सोमवार, 08 अक्तूबर, 2007 को 14:36 GMT तक के समाचार
पंकज प्रियदर्शी
बीबीसी संवाददाता
भारतीय टीम ने आख़िरकार इस सिरीज़ में ऑस्ट्रेलिया को मात दे ही दी. भले ही जीत का अंतर आठ रन का रहा हो लेकिन इस जीत से भारतीय कैंप में उत्साह की लहर दौड़ेगी- इसमें कोई शक नहीं.
ट्वेन्टी 20 विश्व कप के बाद 50 ओवरों के मैच में टीम नहीं चल पा रही थी और एक बार फिर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया था. मीडिया में बहस भी शुरू हो गई थी. ख़ास निशाने पर थे सीनियर्स यानी सचिन, सौरभ और द्रविड़ की तिकड़ी.
एकबारगी तो लगने लगा था कि देश के क्रिकेट प्रेमियों की मनोदशा 50 ओवरों के विश्व कप के बाद जैसी हो गई है. बस पुतले जलने बाक़ी थे. आग में घी का काम किया प्रमुख चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर का वो बयान, जिसमें उन्होंने भी अपना ग़ुस्सा सीनियर खिलाड़ियों पर निकाला.
तीनों को निकालने की बात शुरू हो गई तो संन्यास लेने की भी मांग होने लगी. किसी ने ये नहीं सोचा कि ट्वेन्टी 20 विश्व कप अलग है और 50 ओवरों का मैच अलग.
मीडिया और जनता में शुरू हुए मुक़दमे में ये तीनों सितारे गुनाहगार बना दिए गए और एक बार फिर उनकी पिछली कई यादगार पारियों की हवा निकालकर उन पर आँखें तिरछी की जाने लगी.
अब भारत ने चंडीगढ़ में 50 ओवरों के चैम्पियन ऑस्ट्रेलिया को धूल चटा दी है. देखा जाए तो इस जीत की बुनियाद दो ऐसे खिलाड़ियों ने रखी जिन पर सबसे ज़्यादा सवाल उठे थे.
सचिन तेंदुलकर और सौरभ गांगुली की जोड़ी ने भारत को धीमा लेकिन अच्छी शुरुआत दी. सचिन भी शुरू में दबाव में दिखे लेकिन उन्होंने संघर्ष करना जारी रखा. संघर्ष विकेट पर टिकने का, संघर्ष आलोचकों को जवाब देने का.
भारत जैसे देश में क्रिकेट प्रेमियों का ग़ुस्सा मीडिया के ज़रिए खिलाड़ियों तक तो पहुँचता है ही उन्हें ऐसे दबाव में डाल देता है, जैसा दबाव किसी अन्य देश के खिलाड़ी शायद ही महसूस करे.
ख़ैर सचिन और सौरभ ने पहले विकेट के लिए 91 रन जोड़े. एक अच्छी नींव बनाई जिस पर शानदार इमारत खड़ी हुई. धोनी और उथप्पा उस समय आए जब भारत के लिए अच्छी शुरुआत हो चुकी थी और विकेट भी काफ़ी बचे हुए थे.
उन्होंने उस स्थिति का लाभ उठाया और भारत 291 का बड़ा और सम्मानजनक स्कोर खड़ा कर सका. भारत जीत गया. इस जीत के साथ भले ही इन वरिष्ठ खिलाड़ियों पर सवाल फ़िलहाल टल गए हो.
लेकिन इतना तो तय है कि हर बार हार के लिए नया बहाना और कारण ढूँढ़ने की तलाश में आजकल ये सितारे आसानी से निशाने पर आ रहे हैं. ये भारतीय क्रिकेट के लिए शुभ संकेत नहीं.
ख़ासकर वैसी स्थिति में जब इन तीनों की अनुपस्थिति में टीम में अनुभवी खिलाड़ियों की कमी साफ़ दिखती है. सचिन, सौरभ और द्रविड़ समझदार खिलाड़ी हैं. उन्हें पता है उन्हें कब संन्यास लेना है, कब युवा खिलाड़ियों के लिए रास्ता साफ़ करना है.
वैसे भी देखा जाए तो पिछले चार मैचों में दो या तीन अनुभवी खिलाड़ियों को छोड़कर बाक़ी तो वही खिलाड़ी थे, जिसे युवा खिलाड़ी कहा जा रहा है और जिन्होंने ट्वेन्टी 20 विश्व कप में जीत दिलाई थी.
दरअसल जीत के जोश में जब भी हार का वार होता है, टीम परेशान होती है, असंतुलित दिखने लगती है और दबाव में आ जाती है. भारतीय खिलाड़ियों ने इसे महसूस किया है. वैसे उनके सामने ऑस्ट्रेलिया जैसी चैम्पियन टीम है, कोई ऐरा-गैरा नहीं.
इसलिए भारतीय क्रिकेट को बुलंदियों पर पहुँचाने वाले सितारों के प्रति जल्दबाज़ी में कुछ कहना ग़लत होगा. चंडीगढ़ वनडे ने साबित किया है कि भारतीय टीम को अनुभवी खिलाड़ियों की क्यों ज़रूरत है.