http://www.bbcchindi.com

शुक्रवार, 04 अप्रैल, 2008 को 10:13 GMT तक के समाचार

प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार

आईपीएल के साइड इफ़ेक्ट

अहमदाबाद में भारतीय टीम की हालत देखते हुए मुझे खिलाड़ी काफ़ी बेपरवाह नज़र आए.

जो आश्चर्यचकित करने वाला था. खिलाड़ी आलसी दिख रहे थे, कहीं खोए नज़र आ रहे थे और कई बार तो ऐसा लग रहा था कि उनमें उत्साह की भी कमी है.

मेरा नज़रिया ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि भारतीय टीम इतनी जल्दी और इतने कम स्कोर पर आउट हो गई. क्या वे वाकई नींद में खेल रहे थे, ये तो आने वाला समय ही बताएगा.

वैसे तो भारतीय टीम लगातार अच्छा ना खेल पाने के कारण जानी जाती है, लेकिन उस समय जब हम सभी ऐसा सोच रहे थे कि इस टीम ने एक नई ऊँचाई हासिल की है और इस टीम को हराना आसान नहीं होगा, खिलाड़ियों ने हमें अचरज में डाल दिया है.

चेन्नई में भारतीय बल्लेबाज़ी ख़ासकर वीरेंदर सहवाग का प्रदर्शन देखने के बाद किसने उम्मीद की थी कि कमोबेश वही टीम सिर्फ़ 20 ओवर ही खेल पाएगी.

सच्चाई

ये भले ही आपको अविश्वसनीय लगे लेकिन सच्चाई भले ही कितनी भी कटु क्यों न हो, हम इससे मुँह नहीं मोड़ सकते.

भारतीय टीम मोटेरा की पिच पर घास के कारण निराश थे और उन्होंने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर भी कर दी, लेकिन टीम की ख़राब बल्लेबाज़ी की सिर्फ़ यही वजह तो नहीं थी.

आप अनिल कुंबले और उनकी टीम से इस बात पर ज़रूर सहानुभूति प्रकट कर सकते हैं कि उन्हें ऐसी विकेट दी गई, जिस पर वे विदेश में खेलते हैं. भारतीय टीम की मज़बूती स्पिन आक्रमण है.

लेकिन इस टीम को घास वाली विकेट देना टीम से वो लाभ छीनना और विरोधी टीम को ज़्यादा लाभ पहुँचाना है. क्या दुनिया में कहीं भी भारतीय टीम को स्पिन विकेट देने की उम्मीद की जा सकती है? शायद नहीं.

इसलिए अनिल कुंबले की नाराज़गी जायज़ है. लेकिन इसके बावजूद भारतीय बल्लेबाज़ अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं भाग सकते. जिस तरह वे सिर्फ़ 20 ओवर में पवेलियन लौट गए, वो काफ़ी शर्मनाक था.

उत्साह कम

ये मामला हमें कहाँ ले जा रहा है. मैं ये ज़रूर कहना चाहूँगा कि शुरू में इस टेस्ट सिरीज़ को लेकर इतना कम उत्साह था कि कई लोग तो ये भी नहीं जानते थे कि भारत और दक्षिण अफ़्रीका के बीच तीन टेस्ट मैचों की सिरीज़ हो रही है.

अख़बार और न्यूज़ चैनल इंडियन प्रीमियर लीग की ख़बरों से पटे पड़े थे, जहाँ शाहरुख़ ख़ान, प्रीति ज़िंटा और अक्षय कुमार को क्रिकेटरों से ज़्यादा अहमियत दी जा रही थी.

जिस तरह आईपीएल का विज्ञापन चल रहा है, उससे तो यही लगता है कि 18 अप्रैल से भारत कोई 20-20 प्रतियोगिता नहीं बल्कि विश्व कप का आयोजन करने जा रहा है.

आईपीएल में इतना पैसा लगा है कि इसके निवेशक इसे इस धरती पर के सबसे बड़े आयोजन के रूप में पेश कर रहे हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आईपीएल की ओर आकर्षित किया जा सके.

इन सबके बीच सबसे ज़्यादा निराशा की बात ये है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड इस पर ध्यान नहीं दे रहा कि खिलाड़ियों को इस समय आईपीएल की बजाए टेस्ट सिरीज़ पर ध्यान देना चाहिए.

आवश्यकता

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि चेन्नई में हुए पहले टेस्ट के बाद खिलाड़ियों को आराम की ज़रूरत थी. क्योंकि चेन्नई में इतनी गर्मी थी कि खिलाड़ी काफ़ी परेशान रहे. साथ ही खिलाड़ियों को अपना ध्यान टेस्ट क्रिकेट पर केंद्रित रखना चाहिए था.

लेकिन इसके उलट हुआ ये कि पहले और दूसरे टेस्ट के बीच जो अंतराल था, उस दौरान खिलाड़ी आईपीएल में अपनी-अपनी टीम के विज्ञापन में उलझे रहे.

चेन्नई में तिहरा शतक लगाने वाले वीरेंदर सहवाग चेन्नई से दिल्ली आए और दिल्ली टीम के लाँच पर मौजूद रहे. गांगुली अपनी कोलकाता नाइट राइडर्स टीम के लिए शूटिंग कर रहे थे तो महेंद्र सिंह धोनी अपनी चेन्नई टीम के लिए.

दूसरी ओर दक्षिण अफ़्रीका के खिलाड़ियों ने आईपीएल की शूटिंग में हिस्सा लेने से मना कर दिया क्योंकि उनके लिए टेस्ट सिरीज़ में जीत हासिल करना ज़्यादा अहम था.

हम पहले भी कई बार इस पर चर्चा कर चुके हैं कि टेस्ट क्रिकेट की मौत नज़दीक दिख रही है लेकिन अगर टेस्ट क्रिकेट के प्रति भारत का यही रुख़ रहा तो हमें समय से पहले ही टेस्ट क्रिकेट की मौत देखनी पड़ेगी और यह वाक़ई में काफ़ी दुख की बात होगी.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)