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शनिवार, 02 अगस्त, 2008 को 16:30 GMT तक के समाचार

प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार

देर ना हो जाए कहीं देर ना हो जाए....

तो क्या क्रिकेट कमरों के भीतर खेला जाने वाला खेल बन गया है?

चारदीवारी के भीतर लिया गया क्रिकेट प्रशासकों का फ़ैसला उन दीवानों की हसरत पर कुठाराघात है जो हैरत में डाल देने वाले शॉट देखने की इच्छा रखते हैं.

मसलन ऐसे शॉट जब गेंद पर बल्ले के प्रहार के दौरान बल्लेबाज़ का पिछला घुटना ज़मीन को चूम रहा हो. मुरलीधरन को जादुई गेंदबाज़ी करते देखना कुछ ऐसा ही सुकून देने वाला है.

अपनी कलाई से गेंद को लट्टू की तरह नचा देते हैं. इन गेंदों को सुरक्षात्मक तरीक़े से खेलते देखना या फिर बेहतरीन गेंद पर ज़ोरदार कवर ड्राइव का मज़ा कौन नहीं लेना चाहेगा.

ये वो लम्हे हैं जो सिर्फ़ और सिर्फ़ टेस्ट क्रिकेट में ही देखने को मिल सकते हैं. लेकिन दुख की बात ये है कि खेल प्रशासकों की उस खेल में कोई दिलचस्पी नहीं है जिसने उसे वाकई में मायने और पहचान दी.

वे इसे तरजीह नहीं देना चाहते. वे फटाफट क्रिकेट के नए संस्करण टी-20 के नाम पर बहस, आपसी कहा-सुनी और तू-तू-मैं-मैं में ही व्यस्त हैं.

कमाई

परंपरागत क्रिकेट का कट्टर समर्थक भी खेल को बेचने और ज़्यादा पैसा कमाने के तरीक़ों के ख़िलाफ़ नहीं है.

कुल मिलाकर हर उस क़दम का स्वागत होना चाहिए जो नए प्रशंसकों को क्रिकेट की तरफ खींचे, लेकिन इसके लिए खेल की आत्मा को ख़त्म नहीं किया जाना चाहिए.

इन दिनों हम जो देख रहे हैं वो हास्यास्पद है. और इसकी जड़ में है धन. वास्तव में ये धन पर नियंत्रण की लड़ाई है. वो धन जो टी-20 की लोकप्रियता से हासिल हो रहा है.

उम्मीद के मुताबिक़ भारत नियंत्रण की इस होड़ में सबसे आगे है और अब इंग्लैंड भी इस लड़ाई में कूद पड़ा है. भारतीय क्रिकेट बोर्ड अपना ख़ज़ाना और भरने के लिए बेताब है.

मुनाफ़ा किसी भी क़ीमत पर और इसमें खेल की सेहत की परवाह किसी को नहीं है. परवाह है तो सिर्फ़ ये कि इससे कितना पैसा खींचा जा सकता है.

बँटवारा

माइकल क्लार्क की वे बातें अब ठीक लग रही हैं, जब उन्होंने कहा था कि क्रिकेट एशियाई और ग़ैर एशियाई खिलाड़ियों को बाँटने की राह पर है. लेकिन ये बँटवारा नस्लीय आधार पर नहीं बल्कि कमर्शियल आधार पर है.

कहावत है कि जेब जिसकी भारी होती है, दुनिया पर राज भी उसका ही होता है. भारत इस कहावत पर अब बेतुके ढंग से आगे बढ़ रहा है.

आज क्रिकेट को ऐसे प्रशासक की ज़रूरत है जो खेल का भविष्य तय करे और उसका व्यवहार हर्गिज़ उस लालची व्यापारी की तरह न हो जिसका एकमात्र उद्देश्य ख़ज़ाना भरना हो.

देशभक्ति के नाम पर तो क़त्ल को भी जायज़ ठहराना आसान है, लेकिन दूर की सोचें तो इन छोटे-छोटे फ़ायदों से खेल का भला होने वाला नहीं है.

अभी से ये भविष्यवाणी करने की ज़रूरत नहीं है कि क्रिकेट ख़तरनाक राह पर बढ़ रहा है. इसमें कोई शक नहीं कि ये ज़िंदा रहेगा, लेकिन किस रूप में कोई नहीं जानता.