कोविड-19 महामारीः तो सबसे ज़्यादा मौतों की वजह वायरस नहीं होगा
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Author, ज़ारिया गोर्वेट
पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
प्रकाशित
दो बरस का एमिल ओउआमोउनो को पेड़ के नीचे खेलना कूदना बहुत पसंद था. एमिल, अफ्रीकी देश गिनी के मेलियान्डू गांव का रहने वाला था. एमिल का गांव जंगलों के बीच स्थित था. और इस जंगल में बहुत सारे चमगादड़ भी रहते थे. कई बार बच्चे उन्हें पकड़ लेते थे और भून कर खाया करते थे.
सितंबर 2013 में एक दिन एमिल अचानक बीमार पड़ गया. 28 दिसंबर 2013 को उसकी मौत हो गई. एमिल को जो बीमारी हुई थी, उसके बारे में उस समय तक दुनिया में किसी को कुछ नहीं पता था. जल्द ही एमिल की मां, बहन और दादी भी इस रहस्यमयी बीमारी की शिकार हो गईं. इन सबके अंतिम संस्कार के बाद तो मानो इस रहस्यमयी बीमारी ने महामारी का रूप ले लिया और ये तेज़ी से पूरे गिनी में फैल गई.
23 मार्च 2014 को इस नई बीमारी से 49 लोग बीमार पड़ चुके थे, जबकि 29 लोगों की जान जा चुकी थी. तब जाकर वैज्ञानिकों ने इस बीमारी की पहचान की. ये इबोला वायरस के संक्रमण का नतीजा थी. अगले क़रीब साढ़े तीन बरस के अंदर ये वायरस 11,325 से ज़्यादा लोगों की जान ले चुका था. जिस वक़्त इबोला वायरस अफ्रीका में क़हर बरपा रहा था, ठीक उसी दौरान एक और त्रासदी की भूमिका तैयार हो रही थी.
इबोला का असर
इबोला वायरस की महामारी के चलते, स्थानीय स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई थीं. कई स्वास्थ्य कर्मियों की मौत के बाद अस्पतालों को बंद करना पड़ा था. और जो अस्पताल खुले थे, वहां महामारी के शिकार लोगों की भारी भीड़ जुट रही थी. इबोला से सबसे ज़्यादा प्रभावित तीन अफ्रीकी देशों सिएरा लियोन, लाइबेरिया और गिनी में लोग डॉक्टर के पास या अस्पताल जाने से बचने लगे. उन्हें इस रहस्यमयी बीमारी से ज़्यादा डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों से डर लगने लगा था. उनके पीपीई सूट पहनने और उनके कारण संक्रमित होने की वजह से इन देशों में स्वास्थ्य कर्मी बहुत बदनाम हो चुके थे.
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2017 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, इबोला वायरस के चलते इन सभी देशों में स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग में 70 प्रतिशत तक की कमी आ गई थी. 80 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं इलाज के लिए अस्पताल जाने से बचती थीं. टीका लगाने की तादाद में भारी गिरावट देखी गई और मलेरिया के शिकार बच्चों के अस्पताल में भर्ती होने की तादाद में 40 फ़ीसद तक की कमी आई थी.
वर्ष 2020 में एक बार फिर वैसे ही हालात देखने को मिल रहे हैं. और इस बार तो पूरी दुनिया में लोग स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी बना रहे हैं.
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कोरोना के कारण दूसरी बीमारियों की अनदेखी
जब कोविड-19 की महामारी फैली, तो ज़्यादातर देशों ने अपने नागरिकों को ये भरोसा दिया कि अस्पतालों में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों को तरजीह मिलेगी. उन्हें बेड, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन मिलेगी. कोविड-19 के मुक़ाबले हर उस बीमारी का इलाज टाला जाने लगा, जिसे ग़ैर-ज़रूरी या अर्जेंट नहीं माना गया. फिर चाहे वो सर्जरी हों, डायलिसिस हो, टीकाकरण हो, कैंसर की जांच हो या सेक्स से जुड़ी बीमारियां.
पर, ऐसा नहीं हैं कि ये बीमारियां ग़ैर-ज़रूरी या महत्वपूर्ण नहीं हैं. पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था जब सिर्फ़ एक महामारी से निपटने में लग जाए, तो ज़ाहिर है अन्य बीमारियों के शिकार लोगों की अनदेखी हो रही है. मगर, हैं तो वो भी बीमार. उन्हें भी इलाज और देख-रेख की ज़रूरत है.
