रविवार, 19 अगस्त, 2007 को 12:27 GMT तक के समाचार
नौरिस प्रीतम
खेल पत्रकार
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार खिलाड़ियों को उनकी प्रतिभा और सम्मान के लिए दिए जाते हैं. लेकिन भारत में जब भी अर्जुन पुरस्कारों की बात होती है तो महाभारत छिड़ जाती है.
अर्जुन के तीर ने तो सीधे मछली की आँखों को भेदा था लेकिन खेल मंत्रालय और खेल संघों के तीर अक्सर निशाने से हटकर होनहार खिलाड़ियों को घायल कर देते हैं और कम योग्य खिलाड़ियों को भी पुरस्कार मिल जाता है.
हालाँकि पिछले साल की तरह इस बार भी इन पुरस्कारों को लेकर कोई बड़ा विवाद तो नहीं छिड़ा लेकिन फिर भी राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार को लेकर कुछ सवालिया निशान अब भी बरकरार हैं.
क्रिकेट को धर्म का दर्ज़ा देने वाले देश में कप्तान राहुल द्रविड का नाम पिछले साल के बाद इस साल भी इस पुरस्कार के लिए उछला था.
लेकिन कपिल देव की अध्यक्षता वाली समिति ने द्रवि़ड की जगह ट्रैप शूटिंग के विश्व चैंपियन मानवजीत सिंह को इस पुरस्कार के लिए चुनकर सबको अचंभे में डाल दिया.
सिडनी ओलंपिक में काँस्य पदक जीतने वाली कर्णम मल्लेश्वरी भी इस पुरस्कार चयन समिति की एक सदस्य थीं.
'फ़ैसला सही'
मल्लेश्वरी मानवजीत के चयन को सही ठहराते हुए कहती हैं, “इसके लिए हमें तीन वर्षों का प्रदर्शन देखना था. प्रदर्शन के हिसाब से निशानेबाज़ मानवजीत सिंह का हक़ बनता था.”
द्रविड़ को खेल रत्न भले ही न मिला हो लेकिन महिला क्रिकेट खिलाड़ी अंजुम चोपड़ा को अर्जुन पुरस्कार ज़रूर मिला.
लेकिन अंजुम ने कहा कि उन्हें अपने नाम की आधिकारिक सूचना अभी तक नहीं मिली. हालाँकि पुरस्कारों की घोषणा नौ अगस्त को हुई थी.
अंजुम चोपड़ा ने राहुल द्रविड़ का चयन न होने पर कहा, "मैं इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं कर सकती. ये मेरा निर्णय नहीं है. यह समिति का निर्णय है कि पुरस्कार किसे दिया जाए और किसे न दिया जाए. मेरा सोचना है कि समिति को जो ठीक लगा उसने वही किया."
क्रिकेट की मारामारी में महिला पहलवान अलका तोमर की आवाज़ उनके अखाड़े तक ही दबकर रह गई.
हालाँकि अलका ने पिछले वर्ष विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक जीता था. लेकिन चयन समिति ने उन्हें अर्जुन पुरस्कार के योग्य ही नहीं समझा.
अलका ने इस बारे में राष्ट्रपति से गुहार भी की. लेकिन उन्हें अपनी इस कोशिश से भी उम्मीद कम ही है.
अलका तोमर कहती हैं, “मैं तो यही कहूँगी कि चयन में भी राजनीति होती है. मेरे तो मेडल्स भी ज़्यादा थे. इस बार मुझे अर्जुन पुरस्कार मिलना ही चाहिए था. शायद कमी यह रह गई कि मेरी सिफ़ारिश नहीं थी. मेरा काम मेहनत करना था वो मैंने किया और मेडल जीता."
वो आगे कहती हैं, "मेरा चयन नहीं होने पर मैं बहुत नाराज़ हूँ. मैंने राष्ट्रपति के पास चिठ्ठी भी भेजी लेकिन उनके पास तक चिठ्ठी कहाँ पहुँचने वाली है. अब कुछ नहीं हो सकता है.”
मेहनत का फल
लेकिन दोहा एशियाई खेलों में तिरंगा लेकर भारतीय दल का नेतृत्व करने वाली पूर्व हॉकी कप्तान ज्योति कुल्लू का हाल अलका तोमर से तो बेहतर ही है.
ज्योति कहती हैं, “वैसे तो सभी जानते हैं कि मुझे पुरस्कार देर से ही मिला है. फिर भी मैं खुश हूँ कि मुझे मेहनत का फल मिल गया.”
लेकिन जब ये पुरस्कार सही वक़्त पर मिल जाए तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता और जब खिलाड़ी को नकद पुरस्कार राशि मिलती है तो वह किसी भविष्य निधि से कम नहीं होती.
इस वर्ष अर्जुन पुरस्कार पाने वाले मुक्केबाज़ विजयेंद्र कहते हैं, "पुरस्कार के लिए चयन होने से मैं बहुत ख़ुश हूँ. मुझे इतनी कम उम्र में पुरस्कार मिला इससे मेरी खुशी और भी बढ़ जाती है. मेरा एक सपना पूरा हो गया. मेरे कोई ज़्यादा बड़े शौक भी नहीं हैं. मैं इस राशि को बेहतर भविष्य के लिए निवेश करूँगा."
सही उम्र में सम्मान और उसके साथ कुछ पैसा और क्या चाहिए किसी भारतीय खिलाड़ी को. ख़ासतौर से तब जब वह क्रिकेट का खिलाड़ी न हो.
विश्व चैंपियन निशानेबाज़ मानवजीत सिंह कहते हैं, "नकद राशि किसी भी खिलाड़ी का हौसला बढ़ाती है. आजकल खेलों में इतनी व्यावसायिकता बढ़ गई है कि किसी भी खिलाड़ी को अपना पूरा समय खेल के लिए ही देना पड़ता है. ऐसा नहीं हो सकता कि कोई खिलाड़ी साथ में कुछ और काम कर सके."
पदक बेचकर पेट पालने वाले भारत के खेल रत्नों की अनेक कहानियाँ अब भी पुरानी नहीं पड़ी हैं. लेकिन पुरस्कार राशि केवल योग्य खिलाड़ियों की ही जेब में जाए ऐसा भारत की खेल दुनिया में अब भी संभव नहीं हो पाया है.