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शनिवार, 14 फ़रवरी, 2009 को 13:24 GMT तक के समाचार

प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार

साथ रहेगी बीते लम्हों की कसक

पिछले सप्ताह सर्दी की एक कँपकपाती सुबह एक जाने-पहचाने चेहरे ने जैसे अख़बार के पन्ने से मुझे घूरा. ये एक ऐसा चेहरा था, जिसका नाम अचानक स्मृतियों में उमड़ने-घुमड़ने लगा.

रेडियो कमेंटेटर के शब्दों से उसका चेहरा हमारे दिमाग़ में बैठा हुआ था. एक ठिगना खिलाड़ी जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ों को शक्तिशाली और शानदार स्ट्रोक से तहस-नहस कर देता था.

इस चेहरे ने उन स्मृतियों को भी ज़िंदा कर दिया जब भारतीय टीम की हार जैसे एक दिनचर्या बन गई था और प्रतिरोध करने वाली कोई भी पारी ये उम्मीद जगा देती थी कि हम भी एक दिन अन्य टीमों की तरह जीतेंगे.

शब्दों से खेलने वाले एलेन मैकगिलिवरे विश्वनाथ की एक चमकीली तस्वीर खींचते थे- अपने टखने पर खड़े होकर दुनिया के सबसे तेज़ गेंदबाज़ जेफ़ थॉमसन की गेंदों पर लगातार प्वाइंट की ओर कट करके सीमा रेखा के पार पहुँचाते विश्वनाथ.

मैकगिलिवरे कहते थे- यह चमत्कार है. जब भी वे ऐसा करते हैं, मैं हवा में गेंद को देखने की कोशिश करता हूँ. लेकिन गेंद बिना हवा में उठे गोली की तरह निकल जाती है. मैं सोचता हूँ, वे ऐसा कैसे करते हैं.

संतोष

भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे के क्रम में अपने ट्रांजिस्टर पर ये शब्द सुनते हुए हमें काफ़ी गर्व होता था और ऐसा महसूस होता था जैसे किसी महारथी को हमने पीट दिया हो.

टेलीविज़न युग के पहले की इन स्मृतियों से एक सुखद अनुभव होता है. ये कोई बोझ नहीं. ये संतुष्ट करने वाला अनुभव है.

बीते दिनों की इन यादों से निकलने के बाद इसका अहसास हुआ कि जिस विश्वनाथ को हम याद कर रहे हैं, उनकी बहुत छोटी सी तस्वीर खेल के पन्ने पर लगी है. वो भी इसलिए क्योंकि भारतीय क्रिकेट बोर्ड उन्हें लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दे रहा था.

उस खेल के पन्ने पर जहाँ बड़े-बड़े अक्षरों में धोनी और उनके साथी खिलाड़ियों की गाथा चल रही है और लिखा जा रहा है कि कैसे धोनी की टीम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम है.

इस बारे में कोई शक नहीं कि मौजूदा भारतीय टीम अपनी लगातार जीत से ये उम्मीद जगा रही है कि वो एक दिन हमें क्रिकेट की दुनिया के शिखर पर ले जाएगी.

सपना

ये वो सपना है, जो हमने उस समय देखा था जब विश्वनाथ अपने शानदार स्ट्रोक से ऑस्ट्रेलियाई आक्रमण की धज्जियाँ उड़ा रहे थे.

मैं ये सोच रहा था कि अगर ये ठिगना जादूगर आज के युग में खेल रहा होता, तो आने वाली पीढ़ी के पास कैसी स्मृतियाँ होती.

आजकल इतनी क्रिकेट खेली जा रही है कि हर दिन आप एक नए मैच के साथ जगते हैं. हर दिन नई-नई उपलब्धियाँ हासिल की जा रही हैं. टेलीविज़न स्क्रीन पर हर दिन नई जीत दिखाई जाती है.

इसलिए अब ये असंभव सा हो गया है कि आप गर्व और प्रसन्नता के क्षणों में कैसे अंतर करेंगे.

हो सकता है कि कुछ दिनों बाद पठान भाइयों की वो शानदार पारी और जीत के बाद उनका उछलना आप भूल जाएँ और ऐसी ही कोई अन्य तस्वीर आपके दिमाग़ में अपनी जगह बना ले.

फिर भी मुझे उम्मीद है कि मानवमात्र के डेटा बैंक में इतनी मेमोरी तो होगी ही, जिससे वे कई महान क्षणों को डिलीट नहीं करेंगे और हर दिन इसका आनंद भी लेंगे.