शनिवार, 29 मार्च, 2008 को 00:26 GMT तक के समाचार
प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार
जैसे ही आप सोचते हैं कि क्रिकेट की दुनिया में शांति आ गई है, कोई न कोई विवाद सामने आ ही जाता है, ख़ासतौर से भारत में.
ऑस्ट्रेलिया में गाली गलौज और आईपीएल-आईसीएल के ख़बरों में आने के बाद अब भारत के सुनील गावस्कर परेशानी में हैं और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद(आईसीसी) चाहता है कि वो मीडिया मैन और आईसीसी की टेक्निकल कमेटी के सलाहकार में से किसी एक की ही भूमिका में रहें.
सौभाग्य से ये युद्ध भारत और बाक़ी क्रिकेट की श्वेत दुनिया के बीच नहीं हुआ. यद्यपि कई टीवी चैनलों ने इस मामले पर राष्ट्रीयता की आग भड़काने की कोशिश की थी.
मुख्य वजह
आईसीसी गावस्कर के क्यों नाखुश हैं? उनका कहना है कि खेल के बारे में टीवी और अख़बारों में आलोचना कर गावस्कर ने आईसीसी में अपनी भूमिका का उल्लंघन किया है.
गावस्कर की अंपायरों, मैच रेफ़रियों और टेस्ट मैच खेलने वाले देशों, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया पर की गई टिप्पणी के बारे में उनका कहना है कि ये हितों के बीच का झगड़ा है.
गावस्कर भारतीय दृष्टि से खेल के बड़े जानकार हैं और जब कभी भी उनके देश के साथ ग़लत किया जाता है तो वो इसे साफ़-साफ़ कह देते हैं.
वह एक महान खिलाड़ी हैं और क्रिकेट की दुनिया में उनका बहुत ही ज़्यादा सम्मान किया जाता है इसीलिए उनके वक्तव्यों से आईसीसी अजीब-सी स्थिति में है.
गावस्कर के समर्थक उन्हें पाक-साफ़ मानते हैं. उनके मुताबिक़ आईसीसी अपनी ग़लतियों और पक्षपात को ढकने के लिए महान क्रिकेटर को चुप कराना चाहता है.
और भी हैं मुद्दे
यह दलील अच्छी है. लेकिन आइए दूसरे बिंदुओं को भी देखें.
गावस्कर तकनीकी समिति के अध्यक्ष के तौर पर आईसीसी को क्रिकेट के मामलों में कई तरह के सुझाव देते हैं. हलांकि उनकी समिति का मुख्य काम केवल सलाह देना है लेकिन उनके सुझावों में इतना वज़न होता है कि आईसीसी उन्हें गंभीरता से ले.
बहुत से लोग नहीं जानते होंगे कि तकनीकी समिति, मैच रेफ़री और श्रेष्ठ अंपायरों के पैनल की नियुक्ति में और खेल के नियम तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
इस सब का मतलब है कि जब गावस्कर एक मैच रेफ़री माइक प्रॉक्टर पर टिप्पणी करते हैं या स्टीव बकनर जैसे अंपायर की आलोचना करते हैं तो वो ये भूल जाते हैं कि इन लोगों की नियुक्ति में उनकी समिति की भी भूमिका रही है.
गावस्कर से सवाल पूछा जाएगा कि क्या उन्होंने आईसीसी के साथ बंद दरवाज़े में हुई बैठक में वो सभी सवाल उठाए जिनका ज़िक्र उन्होंने मीडिया मे किया था? और क्या उन्होंने आईसीसी के उन नियमों को बदलने के लिए पर्याप्त आवाज़ उठाई जिनके तहत ऐसी नियुक्तियां हुईं?
स्पष्ट है कि अगर वो एक तरफ़ इन नियुक्तियों मे पक्ष हैं तो उन्हें आम लोगों के बीच उनकी आलोचना करने का कोई हक़ नहीं बनता.
अगर पूरे मामले को इस नज़र से देखा जाए तो यह हितों के झगड़े का मामला दिखता है और तब आईसीसी का हक़ बनता है कि वो उनसे किसी एक को चुनने को कहे. या तो वो आईसीसी का हिस्सा रहें या फिर मीडिया के हुजूम का.
एक और चीज़ जो आश्चर्यजनक लगी वो ये है कि भारतीय बोर्ड इस मामले मे पूरी तरह नियंत्रित नज़र आया. वो इस लड़ाई में नहीं कूदे जिस तरह कुछ समय पहले एक विवाद में उन्होंने किया था और तब सब कुछ ऐसा लगा था जैसे भारत और श्वेत दुनिया के बीच युद्ध हो रहा हो.
सवालों के घेरे में आईसीसी
आईसीसी से इस विषय पर काफ़ी प्रश्न पूछे जाने हैं, मुख्यतौर पर इस मामले में कि गावस्कर खेल पर टिप्पणी तो तब से करते आ रहे हैं जब से वो रिटायर हुए हैं. और जब उन्हें आईसीसी का काम सौंपा जा रहा था तब बता सकते थे कि उन्हें लेखन का काम छोड़ना होगा. उन्होंने इसके लिए ऐसा मौक़ा चुना जब गावस्कर ने उन्हें सुझाया कि वो भी ईमानदार नहीं हैं.
लेकिन यह एक तरह का दुरंगीपन है जिसके लिए आईसीसी या क्रिकेट की कोई भी दूसरी गवर्निंगबॉडी और उसी तरह भारत भी जाना जाता है. और इसीलिए लोगों की सहानुभूति हमेशा खिलाड़ियों के साथ रहती है. उस पर तब तो और भी ज़्यादा जब ये गावस्कर जैसे नाम के साथ हो.
लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि हमें इस मामले की वजहों को छोड़ देना चाहिए, आईसीसी और गावस्कर को अपनी लड़ाई लड़ने दें.
हमें एक राष्ट्र के तौर पर इस झगड़े में नहीं पड़ना चाहिए और इसे राष्ट्रीय गर्व और देश के साथ ग़लत हो रहा है जैसा मुद्दा नहीं बनाना चाहिए.