लेकर क़ानून बनता है तो उन्हें जातिगत भेदभाव के मामलों को प्रबंधन के पास ले जाने की हिम्मत मिलेगी.

भारत में कई बार 'चमार' शब्द दलितों के लिए एक अपमानजनक शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है और भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार इसका इस्तेमाल दंडनीय भी हो सकता है.

दलित अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कैलिफ़ोर्निया के जातिगत उत्पीड़न के शिकार लोग निवास, शैक्षणिक, पेशेवर और सामाजिक स्तर पर भेदभाव का सामना करते हैं.

इस तरह के भेदभावों को रोकने के लिए डेमोक्रेट पार्टी की सीनेटर आयशा वहाब ने ‘एसबी-403’ बिल तैयार किया है. इसका उद्देश्य राज्य के भेदभाव विरोधी क़ानूनों की श्रेणी में लिंग, नस्ल, धर्म आदि के साथ-साथ जाति को भी शामिल करना है.

बिल को राज्य की असेंबली ने बीती 11 मई को 34-1 के वोट से पारित किया था और अब इसे स्टेट असेंबली में पेश किया जाना है.

ये बिल अगर क़ानून की शक्ल लेता है तो कैलिफ़ोर्निया जातिगत भेदभाव पर प्रतिबंध लगाने वाला अमेरिका का पहला राज्य बन जाएगा.

इससे पहले इसी साल फरवरी में सिएटल जातिगत भेदभाव पर बैन लगाने वाला पहला शहर बना था.

अमेरिका में जाति-विरोधी आंदोलन

अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की बड़ी आबादी रहती है. दुनियाभर के साथ-साथ यहां भी जाति आधारित भेदभाव के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी जा रही है.

कैलिफ़ोर्निया में मौजूद गुरुद्वारे जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ आंदोलन को गति दे रहे हैं.

अमेरिका में 5 लाख से ज़्यादा सिख रहते हैं और इनमें से आधे से ज़्यादा कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं. सिखों के दो बड़े संगठन, 'द सिख कोएलेशन' और 'सिख अमेरिकन लीगल डिफेंस एंड एजुकेशन फंड' इस बिल का समर्थन कर रहे हैं.

सिखों में रविदास समाज राज्य का सबसे बड़ा दलित समुदाय है, जिसके सदस्यों की संख्या लगभग 15 से 20 हज़ार के बीच है. यह समाज बिल के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए काम कर रहा है.

रविदास समाज के लोग चौथी शताब्दी के संत गुरू रविदास का अनुसरण करते हैं जिनका संबंध तथाकथित 'नीची जाति' से था.

लंबे समय से महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता रेणु सिंह गुरुद्वारों में लगातार स्थानीय लोगों को इस बिल के बारे में बता रही हैं.

रेणु खुद हिन्दू हैं और उन्होंने एक सिख परिवार में शादी की है. शादी के बाद दोनों लोग रविदास परंपरा का अनुसरण करते हैं.

रेणु सिंह ने बताया, "नीची जाति से आने वाली एक लड़की ने एक ऊंची जाति के लड़के से शादी की थी. लड़का उसके साथ अक्सर मारपीट करता था और इसे ये कहते हुए इसे जायज़ ठहराता था कि वो महिला है और नीची जाति से है. एक और मामला एक दलित लड़के का है, जिसके ब्राह्मण ससुराल वाले उसके समुदाय को लेकर अपमानजनक टिप्पणी करते हैं.''

रेणु ऐसी घटनाओं का जिक्र भी करती हैं जब कुछ जाति विशेष के लोगों ने अपने दोस्तों के घर दलित गुरु रविदास की तस्वीर देखी और फिर उनके साथ सामाजिक संबंध ख़त्म कर लिए.

वो चाहती हैं कि कैलिफ़ोर्निया के क़ानून निर्माता इन अनुभवों को सुनें, महिलाओं से इस पर बात करने का आग्रह करें और फ़ोन कॉल, ईमेल या गवाहियों के लिए उनकी मदद करें.

इक्वैलिटी लैब की स्टडी के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में जाति आधारित उत्पीड़न का सामना कर रहे चार में से एक व्यक्ति ने शारीरिक और मौखिक हिंसा, तीन में से एक ने शैक्षणिक भेदभाव और तीन में से दो लोगों ने काम करने की जगह पर भेदभाव का सामना किया है.

साल 2016 में जाति और उसके प्रभावों के व्यापक अध्ययन के लिए इक्वैलिटी लैब ने सर्वे किया था. इस सर्वे में दक्षिण एशियाई मूल के 1500 से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था और साल 2018 में इसे प्रकाशित किया गया था.

सर्वे के मुताबिक़ नीची जाति से आने वाले लोग बदले की कार्रवाई से डरते हैं और अपने साथ भेदभाव होने के कारण अपनी जाति छिपाते हैं.

बिल के विरोध में उठी आवाज़

हालांकि, अमेरिका में भारतीय प्रवासियों का एक बड़ा वर्ग जातिगत भेदभाव होने के दावों को ख़ारिज भी करता है.

सैन फ्रांसिस्को के रहने वाले दलित कार्यकर्ता दीपक एल्ड्रिन बिल के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. वो किसी भी प्रकार के भेदभाव की बात से इनकार करते हैं.

