http://www.bbcchindi.com

शनिवार, 09 अगस्त, 2008 को 13:22 GMT तक के समाचार

प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार

भारतीय टीम को रास नहीं आ रहा रेफ़रल

ओलंपिक हर चार साल बाद आता है और चला जाता है. भारत इन खेलों में इस कहावत को चरितार्थ करने के लिए हिस्सा लेता है कि ओलंपिक में खेल भावना अहम है, जीतना ज़रूरी नहीं है.

अगले एक पखवाड़े तक हम खेल के बेहतरीन लम्हों का जश्न मनाएंगे और अपने देश के खिलाड़ियों के प्रदर्शन से निराश भी होंगे. हालाँकि इस बार भारतीय एथलीटों के अच्छे प्रदर्शन की भविष्यवाणी की गई है, देखते हैं किस हद तक यह भविष्यवाणी सच होती है.

दिल में उम्मीद और होठों पर दुआ के साथ पखवाड़ा खत्म होने का इंतज़ार करें. साथ ही देश को दीवाना बनाने वाले क्रिकेट की भी बात कर लेते हैं.

भारतीय टीम ने फिर अपना वही हुनर दिखाया यानी हारना जब किसी को आशंका न हो और जीतना जब किसी को उम्मीद न हो. कुल मिलाकर बेहतर मैच पर हमारी पकड़ का कमज़ोर होना जारी रहा.

रेफ़रल सिस्टम

श्रीलंका में चल रही टेस्ट सिरीज़ में एक और नई बात देखने को मिली. ग़लत फ़ैसलों को कम से कम करने के मकसद से तकनीक का सहारा लिया गया ताकि दोनों टीमों में अंपायरों के प्रति किसी तरह की दुर्भावना पैदा न हो.

इसे रेफ़रल सिस्टम का नाम दिया गया है. जब तक तकनीक आंख की मदद कर रही है तब तक ये सिस्टम बहुत अच्छा है लेकिन अंपायर जब-जब एलबीडब्ल्यू के निर्णय को परखने के लिए तीसरे अंपायर से कहेंगे, तब-तब संदेह बना रहेगा.

रेफ़रल के अधिकतर फ़ैसले भारतीय खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ गए हैं और सुनने में आया है कि कुछ फ़ैसलों से खिलाड़ी खुश नहीं हैं.

दूसरी तरफ श्रीलंका के सामने ऐसी समस्या नहीं है. अधिकतर मामलों मे उनके कप्तान माहेला जयवर्धने उन्हीं फैसलों को चुनौती दी जिनमें ऐसा करना ज़रूरी था.

कुछ ही फ़ैसले होंगे जो भारतीय बल्लेबाज़ों के पक्ष में गए हों. मसलन वीरेंद्र सहवाग को उस गेंद पर एलबीडब्ल्यू करार दिया गया था, जो हॉक-आई की पकड़ में भी ठीक से नहीं आ सकी थी कि वो लेग स्टंप पर थी या इससे बाहर.

ख़ैर अधिकतर फ़ैसले तकनीकी सबूतों के आधार पर दिए गए और अंत में मायने भी यही रखता है.

विश्वसनीयता

अब क्योंकि अधिकतर फ़ैसले भारतीय खिलाड़ियों के खिलाफ़ गए तो ऐसे रेफ़रल सिस्टम को परखने का मापदंड नहीं इसे नहीं बनाना चाहिए कि आपको इससे कितना फ़ायदा हुआ.

अगर ऐसा होता है तो उन सुरों को मज़बूती मिलेगी जो कहते हैं कि भारतीय सिर्फ़ उन्हीं फ़ैसलों पर राज़ी होते हैं जो उनके हक़ में हों.

बेशक यह सिस्टम वक़्त के साथ बेहतर बनाया जाएगा, लेकिन अभी तक लिए गए फ़ैसलों के लिए जिस तरीके के सुबूत जुटाए गए हैं, उससे लगता है कि ये चल पाएगा.

रेफ़रल सिस्टम उन खिलाड़ियों पर दबाव बना सकता है जो बल्ले पर गेंद के हल्के छूने के बाद इस डर से पैवेलियन की ओर रवाना होने लगेंगे कि कहीं तीसरा अंपायर उनकी पोल न खोल दे.

राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर सरीखे बल्लेबाज़ निश्चित तौर पर जानते होंगे कि अंपायर ने उन्हें कई बार आउट नहीं दिया जबकि गेंद के बहुत हल्के से उनके बल्ले को छुआ था.

अब गॉल टेस्ट को ही लें. मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को पक्का यकीन था कि उन्हें एलबीडब्ल्यू ग़लत आउट दिया गया. उनका मानना था कि उन्होंने गेंद को खेला है. लेकिन रेफ़रल ने उन्हें ग़लत साबित कर दिया.

इससे सबक ये मिला कि खिलाड़ी अपने हुनर में चाहे कितना ही पारंगत हो उस पर यकीन करने के बजाय अंपायरों पर भरोसा करना ज़्यादा सही है.