कोविड-19 के ये ऐसे साइड इफ़ेक्ट हैं, जिनका आकलन अभी नहीं हो रहा है. मगर इसके गंभीर नतीजे दुनिया को भुगतने पड़ सकते हैं.
कोरोना वायरस से निपटने के चक्कर में कैंसर के मरीज़ों से लेकर गुर्दे की बीमारी के शिकार और ट्रांसप्लांट का इंतज़ार कर रहे लोगों की अनदेखी हो रही है.
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यूरोप के बाल्कन देशों में महिलाएं ख़ुद से जोखिम भरे गर्भपात वाले नुस्खे आज़मा रही हैं. इसी तरह, गर्भवती महिलाएं अस्पताल के बजाय घर पर ख़ुद से बच्चों की डिलिवरी कर रही हैं.
हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन जैसी मलेरिया की दवा की जमाखोरी के चलते बहुत से लोग इस दवा की कमी से जान गंवा बैठे हैं.
कोविड-19 की महामारी का सबसे बुरा प्रभाव ग़रीब मुल्कों पर पड़ा है. इन देशों में टीबी, मलेरिया और एचआईवी जैसी बीमारियों का इलाज ठप सा हो गया है. रिसर्चरों ने चेतावनी दी है कि इस कारण से बड़ी तादाद में लोगों की जान जा सकती है.
कोविड-19 से निपटने को तरज़ीह देने का सबसे बुरा असर टीकाकरण के अभियान पर पड़ा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि दुनिया भर में एक साल से कम उम्र के क़रीब आठ करोड़ बच्चों के डिप्थीरिया, पोलियो और ख़सरे के शिकार होने का डर है. क्योंकि इन्हें समय पर टीका नहीं लग पा रहा है. दुनिया के 68 देशों में टीकाकरण का अभियान पूरी तरह से ठप है. दुनिया भर से कमोबेश ख़त्म हो चुकी पोलियो की बीमारी के वापस क़हर ढाने का डर बढ़ता जा रहा है.
अकाल की आशंका
वहीं, संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के कार्यकारी निदेशक डेविड बीसले ने चेतावनी दी है कि कोविड-19 के चलते दुनिया पर भयंकर अकाल का ख़तरा मंडरा रहा है. आज क़रीब 13 करोड़ लोग भुखमरी के मुहाने पर खड़े हैं. ये उन 13.5 करोड़ लोगों से अलग हैं, जो पहले से ही भुखमरी का क़हर झेल रहे थे.
इसके अलावा, जानकारों ने चेतावनी दी है कि कोविड-19 के चलते पैदा हुई निराशा से भी बड़ी तादाद में लोगों की जान जा सकती है. भारत में ही कोरोना वायरस से संक्रमित कई लोगों ने निराश हो कर ख़ुदकुशी कर ली. वहीं, बहुत से लोगों ने शराब को अपनी मदद का हथियार बनाया है, जिससे वो दूसरी परेशानियों में उलझ जाएंगे.
कोविड-19 के अलावा इसके कारण और कौन से नुक़सान हो सकते हैं और हम इन्हें रोकने के लिए क्या कर सकते हैं?
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महामारी के विशेषज्ञ टिमोथी रॉबर्टन, अमरीका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के अपने साथियों के साथ कोविड-19 के साइड इफेक्ट के बारे में अध्ययन कर रहे हैं.
टिमोथी कहते हैं कि, 'हमने से बहुत से लोगों ने इबोला वायरस के प्रकोप के दौरान, पश्चिम अफ्रीका में पैदा हुए हालात का अध्ययन किया था, तो हमें पता है कि कोविड-19 के क्या क्या साइड इफेक्ट देखने को मिल सकते हैं.'
टिमोथी रॉबर्टन और उनकी टीम को ये जानने में ख़ास दिलचस्पी थी कि कम आमदनी वाले देशों में इस महामारी के महिलाओं और बच्चों पर कितने बुरे साइड इफेक्ट देखने को मिल रहे हैं.
टिमोथी कहते हैं कि लोग कोरोना वायरस से बहुत डरे हुए हैं. वो अस्पताल नहीं जाना चाहते. बहुत मजबूरी न हो तो डॉक्टर से मिल कर इलाज नहीं कराना चाहते.
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दूसरी दिक़्क़त ये भी है कि बहुत से स्वास्थ्य कर्मी भी कोविड-19 के शिकार हो रहे हैं. इसलिए अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सों की कमी हो रही है. सप्लाई चेन टूटने से दवाओं की भी कमी हो रही है.