दीपक बताते हैं, ''मैं यहां 35 सालों से रह रहा हूं. आज तक किसी भी हिन्दू ने मुझसे मेरी जाति नहीं पूछी है. मुट्ठी भर दलित कार्यकर्ता ही बिल का समर्थन कर रहे हैं, सभी इसके समर्थन में नहीं हैं.''

कुछ भारतीय अमेरिकी और धार्मिक, पेशेवर समूहों के बीच भी इस बिल का विरोध हो रहा है.

इन लोगों का मानना है कि बिल में भले ही एक धर्म विशेष का ज़िक्र नहीं है, पर यह हिन्दुओं और उनके पूजा स्थलों के ख़िलाफ़ भेदभाव पैदा करेगा और यहां तक कि नौकरियों में उनके अवसर भी कम करेगा'.

इन लोगों का मानना है कि कैलिफ़ोर्निया के वर्तमान क़ानून किसी भी तरह के भेदभाव से निपटने के लिए पर्याप्त हैं.

कैलिफ़ोर्निया की हिन्दूपैक्ट संस्था के अंतर्गत आने वाले हज़ारों व्यवसायी और हिन्दू मंदिर स्थानीय सांसदों से बिल को अस्वीकार करने की अपील कर चुके हैं.

हिन्दूपैक्ट के संयोजक अजय शाह का कहना है कि यह क़ानून दुर्भावनापूर्ण है और भारतीय उपमहाद्वीप के बच्चों-युवाओं और हिन्दू धर्म के लोगों को निशाना बनाता है.

हिन्दू अमेरिकी फाउंडेशन की तरफ से कहा गया है कि यह बिल जाति के बारे में 'अनावश्यक' जागरुकता फैला रहा है.

फाउंडेशन की कार्यकारी निदेशक और सह-संस्थापक सुहाग शुक्ला का कहना है कि उनके पास ऐसे लोग आ रहे हैं जिनसे अनुचित सवाल किए गए हैं, ख़ासतौर पर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों से.

वो बताती हैं, ''गैर-दक्षिण एशियाई लोग अपने सहकर्मियों से जाति के बारे में पूछ रहे हैं. अगर यह एक पैटर्न बन जाता है तो जाति-आधारित भेदभाव का कारण बन सकता है.''

उत्तरी अमेरिका में रहने वाले हिन्दुओं के एक संगठन 'कोहना' (CoHNA) की संचालन समिति की सदस्य पुष्पिता प्रसाद बताती हैं कि ‘जाति’ एक न्यूट्रल शब्द नहीं है. शब्दकोशों में इस शब्द की व्याख्या ‘हिंदू समाज में वरीयता की प्रणाली’ के रूप में की गयी है.

उनका कहना है कि "अमेरिकी स्कूलों में पढ़ने वाले हर बच्चे को जाति व्यवस्था के बारे में सिर्फ हिन्दू धर्म के संदर्भ में ही पढ़ाया जाता है. यह उनके पाठ्यक्रम में शामिल विश्व के धर्मों की जानकारी का हिस्सा है.”

जाति एक जटिल मुद्दा है. विपक्ष इस चुनौती से जूझ रहा है कि सरकार कैसे किसी शख़्स की जाति की पहचान करेगी.

आयशा वहाब कौन हैं?

विपक्षी दल भी इस बात से हैरान हैं कि राज्य किसी व्यक्ति की जाति की पहचान कैसे करेगा.

इस बारे में डेमोक्रेट सीनेटर आयशा वहाब बताती हैं, ''जाति के निर्धारण को लेकर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है. यह सिर्फ भेदभाव विरोधी बिल है. जब किसी मामले को अदालतों तक ले जाया जाता है तो वहां विषय विशेषज्ञ इसमें शामिल होते हैं. फिर इसमें दस्तावेज़ और गवाहों जैसी चीज़ों को शामिल किया जाता है. इसलिए इसे भी किसी दूसरी संरक्षित श्रेणी की तरह ही माना जाए."

आयशा वहाब अफ़ग़ान मूल की अमेरिकी सांसद हैं, जिनकी परवरिश सैन फ्रांसिस्को में हुई.

उनका कहना है कि भले ही उन्हें व्यक्तिगत रूप से जातिगत भेदभाव का अनुभव नहीं है लेकिन वह जाति को उस जगह के कारण अच्छे से समझती हैं जहां वह पली-बढ़ी हैं.

वहाब ने कहा है कि इस बिल का प्रस्ताव रखने के बाद उन्हें “जान से मारने की धमकियां” मिली हैं.

वह अब एक रिकॉल कैंपेन का सामना कर रही हैं जिसकी वजह से उन्हें एक बार फिर चुनाव लड़ना पड़ सकता है.

वह कहती हैं कि इस बिल पर उन्हें जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली हैं, वे काफ़ी दिल दुखाने वाली हैं, ऐसे में उन्होंने कैलिफ़ोर्निया के लोगों से इस बिल को पढ़ने का आग्रह किया है.

वह कहती हैं कि ‘इस बिल पर उन्हें जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली हैं, वे काफ़ी दिल दुखाने वाली हैं, ऐसे में उन्होंने कैलिफ़ोर्निया के लोगों से इस बिल को पढ़ने का आग्रह किया है.’

उनका कहना है कि व्यक्ति ऊंची जाति का हो या नीची जाति का, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. यह बिल सबकी सुरक्षा करेगा.

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