मंगलवार, 18 सितंबर, 2007 को 11:22 GMT तक के समाचार
चंचल भट्टाचार्य,
धोनी के पूर्व कोच
धोनी की अंतिम समय तक संघर्ष करने की आदत कप्तान के रुप में उसके लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित हो सकती है.
धोनी में कप्तानी के बहुत अधिक गुण नहीं है लेकिन टीम में खेलने की उनकी क्षमता और प्रतिबद्धता उन्हें दूर तक ले जाएगी.
उसका एक स्टाइल है करना है तो करना है.. बस यही बात उसे सबसे अलग करती है. वो तनाव नहीं लेता जैसा कि आपने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच में देखा. वो अंतिम समय तक फाइट करता है.
एक बार हमारी टीम हार गई तो मैंने सभी को सज़ा दी कि मैदान में दौड़ लगाओ. कई खिलाड़ियों ने मना कर दिया लेकिन धोनी सीनियर होने के बाद भी दौड़ने और सज़ा भुगतने को तैयार थे.
वो प्रतिबद्ध खिलाड़ी है.
वैसे ऑस्ट्रेलिया के साथ धोनी की परीक्षा होगी क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के साथ मैच कोई आठवीं या सातवीं की परीक्षा नहीं है. ये बोर्ड परीक्षा जैसा है.
मुझे लगता है कि धोनी अच्छा कर जाएगा.
जहां तक धोनी के तकनीक की आलोचना होती है और लोग कहते हैं उनके पास बल्लेबाज़ी और कीपिंग की तकनीक नहीं है मैं तो यही कहूंगा कि अब फ़टाफ़ट क्रिकेट में इसके कोई मायने नहीं है.
वनडे में अभ ट्वेंटी ट्वेंटी जैसे ही खेल होगा. पावर प्ले है और उसमें धोनी का कोई तोड़ नहीं है. इसमें तकनीक से बहुत अधिक फ़र्क पड़ने वाला नहीं है. यहां तो चौका छक्का मारना है. कैसे भी मार लो.
मेरे हिसाब से धोनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती तीन कप्तानों के साथ खेलने की होगी. सचिन, सौरभ और द्रविड़ को लीड करना आसान काम नहीं होगा.
उसे सबको लेकर चलना होगा और यही उसके लिए सबसे बड़े दबाव की वजह बन सकता है..
अगर वो दिमाग ठंडा रखे और बोर्ड का समर्थन मिले तो वो अच्छा कर सकता है.
धोनी के साथ काम कर चुका हूं पहले और मैं तो उसे बधाई दूंगा और यही कहूंगा कि वो अपना गेम खेले, देश के लिए खेले और टीम को लेकर आगे बढ़े.
बीबीसी संवाददाता सुशील झा से बातचीत पर आधारित