कोविड-19 का एक साइड इफेक्ट ये भी है कि समाज के कमज़ोर तबक़े के लोगों को पर्याप्त खाना नहीं मिल पा रहा है. इससे उनकी रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो रही है. जिससे उनके संक्रामक रोगों के शिकार होने का ख़तरा बढ़ गया है.
कुल मिलाकर वैज्ञानिक ये कह रहे हैं कि अगर स्वास्थ्य सेवाओं के इस्तेमाल में पचास फ़ीसद की कमी आती है और लोगों में कुपोषण के शिकार होने का आंकड़ा बढ़ता है, तो कोविड-19 की महामारी के साइड इफ़ेक्ट के कारण, दस लाख से अधिक बच्चों और 56 हज़ार 700 माओं के जान गंवाने का अंदेशा है. इनमें से ज़्यादातर बच्चों की मौत न्यूमोनिया, या डायरिया के कारण डिहाइड्रेशन से होने का डर है. वहीं, अधिकतर महिलाओं की मौत बच्चों की डिलिवरी के दौरान होने वाली परेशानियों के कारण हो सकती है.
टिमोथी रॉबर्टन कहते हैं कि, 'हमारा ज़ोर ये जानने पर है कि अगर महिलाओं और बच्चों को समय पर इन तकलीफ़ों का इलाज नहीं मिल सका, तो क्या होगा? बच्चों को ओआरएस का घोल नहीं मिल सका या फिर माताओं को एंटीबायोटिक न मिलीं, तो क्या होगा?'
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और जब इस मुश्किल में अकाल के जोखिम को जोड़ दें, तो कोविड-19 के साइड इफेक्ट से मरने वालों का आंकड़ा और बढ़ने की आशंका पैदा होती है. संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के ज़रिए दुनिया भर में क़रीब दस करोड़ लोगों को खाना मुहैया कराया जाता है. और इनमें से क़रीब तीन करोड़ तो ख़ुद की जान बचाने के लिए इसी खाने पर निर्भर हैं. विश्व खाद्य कार्यक्रम के अधिकारियों का अपना आकलन है कि आने वाले महीनों में खाने की कमी के चलते क़रीब तीन लाख लोगों की जान हर रोज़ जा सकती है.
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम की संचार प्रमुख जेन हॉवर्ड कहती हैं कि, 'अगर आप कोविड-19 की महामारी के पहले के हालात देखें, तो हम भुखमरी से बहुत अच्छी स्थिति से निपट रहे थे. पिछले पांच वर्षों में भूख से मरने वालों की संख्या में काफ़ी कमी आई थी. लेकिन, दुनिया में बढ़ते संघर्ष और जलवायु परिवर्तन के कारण भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या फिर से बढ़ने लगी थी. और कोविड-19 का प्रकोप फैलने से पहले से ही हालात बड़ी तेज़ी से बिगड़ने लगे थे.'
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इस महामारी से न केवल तेरह करोड़ अतिरिक्त लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं. बल्कि, कोविड-19 के कारण लोगों की मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ भी पीछे खिंच रहे हैं. दुनिया की अर्थव्यवस्था इस महामारी के चलते बुरी तरह प्रभावित हुई है. अमीर हों या ग़रीब, सभी देश इससे जूझ रहे हैं. ऐसे में वो ग़रीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों के लिए पैसे से मदद नहीं कर पा रहे हैं.
जेन हॉवर्ड कहती हैं कि 1990 के दशक के मुक़ाबले आज भुखमरी और कुपोषण के समीकरण बहुत पेचीदा हो गए हैं. आज शहरों में भुखमरी की समस्या और बढ़ रही है. और, शहरों में ही कोविड-19 की महामारी का भी सबसे बुरा असर देखने को मिल रहा है.
जेन हॉवर्ड कहती हैं कि, 'अगर कोई गांव में रहता है, तो उसके पास थोड़ा बहुत खेत हो सकता है. या किसी परिजन के पास गाय या भैंस हो सकती है. इससे कुछ मदद हो जाती है. लेकिन, अगर आप शहर में रहते हैं तो बाज़ार मूल्य पर ही निर्भर रहते हैं. रिक्शेवाले, मज़दूर या इमारतों में काम करने वाले इस समय सबसे ज़्यादा मुश्किल में हैं.'
