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सोमवार, 04 अगस्त, 2008 को 12:53 GMT तक के समाचार

भारतीय मुक्केबाज़ों से भी हैं उम्मीदें

बीजिंग ओलंपिक में भारतीय निशानेबाज़ों के अलावा भारतीय मुक्केबाज़ भी ज़ोर आज़मा रहे हैं.

ओलंपिक में पदकों के मामले में हमेशा से पीछे रहने वाली भारतीय टीम ने इस बार मुक्केबाज़ों में भी आस्था दिखाई है.

पहली बार एक भारी भरकम टीम बीजिंग ओलंपिक में पहुँच रही है. मुक्केबाज़ों से उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि विजेंदर और अखिल कुमार ने इस साल ओलंपिक पदक विजेताओं को धूल चटाई है.

मई में ताईवान में हुई एक प्रतियोगिता में मिडिलवेट विजेंदर ने एथेंस ओलंपिक में सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज़ घोषित किए गए खिलाड़ी बख़्तियार अर्तायेव को मात दी थी.

जबकि अखिल कुमार ने एथेंस ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाले थाईलैंड के वोरापोज पेचकूम को हराया था. मुक्केबाज़ी के राष्ट्रीय कोच गुरुबख्श सिंह संधू का कहना है कि खिलाड़ी उत्साह से भरे हुए हैं.

उन्होंने कहा, "ओलंपिक पदक विजेताओं पर उनकी जीत के कारण अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें पहचान मिली है और लोग उन्हें गंभीरता से लेने लगे हैं."

ओलंपिक के इतने वर्षों के इतिहास में भारत के खाते में सिर्फ़ चार व्यक्तिगत पदक आए हैं. इनमें से कोई भी स्वर्ण पदक नहीं है.

भारत में कई प्रतिभाशाली मुक्केबाज़ हुए हैं लेकिन 1982 के बाद से भारत ने सिर्फ़ एशियाई खेल में एक स्वर्ण पदक जीता है.

उत्साह

इस बार हॉकी टीम के ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई तक ना कर पाने से भारतीय कैंप में निराशा तो है लेकिन मुक्केबाज़ों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है.

मुक्केबाज़ी फ़ेडरेशन के सचिव मुरलीधरन राजा ने बताया कि भारतीय मुक्केबाज़ों के प्रदर्शन से ये संकेत मिल रहा है कि सब कुछ सही दिशा में चल रहा है.

वर्ष 2000 में हुए सिडनी ओलंपिक में भारत मुक्केबाज़ी में पदक जीतते-जीतते रह गया था. लाइट हैविवेट ग्रुप में गुरचरण सिंह कुछ सेंकेंड के कारण सेमी फ़ाइनल में नहीं जा सके.

अगर वे सेमी फ़ाइनल में पहुँच जाते तो कम से कम कांस्य पदक तो पक्का ही हो जाता. गुरुबख्श सिंह संधू का मानना है कि उस ओलंपिक से ये तो पता चल ही गया कि पदक जीतना कोई मुश्किल बात नहीं.

विजेंदर और अखिल कुमार अपने दूसरे ओलंपिक में उतरेंगे जबकि दिनेश कुमार, अंतरेश लाकड़ा और जितेंदर कुमार पहली बार ओलंपिक में हिस्सा लेंगे.

एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने वाले और राष्ट्रमंडल खेलों के फ़ाइनल में पहुँचने वाले विजेंदर एथेंस ओलंपिक के दौरान पहले ही दौर में बाहर हो गए थे.

दूसरी ओर अखिल कुमार को काफ़ी आक्रामक मुक्केबाज़ माना जाता है. उन्होंने वर्ष 2006 के राष्ट्रमंडल खेलों में बैंटमवेट वर्ग में ख़िताब जीता था.