रविवार, 10 जून, 2007 को 13:36 GMT तक के समाचार
पंकज प्रियदर्शी
बीबीसी संवाददाता, लंदन
तमाम उठापटक और कई दौर की चर्चाओं के बाद दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड में से एक, भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने ग्राहम फ़ोर्ड को ग्रेग चैपल का उत्तराधिकारी नियुक्त किया है.
दक्षिण अफ़्रीका के ग्राहम फ़ोर्ड अपनी राष्ट्रीय टीम के कोच रह चुके हैं लेकिन चैपल के जाने के बाद कोच के दावेदारों में उनका नाम आख़िर में ही आया जब बीसीसीआई ने उनसे संपर्क किया.
विश्व कप क्रिकेट में भारतीय टीम की दुर्दशा के बाद फ़ोर्ड को टीम का कोच नियुक्त किया गया है.
ज़ाहिर है, उनके लिए काम आसान नहीं होगा. उनकी पहली चुनौती होगी इंग्लैंड का दौरा. जो इस महीने के आख़िर में शुरू होगा.
जोंटी रोड्स, शॉन पोलक, लांस क्लूज़नर और हैंसी क्रोनिए जैसे क्रिकेटरों के साथ काम कर चुके ग्राहम फ़ोर्ड की एक ऑलराउंडर वाली छवि है.
क्रिकेट के अलावा वे प्रांतीय स्तर पर टेनिस के चैम्पियन रह चुके हैं, फ़ुटबॉल भी खेल चुके हैं और रग्बी यूनियन के तो बाक़ायदा रेफ़री की योग्यता रखते हैं.
करियर
इतना सब कुछ होने के बावजूद क्रिकेटर के रूप में ग्राहम फ़ोर्ड का करियर न तो बहुत ज़्यादा लंबा रहा है और न ही उतना आकर्षक रहा है.
उन्होंने नटाल बी की ओर से सिर्फ़ सात प्रथम श्रेणी मैच खेले. और इन सात मैचों में उनका सर्वाधिक स्कोर रहा सिर्फ 43 और औसत भी सिर्फ़ 13.50 का ही रहा.
लेकिन क्रिकेटर न सही क्रिकेट कोच के रूप में फ़ोर्ड ने जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ीं. क्रिकेट करियर की समाप्ति के बाद फ़ोर्ड को स्पोर्ट्स यूनियन ऑफ़िसर की नौकरी मिली नटाल यूनिवर्सिटी में.
इस पद पर रहते हुए फ़ोर्ड ने अपनी काबिलियत दिखाई और वे वर्ष 1992 में नटाल के कोच बन गए. वर्ष 1994-95 और 1996-97 में नटाल की सफलता के पीछे फ़ोर्ड का बहुत बड़ा हाथ था.
राष्ट्रीय कोच
नटाल में रहते हुए फ़ोर्ड ने शॉन पोलक, जोंटी रोड्स, लांस क्लूज़नर, बेन्केसटाइन जैसे खिलाड़ियों की प्रतिभा को सँवारा. अब वो दिन ज़्यादा दूर नहीं था जब राष्ट्रीय स्तर पर फ़ोर्ड के काम को पहचान मिलती.
वर्ष 1998 में उन्हें श्रीलंका के दौरे के लिए अंडर-24 टीम को कोच नियुक्त किया गया और कुछ महीनों बाद ही उन्हें राष्ट्रीय कोच बॉब वूल्मर के सहायक कोच का पद मिल गया.
1999 के विश्व कप के बाद बॉब वूल्मर कोच पद से हटे तो सबकी पसंद थे ग्राहम फ़ोर्ड.
तत्कालीन कप्तान हैंसी क्रोनिए के साथ मिलकर फ़ोर्ड ने दक्षिण अफ़्रीका की टीम को उन ऊँचाइयों पर पहुँचाया, जहाँ से दक्षिण अफ़्रीका ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपना दमख़म दिखाया.
लेकिन ये वो दौर था, जब मैच फ़िक्सिंग की काली छाया धीरे-धीरे दक्षिण अफ़्रीका की टीम पर हावी हो रही थी.
प्रभाव
फिर वो दिन भी आया जब क्रोनिए ने मैच फ़िक्सिंग में अपनी भूमिका स्वीकार करके क्रिकेट की दुनिया को सकते में ला दिया.
क्रोनिए की क्रिकेट से छुट्टी हो गई, लेकिन फ़ोर्ड अपने पद पर बने रहे. शॉन पोलक को कप्तानी मिली लेकिन फ़ोर्ड उनके साथ तालमेल नहीं बना सके. ऑस्ट्रेलिया में टीम की हार के बाद 2002 में फ़ोर्ड को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.
वर्ष 2004 में फ़ोर्ड केंट काउंटी क्लब से जुड़े और उन्होंने क्लब से जुड़े अधिकारियों और खिलाड़ियों को अपने काम से काफ़ी प्रभावित किया. इनमें कई भारतीय खिलाड़ी भी थे.
भारतीय खिलाड़ियों में उनका प्रभाव बहुत काम आया जब बीसीसीआई ने उन्हें एक कठिन दौर में टीम का कोच बनाया.