बुधवार, 09 अप्रैल, 2008 को 16:33 GMT तक के समाचार
इक़बाल अहमद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
लंदन और पेरिस में ओलंपिक मशाल के विरोध के बाद भारत में भी इसको लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है.
एक तरफ़ भारतीय ओलंपिक संघ ने कांग्रेसी नेता राहुल गाँधी और कुछ युवा सांसदों को ओलंपिक मशाल दौड़ में शामिल होने का न्यौता दिया है, वहीं पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने दौड़ में शामिल नहीं होने का फ़ैसला किया है.
किरण बेदी से पहले भारतीय फ़ुटबाल टीम के कप्तान बाइचुंग भुटिया ने भी ओलंपिक मशाल दौड़ में शामिल होने से इंकार कर दिया था.
किरण बेदी कहती हैं, "यदि हम इंडिया गेट और पूरे राजपथ को पिंजरा बनाना चाहते हैं तो मैं उस औपचारिकता में शामिल नहीं होना चाहती हूँ. ये ओलंपिक मशाल के लिए घुटन है."
उधर भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी कहते हैं, "हम सभी चाहते हैं कि मशाल रिले अच्छी तरह से संपन्न हो. लेकिन सुरक्षा देखना भी हमारी जवाबदेही है."
भारत में निर्वासन में रह रहे 'स्टूडेंट फॉर फ़्री तिब्बत' के निदेशक शोइंग कहते हैं, "अभी तक हमारा विरोध शांतिपूर्ण रहा है. लेकिन हम लोग भी इंसान हैं. थोड़ा बहुत कुछ हो सकता है. मशाल को छीना जा सकता है."
सुरक्षा बंदोबस्त
ऐसे में दिल्ली में मशाल दौड़ को शांतिपूर्वक आयोजित करने के लिए दिल्ली पुलिस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती.
भारत सरकार के लिए ये एक बड़ी चुनौती है. लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार ये सारे क़दम राजनीतिक कारणों से उठा रही है.
इतिहासकार और खेलों में गहरी रूचि रखने वाले रामचंद्र गुहा कहते हैं, "भारत के लिए स्थिति बहुत मुश्किल है. चीन हमारा पड़ोसी है. तिब्बती हमारे मेहमान हैं. सरकार समझौते की तरफ़ ध्यान रख रही है."
जनतांत्रिक तरीके से विरोध का अधिकार हर किसी को है. ऐसे में सरकार की यह जिम्मेदारी है कि सुरक्षा के नाम पर किसी का दमन न हो. साथ ही सदियों पुरानी ओलंपिक खेलों की भावना को कोई ठेस नहीं पहुँचे.