रविवार, 15 जुलाई, 2007 को 10:49 GMT तक के समाचार
मलय नीरव
दिल्ली से
भारोत्तोलकों के डोपिंग में पकड़े जाने और प्रतिबंध की मार झेलने के बावजूद आख़िरकार भारतीय भारोत्तोलन महासंघ कोई सख़्त क़दम क्यों नहीं उठात, ये सवाल कई बार उठा है.
वज़न उठाकर तमगे जीतने की तमन्ना वजनदारों को भी धूल में मिला ले गई.
भारोत्तोलकों और उनकी देखरेख और उनके खेल को बढ़ावा देने के लिए बने महासंघ पर भी प्रतिबंध लग चुका है, लेकिन भारोत्तोलकों ने प्रतिबंधित दवाओं के सेवन का रास्ता नहीं छोड़ा.
इस साल फ़रवरी में गुवाहाटी में हुए राष्ट्रीय खेलों से पहले भारतीय ओलंपिक संघ यानी आईओए ने दावे के साथ कहा था कि खेल डोप-फ्री होंगे, लेकिन ये हो न सका.
बेबस अफ़सर
आईओए के महासचिव रणधीर सिंह बड़े ही दुखी मन से और शर्मिंदगी छुपाने की कोशिश किए बिना कहते हैं, ‘‘राष्ट्रीय खेल में नौ टेस्ट पॉज़ीटिव हुए. सतीश राय तो दूसरी बार डोप में फँसे हैं और विश्व डोपिंगरोधी एजेंसी (वाडा) के नियमों के तहत उन पर आजीवन प्रतिबंध की तलवार लटकी है. बड़े दुख की बात है कि अगर हमारे शीर्ष खिलाड़ी ही डोपिंग में फँसते चले गए तो फिर हिंदुस्तान के लिए कौन खेलेगा.’’
सतीश इससे पहले, मैनचेस्टर में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भी डोपिंग में पकड़े गए थे.
भारतीय भारोत्तोलन महासंघ के सचिव बलवीर भाटिया के कहते हैं, ‘‘ इसे हमारी बदकिस्मती कहा जा सकता है. घर में भले ही एक ही बच्चा नालायक हो, लेकिन बदनामी तो घर की ही होती है. अब इतने अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने वाले सतीश राय जैसे वरिष्ठ खिलाड़ी ही जब जाने-अनजाने गलती करेंगे तो औरों की क्या कहें.’’
सख़्ती ज़रूरी
लेकिन यहाँ तो एक नहीं अनेक भारोत्तोलक एक के बाद एक डोपिंग में पकड़े जा रहे हैं फिर महासंघ सख़्त क़दम क्यों नहीं उठा पाया है?
बलवीर भाटिया कहते हैं, ‘‘जहाँ तक क़दमों का सवाल है, इनमें कोई किसी तरह की कमी नहीं है. हम खिलाड़ियों को चेताते हैं, उन पर जुर्माना और प्रतिबंध भी लगाते हैं. इसके अलावा मुझे समझ नहीं आता कि हम क्या करें.”
वे कहते हैं, “समस्या यह है कि बदकिस्मती से जो खिलाड़ी भारोत्तोलन में आते हैं वो बहुत पढ़े-लिखे नहीं होते. वे किसी भी नीम हकीम की सलाह मान लेते हैं.’’
पूरे देश को शर्मसार कर देने वाली इन ग़लतियों को सिर्फ़ बदकिस्मती बता देना ही काफ़ी नहीं हैं.
अपर्याप्त क़दम
दरअसल, प्रतिबंधित दवाओं के इस्तेमाल को रोकने के लिए समुचित क़दम नहीं उठाए गए हैं.
ऑल इंडिया एमोच्योर एथलेटिक फेडरेशन के सचिव ललित भनोट कहते हैं, ‘‘यह चोर- सिपाही की कहानी है. खिलाड़ी प्रदर्शन सुधारने के लिए इन दवाओं की तरफ ललचाते हैं. कड़ाई करने या उनको शिक्षित करने से इन मामलों में कमी तो आ सकती है, लेकिन इन्हें पूरी तरह से रोक पाना काफ़ी कठिन है.’’
पर जिस देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक भी डोप टेस्ट प्रयोगशाला नहीं हो, वहाँ किस्मत का सहारा लेना, इसे कोसना या फिर निराशा के सागर में गोते लगाते रहना कोई हैरानी की बात नहीं है.
डोप जाँच प्रयोगशाला के वादे वर्षों से किए जा रहे हैं. आईओए के महासचिव रणधीर सिंह कहते हैं, ‘‘प्रयोगशाला अंतिम चरण में है और सालभर में तैयार हो जानी चाहिए. एक बार प्रयोगशाला बन जाने पर खिलाड़ियों पर दवाब रहेगा कि उन सबकी जाँच होगी और दोषी होने पर वे पकड़े जाएँगे.’’
ज़िम्मेदार कौन
इसमें दो राय नहीं कि डोपिंग में पकड़े जाने की पूरी ज़िम्मेदारी खिलाड़ियों पर ही है.
पूर्व विश्व चैंपियन और खुद डोपिंग में पकड़ी जा चुकी कुंजुरानी देवी कहती हैं, ‘‘खिलाड़ी के साथ तो कभी भी, कुछ भी हादसा हो सकता है. फिर भी सतीश राय जैसे वरिष्ठ खिलाड़ियों को ख़ुद को सुधारना चाहिए. अगर वो गलत काम करेंगे तो उनके साथ-साथ देश की भी बदनामी होगी.’’
कोई कुछ नहीं कर सकता. खिलाड़ी को ख़ुद ही देखना होगा कि वो डोपिंग में न फँसे.
पर पदक पाने की होड़ और इससे जुड़ी रोटी, नौकरी के चक्कर में खिलाड़ी अपनी और मुल्क की इज़्ज़त के बारे में नहीं सोचता.
और जब उस पर निगरानी रखने वाले ही ख़ुद को बेसहारा महसूस कर रहे हों तो इस सवाल का जवाब तो शायद वक़्त भी नहीं दे पाएगा.