शनिवार, 06 दिसंबर, 2008 को 13:09 GMT तक के समाचार
प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार
आतंकवादी हमलों के ख़तरे और आर्थिक संकट के कारण दुनिया ऐसी जगह बनती जा रही है जहाँ जीना दुस्वप्न बनता जा रहा है.
ये गहरा होता संकट है जिसने अपनी सही आकार अभी नहीं लिया है. लेकिन भारत में करोड़ों लोगों के मन में जो बात है उसका अंदाज़ा खेल की दुनिया में जो हो रहा है उससे लगाया जा सकता है.
इंग्लैंड की टीम ने भले ही भारत आने का मन बना लिया हो लेकिन कोलकाता में होने वाली अंतरराष्ट्रीय स्क्वैश प्रतियोगिता रद्द कर दी गई है क्योंकि विदेशी खिलाड़ी वहाँ नहीं आना चाहते थे.
इस पर कोई आश्चर्च नहीं कीजिएगा कि खिलाड़ियों के डर के कारण कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ भारत में न कराई जाएँ.
राजनीतिक बाध्यता ऐसी है कि चरमपंथी हमलों से प्रभावित भारत ख़ुद अपनी क्रिकेट टीम पाकिस्तान नहीं भेजना चाहता है.
ख़तरा
क्रिकेट की दुनिया में जिस एशियाई प्रभुत्व की बात होती रही है और जिसके बलबूते भारत क्रिकेट की बाक़ी दुनिया से टक्कर लेने की हिम्मत करता था, वो पुरानी बात बन सकती है.
आर्थिक उछाल के कारण शहरी भारत के कुछ हिस्सों का चेहरा बदला है और उम्मीद थी कि इस बदले हुए चेहरे कारण माना जा रहा था कि विदेशी खिलाड़ियों में भारत आने का आकर्षण बना रहेगा.
लेकिन ये उम्मीद भी जाती दिख रही है. इसे खेल की दो महत्वपूर्ण ख़बरों से समझा जा सकता है. जापानी कंपनी होंडा ने फ़ॉर्मूला वन रेसिंग से अपने आप को अलग कर लिया.
तो दूसरी ओर भारत में होने वाली अकेली यूरोपीय गोल्फ़ प्रतियोगिता भी रद्द कर दी गई है. ये प्रतियोगिता इस कारण रद्द की गई क्योंकि एम्मार और एमजीएफ़ ने प्रायोजन से अपने हाथ खींच लिए और आयोजकों ने भी भारत में असुरक्षित माहौल का हवाला दिया.
ऐसी प्रतियोगिताएँ जिनमें प्रायोजकों का बहुत बड़ा पैसा नहीं लगा हुआ है, उनमें भी आर्थिक संकट और आतंकवादी हमलों के ख़तरे का असर देखा जा सकता है.
दिल्ली में राष्ट्रीय टेनिस प्रतियोगिता की ईनामी राशि 12 लाख रुपए से घटाकर चार लाख रुपए कर दी गई है.
संकट
इससे यही अंदाज़ा होता है कि कई प्रायोजक कंपनियाँ संकट में है और कई तो बंदी का संकट झेल रही हैं. इसी कारण ऐसी कंपनियाँ खेलों में अपना निवेश कम कर रही हैं.
मुंबई हमलों के कारण चैम्पियंस लीग ट्वेन्टी-20 प्रतियोगिता को स्थगित कर दिया गया. एक टीवी कंपनी ने इस प्रतियोगिता के दस साल तक प्रसारण करने का अधिकार साढ़े नौ करोड़ डॉलर में ख़रीदा था.
इस कंपनी को इस फ़ैसले का स्वागत करना ही चाहिए क्योंकि इस कंपनी को प्रमुख प्रायोजक ढूँढ़ने में मुश्किल हो रही थी. उन्हें इसका भी अंदाज़ा नहीं था कि मैचों के प्रसारण के दौरान विज्ञापन के माध्यम से वे कितना पैसा कमा सकेंगे.
फ़िलहाल जो स्थिति है, उससे तो यही लगता है कि अगले साल इंडियन प्रीमियर लीग भी प्रभावित हो सकता है. हालाँकि इस साल इसमें काफ़ी पैसा ख़र्च किया गया था.
टीमों के मालिकों को इस साल नुक़सान हुआ था लेकिन उन्होंने उम्मीद लगा रखी थी कि भविष्य में उन्हें इससे फ़ायदा होगा. क्योंकि लोगों ने इस प्रतियोगिता में बहुत रुचि दिखाई थी.
उम्मीद यही है कि अब आईपीएल में टीमों के मालिक मुट्ठी खोल कर ख़र्च नहीं करेंगे. जहाँ हज़ारों की संख्या में नौकरियों पर संकट मँडरा रहा हो, वहाँ खेलों में क्या उम्मीद हो सकती है.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)