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बुधवार, 04 जुलाई, 2007 को 23:42 GMT तक के समाचार

पंकज प्रियदर्शी
बीबीसी संवाददाता, विंबलडन से

साथ-साथ हैं सानिया और भूपति

विंबलडन के नौवें दिन आख़िरकार महेश भूपति को कोर्ट पर उतरने का मौक़ा मिल ही गया. लेकिन उनकी परेशानी साफ़ दिख रही थी. कोर्ट पर शुरू में उन पर दबाव देखा जा सकता था.

वो तो धन्य हो सानिया मिर्ज़ा का, जिन्होंने उनका मनोबल बढ़ाए रखा. हालाँकि बाद में भूपति अपने फ़ॉर्म में आए और अच्छा खेल भी दिखाया.

ग्रैंड स्लैम में पहली बार दोनों साथ खेल रहे हैं. उनसे उम्मीदें भी हैं. इस मैच में दोनों का हौसला बढ़ाने के लिए उनका पूरा परिवार मौजूद था.

वैसे तो सानिया के हर मैच में उनका पूरा परिवार जमा रहता है. लेकिन इस बार महेश भूपति का परिवार भी पूरे मैच के दौरान मौजूद रहा और पूरे पारिवारिक माहौल में दोनों ने निराश भी नहीं किया.

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शहार पीयर या मोनिका सेलेस

भारत का सानिया मिर्ज़ा और शहार पीयर की जोड़ी जब अपना डबल्स मैच खेलने को उतरी तो उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें पहले सेट में इतनी शर्मनाक हार देखने को मिलेगी.

पहला सेट 6-0 से हारने के बाद दूसरे सेट में दोनों ने अच्छी वापसी की. लेकिन तालमेल का अभाव साफ़ दिख रहा था. दोनों डबल फ़ॉल्ट कर रही थीं और सर्विस में भी उतनी जान नहीं थी.

लेकिन इन सबके बीच सानिया से ज़्यादा हताश और परेशान दिख रही थी शहार पीयर. उन्होंने कई बार रैकेट उठा कर पटका. यहाँ तक को सही है लेकिन बाद में उन्होंने चिल्लाना शुरू किया.

ख़राब शॉट पर चिल्लाने के अलावा वे शॉट मारने के क्रम में भी चिल्लाने लगीं. वहाँ मौजूद लोगों में से किसी ने फुसफुसा कर कहा- ये तो शहार सेलेस हो गई हैं. आप समझे ना. उस सज्जन ने उनकी तुलना मोनिका सेलेस से की, जो कोर्ट पर बहुत चिल्लाती थी.

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फ़िलहाल वीनस हैं बेहतर

वीनस और सरीना में कौन बेहतर है. ये सवाल कुछ वर्षों पहले पूछा जाता- तो निश्चित रूप से जवाब होता सरीना विलियम्स. हालाँकि ये भी सच है कि एक दौर में वीनस का टेनिस कोर्ट पर राज होता था.

इस विंबलडन में जानकारों का आकलन था कि सरीना ख़िताब की प्रबल दावेदार हैं. सरीना को भी अपने आप पर काफ़ी भरोसा था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, जहाँ सरीना हार कर बाहर हो गईं.

वहीं, वीनस अभी जमी हुई हैं और वो भी रूस का मारिया शरापोवा को हराकर. शरापोवा को विंबलडन में दूसरी वरीयता मिली हुई है.

ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि वीनस कहाँ तक जाती हैं. लेकिन फ़िलहाल उन्होंने सरीना को तो पीछे छोड़ ही दिया है.

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पेस की लोकप्रियता

लिएंडर पेस मैदान पर जोश तो दिखाते ही हैं. मैदान के बाहर का व्यवहार भी उन्हें काफ़ी लोकप्रियता दिलाता है. ये अलग बात है कि अगर आपको उनका इंटरव्यू करना है, तो वे आपको बहुत इंतज़ार करवाते हैं.

ख़ैर ये तो अलग बात है. जो बात मायने रखती है वो है लोगों में लिएंडर का क्रेज़. मैच जीतने के बाद लिएंडर जितना समय अपने प्रशंसकों में बिताते हैं- शायद ही कोई खिलाड़ी प्रशंसकों को इतना समय देता है.

प्रशंसकों से मिलना, उन्हें ऑटोग्राफ़ देना, उनके साथ फोटो खिंचवाना- सब कुछ इतना सहज भाव से होता है कि पूछिए मत. कोई हल्ला-गुल्ला नहीं. कोई भाग-दौड़ नहीं.

और तो और कोर्ट पर मौजूद बॉल ब्वॉय, बॉल गर्ल और अंपायरों से जाकर मिलना और उनका हालचाल पूछना- पेस की आदत है. यूँ ही विंबलडन में पेस को इतनी लोकप्रियता नहीं है.