जेन हॉवर्ड के एक सहकर्मी के मुताबिक़, अफ्रीकी देश कॉन्गो में बहुत से ज़रूरी सामानों के दाम दस से बीस फ़ीसद तक बढ़ गए हैं.
बुज़ुर्गों पर सबसे ज़्यादा असर
कोविड-19 के साइड इफेक्ट से अमीर मुल्कों में लोगों की जान इसलिए भी ज़्यादा जा रही है कि बहुत से बुज़ुर्ग, इस समय अनदेखी के शिकार हो रहे हैं. न्यूयॉर्क के एक आंकड़े के मुताबिक़, कोविड-19 की महामारी फैलने के बाद से 75 साल से अधिक उम्र के बुज़ुर्गों की मौत में 811 गुना की बढ़ोत्तरी हुई है.
मगर, कम आमदनी वाले देशों में अधिकतर आबादी युवा है. जैसे कि पश्चिम अफ्रीका के नीजैर में आबादी की औसत आयु केवल 15.2 वर्ष है. और वहां पर कोरोना वायरस का प्रकोप कम ही देखने को मिला है.
जानकार कहते हैं कि कोविड-19 के प्रकोप के कारण दुनिया में मरने वालों की तादाद इस वक़्त ज़्यादा है. लेकिन, अगर आगे चल कर इसका औसत घटता है, तो ये कहा जा सकता है कि इस महामारी के चलते बुज़ुर्गों की मौत समय से कई महीने या साल पहले हो गई.
फिर, महामारी के अप्रत्यक्ष प्रभाव से अन्य कारणों से भी मौत का आंकड़ा बढ़ने का अंदेशा है.
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कोविड-19 महामारी फैलने के बाद से कैंसर की जांच में काफ़ी कमी आ गई है. सबको पता है कि कैंसर की जल्द पड़ताल से उसका इलाज बेहतर तरीक़े से होता है. लेकिन, कोविड-19 के चलते सभी स्वास्थ्य सेवाओं का ज़ोर इस समय महामारी की रोकथाम पर है. नतीजा ये कि कैंसर की आशंका होने पर भी उसकी जांच में देरी हो रही है.
ब्रिटे की संस्था कैंसर रिसर्च की निदेशक सारा हियोम कहती हैं कि, 'कैंसर इंतज़ार नहीं कर सकता. कैंसर का इलाज उतना ही आसान होता है, जितनी जल्दी उसका पता चल जाए.'
कोविड-19 महामारी से पहले ब्रिटेन में हर महीने कैंसर के 1600 मरीज़ सामने आ रहे थे. जो फ़िलहाल बंद हैं. यानी ये 1600 कैंसर मरीज़ आबादी का हिस्सा हैं, मगर उनके बारे में पता नहीं है. अगर इन लोगों का मर्ज़ जल्द पता चल जाए, तो इलाज भी आसान होता.
कैंसर के मरीज़ों के बारे में जानकारी अक्सर जनरल फ़िज़िशियन के ज़रिए सामने आती है. जो किसी संदिग्ध मरीज़ को विशेषज्ञों के पास भेजते हैं.
जानकारों का मानना है कि अकेले ब्रिटेन में समय से पता न चलने और इलाज न होने पर कैंसर के 60 हज़ार मरीज़ों की जान जा सकती है.
मंदी के चलते मेडिकल रिसर्च पर भी बुरा प्रभाव पड़ा है. ख़ास तौर से कैंसर रिसर्च के लिए मिलने वाला चंदा तो सबसे अधिक प्रभावित हुआ है.
सवाल ये है कि कोविड-19 के अप्रत्यक्ष प्रभावों या साइड इफेक्ट कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?
सारा हियोम कहती हैं कि कैंसर की जांच के कार्यक्रम को फौरन दोबारा शुरू किए जाने की ज़रूरत है.
वहीं, वर्ल्ड फूड प्रोग्राम की जेन हॉवर्ड कहती हैं कि समाज के कमज़ोर तबक़े के लोगों की मदद के लिए कई काम किए जाने चाहिए. जैसे कि स्कूल में बच्चों को जो खाना दिया जाता था, उसे उनके घर तक पहुंचाया जाए. साथ ही सामानों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सप्लाई चेन को टूटने से रोकना.
जेन हॉवर्ड का मानना है कि ऐसे छोटे छोटे क़दमों के दूरगामी नतीजे देखने को मिलते हैं. और इनकी मदद से कोविड-19 के साइड इफेक्ट कम किए जा सकते हैं.
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
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हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
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पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
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अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
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गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
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अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
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बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.