शनिवार, 05 जुलाई, 2008 को 10:52 GMT तक के समाचार
प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार
फिर वही सवाल. राजनीति और खेल को मिलाया जाए या नहीं और इससे किसी का भला होता है या नहीं.
मुगाबे के ज़िम्बाब्वे को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से निलंबित करने से बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने जो रुख़ अपनाया, वह समझना आसान है और उसकी व्याख्या भी आसान है.
लेकिन क्या यह उचित और न्यायसंगत है? क्रिकेट से जुड़े कई फ़ैसलों में अपनी वित्तीय शक्ति का धौंस दिखाने वाले भारत को क्या ये नहीं कहना चाहिए था कि राजनीति और खेल एक साथ नहीं चल सकते?
एक राजनीतिक सत्ता को अपने तरीक़े बदलने के लिए खेलों का बहिष्कार और प्रतिबंध लगाने की नैतिकता पर लंबे समय से लगातार बहस चल रही है लेकिन ज़्यादा समय यही होता है कि इससे कोई निष्कर्ष नहीं निकलता.
फिर भी सवाल क़ायम है. क्या हमें कठोर मुगाबे को उस बात के लिए माफ़ कर देना चाहिए, जो उन्होंने अपने देश के लिए किया है?
क्या हमें ज़िम्बाब्वे क्रिकेट के प्रमुख पीटर चिन्गोका को भी माफ़ कर देना चाहिए, जिन पर कई वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप हैं?
सच्चाई
वर्ष 2003 के विश्व कप में जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे जाने से इनकार कर दिया था और इस तरह उसे अपना मैच गँवाना पड़ा था, उस समय इंग्लैंड के कई पत्रकारों ने ज़िम्बाब्वे में होने वाले कई मैचों की रिपोर्टिंग करने से इनकार कर दिया था.
लेकिन इंग्लैंड में क्रिकेट की दुनिया में हट के काम करने वाले रॉब स्टिन किसी नतीजे की चिंता के वहाँ रहना चाहते थे. उन्होंने इस मामले पर मेरी राय पूछी थी, जो मेरे पास इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं था.
उन कई लोगों की तरह, जिन्होंने श्वेत रोडेशियाई नृशंस शासन के ख़िलाफ़ मुगाबे के संघर्ष की सराहना की थी, मैंने यही सोचा था कि पश्चिमी देश (श्वेत) प्रताड़ना और विपदा की कहानी बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे थे.
लेकिन जब मैंने भारत के एक क्रिकेट मैच के सिलसिले में कुछ दिन हरारे में बिताया तो मुझे एहसास हुआ कि जो कहा जा रहा था, वो ग़लत नहीं था.
एक सौ अमरीकी डॉलर की क़ीमत क़रीब एक लाख ज़िम्बाब्वे डॉलर थी. लेकिन वहाँ यह सब नगण्य था क्योंकि एक बार खाने में क़रीब 25 हज़ार ज़िम्बाब्वे डॉलर लगते थे.
हम हज़ारों में टिप्स देते थे लेकिन हमें इस पर आश्चर्य था कि आम आदमी कैसे अपनी जीविका चला रहा है, जिसकी औसत मासिक आमदनी सिर्फ़ 25 हज़ार डॉलर है.
यह पता लगाना भी कठिन नहीं था कि ज़्यादातर लोग वहाँ ख़ुश नहीं थे. इसमें बहुसंख्यक काले लोग भी शामिल हैं. वहाँ आपके होटल के कमरे में टेलीफ़ोन की घंटी लगातार बजती रहती थी.
फ़ोन पर महिलाओं की हताश आवाज़ सुनने को मिलती थी, जो सिर्फ़ एक अमरीकी डॉलर के लिए अपना तन बेचने के लिए तैयार थीं. मुगाबे के ख़िलाफ़ और चुनाव में धांधली की बात करने वालों की आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी जाती है.
सवाल
लेकिन हमारे लिए विश्व कप 2003 के अंतर्गत हरारे में हुआ मैच भारत के लिए 'टर्निंग प्वाइंट' था और इस सफलता में हम वहाँ रहने वाले लोगों की विपदा को भूल गए.
लेकिन क्रिक इंफ़ो पर मुकुल केसवन के विचारोत्तेजक लेख को पढ़ने के बाद मेरे दिमाग़ में फिर वह सवाल उठने लगा है. मेरी कई यादें ता़ज़ा हो गई.
मुझे यह भी समझ में आ गया कि भारत को कोई अधिकार नहीं है कि वह सिर्फ़ कुछ वोटों के कारण अपने ईमान को बेचे. ये वही भारत है जिसने रंगभेद के कारण दक्षिण अफ़्रीका के क्रिकेट खेलने पर पाबंदी लगाने की अगुआई की थी.
और तो और नेल्सन मंडेला और दक्षिण अफ़्रीका ने भी मुगाबे और वहाँ के क्रिकेट बोर्ड से मुँह मोड़ लिया है, ऐसी स्थिति में भारत को सही फ़ैसला करना चाहिए था.
अच्छे समय में भी सही फ़ैसला करना मुश्किल होता है और इस समय तो दुनिया सिर्फ़ व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए चलती है.
और ऐसी स्थिति में भारतीय बोर्ड से 'नैतिक रुख़' अपनाने की उम्मीद करना ऐसा ही है जैसे इराक़ी लोगों के ख़िलाफ़ अपराध के लिए जॉर्ज बुश अपने को फाँसी दे दें.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)