मंगलवार, 13 नवंबर, 2007 को 23:29 GMT तक के समाचार
एकदिवसीय मैचों में उपयोग में लाई जाने वाली सफ़ेद गेंदों की जगह जल्दी ही गुलाबी गेंदें ले सकती हैं, बशर्ते कि वे ज़्यादा टिकाऊ साबित हो जाएँ.
फ़्लोरोसेंट गुलाबी रंग की ये गेंदे वर्ष 2009 से वनडे क्रिकेट काउंटी में उपयोग में लाई जा सकती हैं और फिर अंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय मैचों में भी.
चूंकि लाल रंगों वाली गेंदें ज़्यादा टिकाऊ होती हैं इसलिए इस बात की संभावना नहीं है कि चार दिवसीय काउंटी मैचों में और टेस्ट क्रिकेट में गुलाबी गेंदों के उपयोग के बारे में विचार किया जाए.
क्रिकेट के नियम बनाने वाले एमसीसी के प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा, "यह गुणवत्ता का मामला है क्योंकि हम जानते हैं कि सफ़ेद गेंदें 50 ओवरों तक नहीं टिकतीं."
इसके अलावा गेंद के दिखाई देने का सवाल भी है क्योंकि ख़ास क़िस्म की रोशनी के बीच सफ़ेद गेंदों को देखना बेहद कठिन होता है.
गुलाबी गेंदों का प्रयोग लॉर्ड्स में नेट प्रैक्टिस के लिए और ऑस्ट्रेलिया में महिला क्रिकेट में शुरु किया जाएगा.
2008 की गर्मियों में इसका प्रयोग काउंटी मैचों में और यूनिवर्सिटी मैचों में किया जाएगा.
टिकाऊ होने की शर्त
एमसीसी के क्रिकेट विभाग के प्रमुख जॉन स्टीफ़ेंसन का कहना है, "सफ़ेद गेंदों का रंग उधड़ने लगता है. चुनौती यह है कि ऐसी गेंद तैयार की जाए जिसका रंग न निकले."
"यदि सफ़ेद रंग काम नहीं कर रहा है तो दूसरे रंगों पर प्रयोग करके देखना चाहिए और गुलाबी प्रयोग करने के लिए अच्छा रंग है."
उनका कहना था, "मैं चाहूँगा कि गुलाबी गेंदों का उपयोग पहले 2009 में ट्वेंटी-20 में हो और फिर अंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय मैचों में."
उनका कहना है कि सारा दारोमदार अब इस बात पर होगा कि इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) इसके बारे में क्या कहता है.
ईसीबी के प्रबंध निदेशक माइक गेटिंग कहते हैं, "हमने सफ़ेद और फिर नारंगी रंग की गेंदों को आजमाकर देखा है, शायद गुलाबी रंग की गेंदें ज़्यादा टिकाऊ हो. यह बहुत दिलचस्प और समझदारी वाला बदलाव है."
इस समय टेस्ट मैचों और प्रथम श्रेणी के क्रिकेट मैचों में उपयोग में आने वाली लाल गेंदें 80 ओवरों तक चल जाती हैं.
हालांकि एकदिवसीय मैचों में अब अधिकतम 34 ओवरों के बाद गेंद बदलने का नियम लागू कर दिया गया है क्योंकि इसके बाद गेंद पर से टाइटेनियम डायऑक्साइड का रंग छूटने लगता है.
ऑस्ट्रेलिया की कूकाबूरा कंपनी जो सफ़ेद गेंदें बनाती है वही अब प्रयोगों के लिए गुलाबी गेंदें भी बना रही है.
इस प्रयोग का समर्थन करते हुए इंग्लैंड के पूर्व गेंदबाज़ और यॉर्कशर के कप्तान डैरेन गॉग का कहना है कि गेंद बदलने से बल्लेबाज़ का ही फ़ायदा होता है.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "इससे बुरा क्या हो सकता है कि पुरानी गेंद ठीक उसी समय बदल दी जाती है जब आप लय और ताल में होते हैं और फिर नई गेंद की हर सिरे से धुनाई होने लगती है."
वे कहते हैं कि जब उन्होंने खेलना शुरु किया था तब अगर कोई कहता कि गुलाबी गेंद से खेलो तो वे इनकार कर देते लेकिन अब वे इसके लिए तैयार हैं.